Sunday, 8 February 2015

भारतीय प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे हैं और क्या मोदी सरकार के आने के बाद से ये खतरे बढ़े हैं?

भारतीय प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे हैं और क्या मोदी सरकार के आने के बाद से ये खतरे बढ़े हैं?

भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दू राष्ट्रवाद का पहला बड़ा आक्रमण था गांधी जी की हत्या

दोराहे पर ठिठका भारतीय प्रजातंत्र-प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे

असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान

मैं अपने इस व्याख्यान की शुरूआत, अपने अभिन्न मित्र डाॅ. अस़गर अली इंजीनियर को श्रद्धांजलि देकर करना चाहूंगा, जिनके साथ लगभग दो दशक तक काम करने का सौभाग्य मुझे मिला। डाॅ. इंजीनियर एक बेमिसाल अध्येता-कार्यकर्ता थे। वे एक ऐसे मानवीय समाज के निर्माण के स्वप्न के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे, जो विविधता के मूल्यों का आदर और अपने सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करे।
इस संदर्भ में वे उन चंद लोगों में से थे जिन्हें सबसे पहले यह एहसास हुआ कि सांप्रदायिकता की विघटनकारी राजनीति, देश और समाज के लिए कितनी घातक है। उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के कारकों के अध्ययन और विष्लेषण की परंपरा शुरू की। वे हर सांप्रदायिक दंगे का अत्यंत गंभीरता और सूक्ष्मता से अध्ययन किया करते थे। बोहरा समाज, जिससे वे थे, में सुधार लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस्लाम की शिक्षाओं की उनकी व्याख्या के लिए उन्हें दुनियाभर में जाना जाता है। अगर हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो शान्ति, सद्भाव, सहिष्णुता और करूणा पर आधारित हो, तो हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।
राष्ट्र के रूप में हम आज कहां खड़े हैं? भारतीय प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे हैं और क्या मोदी सरकार के आने के बाद से ये खतरे बढ़े हैं?
आमचुनाव में मोदी की जीत कई कारणों से हुई। उन्हें भारतीय उद्योग जगत का पूर्ण समर्थन मिला, लाखों की संख्या में आरएसएस के जुनूनी कार्यकर्ताओं ने उनके चुनाव अभियान को मजबूती दी, कार्पोरेट द्वारा नियंत्रित मीडिया ने उनका महिमामंडन किया और ‘‘गुजरात के विकास के माॅडल’’ को एक आदर्श के रूप मे प्रचारित किया। समाज को धार्मिक आधार पर धु्वीकृत किया गया और अन्ना हजारे, बाबा रामदेव व अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों के जरिये, कांग्रेस की साख मिट्टी में मिला दी गई। इस आंदोलन का अंत, आप के गठन के साथ हुआ।
मोदी का ‘अच्छे दिन‘ लाने का वायदा हवा हो गया है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी आने के बावजूद, भारत में महंगाई बढ़ती जा रही है। लोगों के लिए अपनी जरूरतें पूरी करना मुष्किल होता जा रहा है। मोदी ने वायदा किया था कि विदेशों में जमा कालाधन, छः माह के भीतर वापस लाया जायेगा और हम सब अपने बैंक खातों में 15-15 लाख रूपये जमा देखकर चकित हो जायेंगे। यह वायदा भुला दिया गया है। जहां तक सुशासन का सवाल है, मोदी की दृष्टि में शायद उसका अर्थ अपने हाथों में सत्ता केंद्रित करना है। केबिनेट प्रणाली की जगह, देश पर एक व्यक्ति का एकाधिकारी शासन कायम हो गया है। भारत सरकार के सचिवों कोे निर्देश दिया गया है कि वे सीधे प्रधानमंत्री के संपर्क में रहें। मंत्रियों की तो मानो कोई अहमियत ही नहीं रह गई है।
स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना कठिन होता जा रहा है। ‘ग्रीन पीस’ सरकार की इस नीति का प्रमुख शिकार बनी है। पिछली सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याण योजनाओं को एक-एक कर बंद किया जा रहा है। वे कुबेरपति, जिन्होंने मोदी के चुनाव अभियान को प्रायोजित किया था, अपने खजाने भरने में जुटे हुए हैं। पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को परे रखकर, उन्हें देश का अंधाधुंध औद्योगीकरण करने की खुली छूट दे दी गई है। नये प्रधानमंत्री को न भूतो न भविष्यति नेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और उनके चारों ओर एक आभामंडल का निर्माण करने की कोशिश हो रही है।
इन सब नीतियों और कार्यक्रमों से सबसे अधिक नुकसान समाज के कमजोर वर्गों को उठाना पड़ रहा है। ‘श्रम कानूनों में सुधार’ के नाम पर श्रमिकों को जो भी थोड़ी-बहुत सुरक्षा प्राप्त थी, उससे भी उन्हें वंचित करने की तैयारी हो रही है। उद्योगपतियों के लिए भूमि अधिग्रहण करना आसान बना दिया गया है। किसानों से येन-केन-प्रकारेण उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। गरीबों के लिए चल रही समाज कल्याण योजनाओं व भोजन और स्वास्थ्य के अधिकार को खत्म करने की तैयारी है।
धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने का सिलसिला जारी है। एक केंदीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं को हरामजादे बता दिया। एक अन्य भगवाधारी भाजपा नेता, नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बता रहे हैं और हिंदू महिलाओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं। हिंदुत्ववादी, महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे का महिमामंडन कर रहे हैं। वे हमेशा से गोडसे के प्रशसक थे परंतु नई सरकार आने के बाद से उनकी हिम्मत बढ़ गई है। क्रिसमस पर ‘सुशासन दिवस’ मनाने की घोषणा कर इस त्योहार के महत्व को कम करने की कोशिश की गई। ऐसी मांग की जा रही है कि हिंदू धर्मगं्रथ गीता को देश की राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाये। चर्चों और मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं। अनेक नेता बिना किसी संकोच या डर के चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि हम सब हिंदू हैं और भारत, एक हिंदू राष्ट्र है।
इस सबके बीच नरेन्द्र मोदी चुप्पी ओढ़े हुए हैं। शायद इसलिए क्योंकि जो कुछ हो रहा है, वह भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस के एजेन्डे का हिस्सा है। संघ का मूल लक्ष्य देश को संकीर्ण हिन्दू राष्ट्रवाद की ओर ले जाना है। हिन्दू राष्ट्रवाद, मुस्लिम अतिवाद और ईसाई कट्टरवाद से मिलती-जुलती अवधारणा है। इस संदर्भ में यह याद रखना समीचीन होगा कि भारत में ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ की धाराओं का जन्म, भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। सन् 1888 में सामंतों और राजाओं-नवाबों ने मिलकर युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन का गठन किया। बाद में मध्यम वर्ग और उच्च जातियों का श्रेष्ठि तबका भी इस संगठन से जुड़ गया। इसी संगठन के गर्भ से उत्पन्न हुए मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा, जो अपने-अपने धर्म का झंडा उठाए हुए थे।
हिन्दू महासभा के सावरकर ने सबसे पहले हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना प्रस्तुत की और सन् 1925 में गठित आरएसएस ने इसे अपना लक्ष्य बना लिया। उसने लोगों के दिमागों में यह जहर भरना शुरू किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यहां रहने वाले ईसाई और मुसलमान विदेशी हैं। यह विचार महात्मा गांधी, भगतसिंह व डाॅ. अम्बेडकर की समावेशी राष्ट्रवाद की अवधारणा के धुर विपरीत था।
हमें यह याद रखना चाहिए कि साम्प्रदायिक संगठनों ने स्वाधीनता संग्राम से सुरक्षित दूरी बनाए रखी और जब देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होने के लिए संघर्षरत था तब ये संगठन देश में घृणा फैलाकर दंगे करवाने में जुटे हुए थे। साम्प्रदायिक हिंसा की आग शनैः-शनैः तेज होती गई और इसके कारण राष्ट्र के रूप में हमें भारी नुकसान झेलना पड़ा। साम्प्रदायिकता के दानव ने ही देश का विभाजन करवाया और नई सीमा के दोनों ओर के करोड़ों लोगों को घोर पीड़ा और संत्रास के दौर से गुजरना पड़ा।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों की उनकी फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने में साम्प्रदायिक संगठनों ने काफी मदद की। इनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के साम्प्रदायिक संगठन शामिल थे। आरएसएस की विचारधारा में रचे-बसे उसके प्रचारक नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या की। यह व्यापक भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दू राष्ट्रवाद का पहला बड़ा आक्रमण था
जहां एक ओर आरएसएस ने स्वाधीनता संग्राम को नजरअंदाज किया वहीं दूसरी ओर उसने अपने स्वयंसेवकों को हिन्दू राष्ट्रवाद की संकीर्ण विचारधारा की घुट्टी पिलाई। इन स्वयंसेवकों ने समय के साथ पुलिस, नौकरशाही और राज्यतंत्र के अन्य हिस्सों में घुसपैठ कर ली। आरएसएस ने अपने अनुषांगिक संगठनों का एक बहुत बड़ा ढांचा खड़ा किया। इनमें शामिल हैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, विष्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल। संघ के स्वयंसेवकों के परिवारों की महिलाओं ने राष्ट्र सेविका समिति नामक संगठन बनाया।
आरएसएस लगातार ‘पहचान’ से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। ‘गौरक्षा‘ और ‘मुसलमानों के भारतीयकरण‘ के अभियानों के जरिए अल्पसंख्यकों को आतंकित किया जाता रहा है और व्यापक समाज में यह संदेश पहुंचाया जाता रहा है कि मुसलमान, भारतीय नहीं हैं और देश के प्रति उनकी वफादारी संदिग्ध है।
सन् 1980 का दशक आते-आते हिन्दुत्व ब्रिगेड के मुंहजुबानी प्रचार, मीडिया के एक हिस्से के उससे जुड़ाव और इतिहास की स्कूली पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन के नतीजे में समाज के बहुत बड़े तबके में मुसलमानों के प्रति संदेह और घृणा का भाव उत्पन्न हो गया। हिन्दुत्ववादी ताकतों ने ही बहुत बेशर्मी से बाबरी मस्जिद को ढहाया। उसके पहले, आडवानी ने रथ यात्रा निकाली, जो अपने पीछे खून की लकीर छोड़ती गई।
इसके बाद साम्प्रदायिक हिंसा में और बढ़ोत्तरी हुई। हिन्दू ‘पहचान‘ को देश की एकमात्र वैध पहचान घोषित कर दिया गया। धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण इतना बढ़ गया कि 1992-93 में मुंबई, सूरत और भोपाल में भयावह खूनखराबा हुआ। गुजरात में सन् 2002 में हुई साम्प्रदायिक विभीषिका के बारे में तो हम सब जानते ही हैं।
सन् 1980 के दशक का अंत आते-आते साम्प्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों के अलावा ईसाईयों को भी अपने निशाने पर ले लिया। यह कहा जाने लगा कि वे हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं। आदिवासी इलाकों में हिंसा भड़क उठी और इसके नतीजे में सन् 1999 में पाॅस्टर ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बच्चों को जिंदा जला दिया गया। सन् 2008 में कंधमाल में अनेक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
यह सब उस सोच का नतीजा था, जिसे संघ चिंतक एम. एस. गोलवलकर ने आकार दिया था। उनका दावा था कि भारत हमेश से हिन्दू राष्ट्र है व धार्मिक अल्पसंख्यकों को यहां या तो बहुसंख्यकों की दया पर जीना होगा और या फिर उन्हें नागरिक के तौर पर उनके सभी अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा।
सन् 2014 में भाजपा दूसरी बार सत्ता में आई। इसके पहले, सन् 1998 में वह सत्ताधारी एनडीए गठबंधन का हिस्सा थी। उस समय भाजपा को लोकसभा में बहुमत प्राप्त नहीं था इसलिए वह अपना एजेन्डा खुलकर लागू नहीं कर सकी। परंतु फिर भी उसने सफलतापूर्वक स्कूली पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण किया और पुरोहिताई व ज्योतिष जैसे अवैज्ञानिक विषयों को कालेजों और विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल करवाया। उसने हवा का रूख भांपने के लिए संविधान का पुनरावलोकन करने के लिए एक समिति का गठन भी किया।
अब, जबकि भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है, वह बिना किसी लागलपेट के अपना एजेन्डा लागू कर रही है। लगभग सारे राष्ट्रीय संस्थानों में साम्प्रदायिक सोच वाले लोगोें का कब्जा हो गया है। प्रोफेसर के. सुदर्शन राव, जो भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं, का कहना है कि जाति व्यवस्था से देश बहुत लाभान्वित हुआ है। वे महाभारत और रामायण की ऐतिहासिकता में भी विष्वास करते हैं। यह अलग बात है कि इतिहासविदों की जमात में राव को बहुत सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। नई सरकार संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन दे रही है। ऐसा इस तथ्य के बावजूद किया जा रहा है कि संस्कृत कभी आमजनों की भाषा नहीं रही है।
हमारा संविधान सरकार को यह जिम्मेदारी देता है कि वह वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन दे। इसके ठीक उलट, सरकार विज्ञान में रूढि़वादी और अतार्किक परिकल्पनाओं को ठूंस रही है। हमें अब बताया जा रहा है कि प्राचीन भारत में 200 फीट लंबे विमान थे और प्लास्टिक सर्जरी होती थी। इस महिमामंडन का उद्धेष्यशायद यह साबित करना है कि भारत, हजारों साल पहले विज्ञान के क्षेत्र में इतना उन्नत था जितना कि आज भी विष्व के विकसित देश नहीं हैं। निःसंदेह, भारत के चरक, सुश्रुत और आर्यभट्ट जैसे प्राचीन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कीं थीं परंतु यह मानना मूर्खता होगी कि प्राचीन भारतीय विज्ञान, आज के विज्ञान से भी अधिक विकसित था। यह, दरअसल, भारतीयों में श्रेष्ठता का दंभ भरने का बचकाना प्रयास है। किसी भी प्रजातंत्र के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अपने हिन्दुत्ववादी एजेन्डे के तहत, भाजपा सरकार संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष‘ व ‘समाजवादी‘ शब्दों को हटाने की कवायद कर रही है। उसे अल्पसंख्यकों की आशंकाओं और चिंताओं की तनिक भी परवाह नहीं है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्य गंभीर खतरे में हैं। हम आज इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जब भारतीय संविधान के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है।
हम अगर अब भी नहीं जागे तो बहुत देर हो जायेगी। हमें इस खतरे का मुकाबला करने के लिए कई कदम उठाने होंगे। हमें दलितों, महिलाओं, श्रमिकों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के हकों के लिए लड़ना होगा। हमें अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए समान विचारों वाले संगठनों के साथ गठबंधन कर, एक मंच पर आना होगा। प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों में एकता, समय की मांग है। हमें हाथों में हाथ डाल, एक साथ आगे बढ़ना होगा। गैर-सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का गठबंधन बनाकर, सांप्रदायिक शक्तियों को अलग-थलग करना होगा।
हिंदू राष्ट्रवाद की संकीर्ण राजनीति, फासीवादी और धार्मिक कट्टरपंथी शासन व्यवस्था का मिलजुला स्वरूप है। इस तरह के सन में प्रजातांत्रिक स्वतंत्रताएं सिकुड़ती जाती हैं। इसकी शुरूआत भी हो गई है। कुछ पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और कुछ नई पुस्तकें, जिनमें दीनानाथ बत्रा की किताबें शामिल हैं, को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
अब समय आ गया है कि हम सोशल, प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अपने लिए जगह बनायें। हमें विविधता, बहुवाद और उदारवादी मूल्यों को प्रोत्साहन देना है। ये ही हमें मानवीय, प्रजातांत्रिक समाज का निर्माण करने में मदद करेंगे।
-राम पुनियानी
साभार :http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/views/2015/02/08/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7-%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%B8?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

प्रतिक्रांति के हमसफर- किरण बेदी के ‘छोटे गांधी’ कामरेडों के लेनिन हैं!

प्रतिक्रांति का रूप क्रांति जैसा ही होता है, सिर्फ उसका उद्देश्य उलटा होता है

प्रतिक्रांति - केजरीवाल की जीत में धर्मनिरपेक्षता की जीत नहीं है, जैसा कि अति वामपंथियों से लेकर तरह-तरह के राजनीतिक निरक्षर जता रहे हैं।
‘‘इस वक्त समूची दुनिया में जो हो रहा है, वह शायद विश्व इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिक्रांति है। यह संगठित है, विश्वव्शपी है और समाज तथा जीवन के हर पहलू को बदल देने वाली है। यहां तक कि प्रकृति और प्राणिजगत को प्रभावित करने वाली है। इक्कीसवीं सदी के बाद भी अगर मानव समाज और सभ्यता की चेतना बची रहेगी, तो आज के समय के बारे में इसी तरह का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में होगा। डंकेल संधि की तारीख इस प्रतिक्रांति की शुरुआत की तारीख मानी जा सकती है।’’
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‘‘प्रतिक्रांति का मतलब पतन या क्षय नहीं है। पतन या क्षय वहां होता है, जहां परिवक्वता आ चुकी है या चोटी तक पहुंचा जा चुका है। सोवियत रूस का पतन हो गया; या हम कह सकते हैं कि आधुनिक सभ्यता का क्षय एक अरसे से शुरू हो गया है। इससे भिन्न प्रतिक्रांति का रूप क्रांति जैसा ही होता है, सिर्फ उसका उद्देश्य उलटा होता है। यह भी संगठित होता है और एक विचारधारा से लैस रहता है और कई मूल्यों और आधारों को उखाड़ फेंकने का काम करता है। इसकी विचारधारा ही ऐसी होती है कि इसका आंदोलन अति संगठित छोटे समूहों के द्वारा चलाया गया अभियान होता है।’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, किशन पटनायक, राजकमल प्रकाशन, पृ. 172)
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किशन जी का यह कथन फरवरी 1994 का है। तब से दुनिया और भारत में प्रतिक्रांति का पथ उत्तरोत्तर प्रशस्त होता गया है। राजनीति में पिछले तीन-चार सालों में बनी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की केंद्रीयता से प्रतिक्रांति की विचारधारा काफी मजबूत स्थिति में पहुंच गई है। गौरतलब है कि दोनों ने लगभग समान प्रचार शैली अपनाकर यह हैसियत हासिल की है जिसमें मीडिया और धन की अकूत ताकत झोंकी गई है। बहुत-से मार्क्सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने अरविंद केजरीवाल का साथ देकर या दिल्ली विधानसभा चुनाव में बिना मांगे समर्थन करके इस प्रतिक्रांति को राजनीतिक स्वीकार्यता प्रदान कर दी है। दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बनती है या भाजपा की, इससे इस सच्चाई पर फर्क पड़ने नहीं जा रहा है कि भारत की मुख्यधारा राजनीति में प्रतिक्रांति का सच्चा प्रतिपक्ष नहीं बचा है।
केजरीवाल की राजनीति के समर्थक खुद को यह तसल्ली और दूसरों को यह वास्ता देते रहे हैं कि जल्दी ही केजरीवाल को (अपने पक्ष में) ढब कर लिया जाएगा। हुआ उल्टा है। केजरीवाल ने सबको (अपने पक्ष में) ढब कर लिया है। सुना है किरण बेदी के छोटे गांधीकामरेडों के लेनिन हैं! प्रकाश करात ने कहा बताते हैं कि केजरीवाल का विरोध करने वाले मार्क्स को नहीं समझते हैं। प्रतिक्रांति इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही है कि मार्क्स को भी उसके समर्थन में घसीट लिया गया है। यह परिघटना भारत की प्रगतिशील राजनीति की थकान और विभ्रम को दर्शाती है।
ऊपर दिए गए किशन जी के दो अनुच्छेदों के बीच का अनुच्छेद इस प्रकार है, ‘‘समूची बीसवीं सदी में क्रांति की चर्चा होती रही। क्रांति का एक विशिष्ट अर्थ आम जनता तक पहुंच गया था; क्रांति का मतलब संगठित आंदोलन द्वारा उग्र परिवर्तन, जिससे समाज आगे बढ़ेगा और साधारण आदमी का जीवन बेहतर होगा; आखिरी आदमी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। साधारण आदमी का केंद्रीय महत्व और आखिरी आदमी का अधिकार बीसवीं सदी की राजनीति और अर्थनीति पर जितना हावी हुआ, वैसा कभी नहीं हुआ था।’’
यह लिखते वक्त किशन जी को अंदेशा भी नहीं रहा होगा कि एनजीओ सरगनाओं का गिरोह करोड़पतियों को भी आम आदमी बना देगा ( उनकी समृद्धि बढ़ाने के लिए गरीबों का वोट खींच लेगा) और समाजवादी क्रांति का दावा करने वाले नेता व बुद्धिजीवी उसके समर्थन में सन्नद्ध हो जाएंगे! किशन जी ने अपने उसी लेख में यह कहा है कि ‘‘1980 के दशक में हिंदुत्व के आवरण में एक प्रतिक्रांति का अध्याय शुरू हुआ है देश की राजनैतिक संस्कृति को बदलने के लिए। इस वक्त विश्व-स्तर पर जो प्रतिक्रांति की लहर प्रवाहित है, उससे इसका मेल है; ….।’’ हम जानते हैं पूंजीवादी प्रतिक्रांति के पेटे में चलने वाली सांप्रदायिक प्रतिक्रांति के तहत 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर दिया गया।
किशन जी ने डंकेल समझौते के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति के मुकाबले में वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और संघर्ष खड़ा किया था। साथ ही उन्होंने विस्तार से धर्मनिरपेक्षता का घोषणापत्र लिखा। उनके साथ शामिल रहे ज्यादातर लोग आज प्रतिक्रांति के साथ हैं। जाहिर है, वे किशन जी के जीवन काल में उन्हें धोखा देते रहे और उनके बाद उनके जीवन भर के राजनीतfक उद्यम को नष्ट करने में लगे हैं।
ऐसे में ज्यादा कुछ कहने-सुनने को नहीं बचा है; कुछ बिंदु अलबत्ता देखे जा सकते हैं
(1) मोदी का तिलस्म, जिसे तोड़ने के लिए केजरीवाल को अनालोचित समर्थन दिया गया है, वास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है।
(2) केजरीवाल की जीत में धर्मनिरपेक्षता की जीत नहीं है, जैसा कि अति वामपंथियों से लेकर तरह-तरह के राजनीतिक निरक्षर जता रहे हैं। मुसलमानों के भय की भित्ति पर जमाई गई धर्मनिरपेक्षता न जाने कितनी बार भहरा कर गिर चुकी है। भारत की धर्मनिरपेक्षता मोदी की जीत के पहले कई बार हार का मुंह देख चुकी है। भारत का विभाजन, गांधी की हत्या, आजादी के बाद अनेक दंगे, 1984 में सिख नागरिकों का कत्लेआम, 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस, 2002 का गुजरात कांड – धर्मनिरपेक्षता की हार के अमिट निशान हैं।
(3) धर्मनिरपेक्षता के दावेदार यह सब जानते हैं। लिहाजा, केजरीवाल के समर्थन के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। इनमें से बहुत-से लोग मोदी के हाथों मिली करारी शिकस्त को पचा नहीं पाए हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि मोदी जैसा शख्स भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। उनका विश्वास टूटा है। खीज मिटाने के लिए वे किसी को भी मोदी को हराता देखना चाहते हैं। केजरीवाल को उनके समर्थन का दूसरा अंतर्निहित कारण घृणा की राजनीति से जुड़ा है। सर्वविदित है कि आरएसएस घृणा की राजनीति करता है। धर्मनिरपेक्षतावादियों में भी संघियों के प्रति तुच्छता से लेकर घृणा तक का भाव रहता है। केजरीवाल की जीत से उनके इस भाव की तुष्टी होती है। तीसरा कारण सरकारी पद-प्रतिष्ठा से जुड़ा है। धर्मनिरपेक्षतावादियों को कांग्रेसी राज में सत्ता की मलाई खाने का चस्का लगा हुआ है। उन्हें पता है कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में नहीं आने जा रही है। सीधे भाजपा का न्यौता खाने में उन्हें लाज आती है। दिल्ली राज्य में केजरीवाल की सत्ता होने से विभिन्न निकायों/समितियों में शामिल होने में उन्हें लाज का अनुभव नहीं होगा। हालांकि वे एक भूल करते हैं कि एनजीओ वाले राजनीति में आए हैं तो उनके अपने साथी-सगोती निकायों/समितियों में आएंगे। लिहाजा, धमर््निरपेक्षतावादियों के लिए यहां कांग्रेस जैसी खुली दावत नहीं होने जा रही है। मोदी को हराने के नाम पर किए गए समर्थन को वे प्रतिक्रांति के समर्थन तक खींच कर लाएंगे। देखना होगा तब साथी क्या पैंतरा लेते हैं?
(4) केजरीवाल को वोट देने वाले दिल्ली के गरीबों से कोई शिकायत नहीं की जा सकती। मीडिया और बुद्धिजीवियों ने ‘आप’ के आर्थिक और गरीब विरोधी विचारधारात्मक स्रोतों की जानकारी उन तक पहुंचने ही नहीं दी। इस मेहनतकश वर्ग को जल्दी ही पता चलेगा कि उनका इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ किया गया है। हालांकि केजरीवाल के दीवाने ‘आदर्शवादी’ नौजवानों को वैसा नादान नहीं कहा जा सकता। प्रतिभावान कहे जाने वाले इन नौजवानों ने प्रतिक्रांति के पदाति की भूमिका बखूबी निभाई है।
(5) दलित पूंजीवाद के पैरोकार देख लें, शूद्रों समेत ज्यादातर सवर्ण नेता, प्रशासक, विचारक, एनआरआई पूंजीवादी प्रतिक्रांति के साथ जुट गए हैं। पूंजीवाद की दौड़ में बराबरी का मुकाम कभी नहीं आता।
(6) उस अदृश्य एजेंसी का लोहा मानना पड़ेगा जिसने केजरीवाल का यह चुनाव अभियान तैयार किया और चलाया। ‘जनता का सीएम’ कैसे बनता है, यह उस एजेंसी ने बखूबी करके दिखाया है। वह ‘जनता का प्रधान सेवक’ बनाने वाली एजेंसी की टक्कर की ठहरती है।
अंत में सबक। नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति का लगातार प्रतिरोध हुआ है। अब, जबकि सारे भ्रम हट गए हैं, क्रांति का संघर्ष निर्णायक जीत की दिशा में तेज होना चाहिए।
- डॉ. प्रेम सिंह


साभार :http://www.hastakshep.com/columnist/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%AF-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-columnist/2015/02/08/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BF?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

Saturday, 10 January 2015

गांधीवादियों को गांधीवाद की समझ नही

अरुण कुमार पानी बाबा से बातचीत

अरुण कुमार पानी बाबा की पुस्तक अन्न जल बाजार में आ चुकी है। यह पुस्तक कोई पाक कला की सामान्य पुस्तक नहीं है बल्कि अन्न जल के भारतीय दर्शन को समझने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज है। खान-पान को लेकर गांधी ने भी काफी लिखा पर गांधीवादी भी उसे व्यवहार में बहुत कम ला पाते है। अन्य राजनैतिक धाराओं में भारतीय खान पान की संस्कृति और समझ को लेकर को ख़ास ब्यौरा नहीं मिलता है। इस पुस्तक में इन सवालों पर भी तीखी टिप्पणी है तो यूरोप के समाज के खानपान पर भी। पानी बाबा का साफ़ कहना है कि गांधीवादियों में ही गांधी की समझ नजर नहीं आती। और समाजवादियों का दिमाग तो सबसे ज्यादा प्रदूषित रहा है। पानी बाबा यहीं नहीं रुकते बल्कि और आगे बढ़कर कहते हैं- यह दुर्भाग्य ही रहा कि लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण तक को गांधी की कोई समझ नहीं रही दरअसल पानी बाबा भारतीय खान पान को बहुत सी बिमारियों का प्राकृतिक उपचार भी मानते हैं। मसलन मधुमेह का एलोपैथिक में कोई उपचार नहीं है पर खानपान में बदलाव लाकर इससे कोई भी मुक्त हो सकता है। इसका सीधा तरीका है कि गेंहू और चावल छोड़कर दूसरे अनाज का इस्तेमाल किया जाय और थोड़ा सा परहेज किया जाए तो इस बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। यह एक बानगी है भारतीय खान पान की जो हर पहर और हर मौसम के हिसाब से अलग अलग होता है। पानी बाबा का मानना है कि ‘भोजन दिव्य हो भव्य नहीं। ‘ देशज परंपरा में ऋतुचर्या और भोजन का गहरा संबंध माना गया है। यहां तक कि दिनचर्या के अनुसार ही ‘ भोजन (सुबह, दोपहर, शाम )की प्रवृति के मुताबिक होना चाहिए।’ हालाँकि खुद पानी बाबा का कहना है ‘हम न तो पाक शास्त्री है, न किसी तरह के भोजन स्वाद पारखी। आवश्यकतावश घर परिवार की रसोई करने का अभ्यास बचपन में डाला गया था, उस नाते उम्र के साथ व्यवस्थित पकाने और मित्रों को खिलाने की रूचि विकसित हो गई। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश -
शुरुआत कैसे हुई ?
वर्ष 1981 -82 के दौरान मशहूर कवि आलोचक भाई कमलेश शुक्ल के दिल्ली स्थित कालिंदी कालोनी निवास पर रुकना होता था, बस उन दिनों हम जो रांध कर, मेज पर सजा देते वही उन्हें और चंद पारखी मित्रों को भाने लगा। तभी कमलेश जी ने सुझाया कि हमें ‘पाक कला और संस्कृति ‘ पर कुछ लिखना चाहिए। पर राजनैतिक कार्यकर्त्ता होने के नाते यह सलाह जमी नहीं। अस्सी के दशक में लंबा अकाल पड़ा, तब राजस्थान में व्याप्त कुपोषण का ‘अप्रवीण’ अध्ययन किया था, तब यह समझ विकसित हुई कि भारत में कुपोषण मूलतः एक सांस्कृतिक समस्या है न कि आर्थिक। उस अध्ययन से अर्जित लोक ज्ञान परंपरा से प्रेरित होकर खानपान के विषय पर अनुभव जन्य परामर्श लिखना शुरू हुआ।
आपने भारत एक कृषि प्रधान देश होने की अवधारणा पर सवाल उठाया है ?
भारत या हिंदुस्तान अपने इतिहास स्मृति में कभी भी कृषि प्रधान देश नहीं रहा बल्कि कौशल उद्योग प्रधान व्यवस्था का संघ था। प्राचीन काल से प्रचलित मिट्टी, काठ, धातु, कपड़ा, सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग और उनका अत्यंत व्यापार प्रचलन इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। आधुनिक इतिहासकार, समाज शास्त्री, राजनेता, हुक्मशाह आदि भारत को क्यों कृषि प्रधान देश मानने लगे यह सवाल उन्हें खुद से पूछना चाहिए।
इसे विस्तार से बताना चाहिए ?
निजी परिवार स्तर पर जीवन निर्वाह के लिए आजादी की पूर्व बेला तक गो पालन सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्दयम व उद्योग था। करीब 95 फीसद ग्रामीण और 25 फीसद शहरी परिवारों में घृत उद्योग अनिवार्य जैसा था। वस्तु विनिमय में गो घृत का प्रतीक मुद्रा टोकन करंसी, तुली सर्वमान्य प्रचलन था। चूंकि गोघृत प्रतीक मुद्रा में स्थापित था इसलिए अस्पृश्यता के दोष से मुक्त था। जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर, सांचौर आदि शहरों में अभी हाल तक मंदी का अर्थ घी के व्यापारिक स्थल से ही था। चंदौसी, खुर्जा, हाथरस, अलीगढ, कचौरा, भिंड, मुरैना, ग्वालियर, टुंडला, इटावा, करनाल, पानीपत जैसे सैकड़ों कस्बे, नगर घी व्यापार की मंदी के रूप में जग प्रसिद्ध थे।  दूध दही का व्यापारीकरण सौ सवा सौ बरस से ज्यादा पुरानी प्रथा नहीं रही। लेकिन घी का बड़ा व्यापार था और इस तथ्य के अनेक प्रमाण भी उपलब्ध हैं कि घी की आढ़त से कुल परिणाम दो गुना थी। बीसवीं सदी के मध्य तक गोघृत का बड़ी मात्रा में पश्चिम एशिया और मध्य एशिया को निर्यात होता था। जो इतिहासकार अपने देश में दीर्घकालीन गरीबी और भुखमरी का प्रचार करते नहीं थकते उन्हें इस तथ्य पर अवश्य गौर करना चाहिए कि अंग्रेजों के आगमन के सौ बरस बाद तक भी ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में ऐसे कितने और कौन सर जाति परिवार होते थे जिनके घरों में न्यूनतम एक पसेरी दूध निजी उद्योग उपभोग के लिए सुलभ नहीं था ? लेकिन इस वस्तुस्थिति को न नाकारा जा सकता है न उसे दृष्टि ओझल किया जा सकता है कि भारत भूमि पर सांस्कृतिक हिंसा, सामाजिक अन्याय विद्रूप रूप में प्रचलित था और आज भी है
ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि समूचे देश में किसी भी देसी राज में किसी भी जाति धर्म संप्रदाय समुदाय के पशुओं का गोचर या वन क्षेत्रों में चराई पर प्रतिबंध था, या किसी राजा महाराजा तक को एक इंच भूमि पर भी बाड़ बंदी का अधिकार था ? इस दलील के आधार पर हम दो प्रमुख सत्य उद्घाटित कर रहे हैं। पहला यह कि भारत का सामन्तवाद फ्यूडलिज्म नहीं था दूसरे हमारे सामन्तवाद में राजा से लेकर किसान तक को कृषि या उद्यान तक के लिए एक इंच जमीन पर बाडबंदी की छूट नहीं थी कि वह वेद वाक्य सबे भूमि गोपाल की सिद्धांत का मामूली सा भी उल्लंघन कर सके। इससे हम सिर्फ यह याद दिलाने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत भूमि पर बंगाल से लेकर बलूचिस्तान तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तृप्ति की अनुमति (पेट भरने का अहसास ) दूध और दूध पदार्थों जैसे घी, छाछ, मट्ठा, लस्सी, बर्फी, कलाकंद, रसगुल्ला आदि पर आधारित था न कि मांस या अन्य पर आधारित।
आपने फ्रांस का हवाला दिया है ?
फ्रांस जितना समाज शास्त्र की व्याख्या के लिए जाना जाता है, उससे ज्यादा फैशन और श्रंगार प्रसाधनों के लिए प्रसिद्ध है। उससे भी बड़ी पहचान अंगूरी शराब, पनीर (चीज ) और पावरोटी की विविधता की है। आम फ्रांसीसी को जितना गौरव अपने स्वाद तंतुओं की नफासत पर है, उतना दर्शन शास्त्र पर नहीं है। फ़्रांस समाज में आत्मगौरव के लिए पिछले चार दशक से जो प्रमुख संघर्ष रहा है उसमे पनीर और पावरोटी का वैविध्य प्रमुख मुद्दा है। संक्षेप में मानवीयता और आत्मगौरव आपस में पूरक तत्व है। आत्मगौरव के अहसास में जो स्थान भाव,  भजन ( आध्यात्म ),भाषा ( भाव की अभिव्यक्ति, स्तुति, संगीत, संवाद ), वेशभूषा, भवन या भू परिदृश्य का है, वही भोजन और भेषज का है। जो कौम अपने खानपान के प्रति उदासीन हो जाती है, उसकी भाषा और भाव भी लुप्त हो जाते हैं। पिछले डेढ़ सौ बरस से हिन्दुस्तान भी इस सन्दर्भ में उदासीन हो रहा है। अपने देश में दुनिया के सर्वाधिक कुपोषित बच्चे पल रहे हैं। फुटबाल तो खेला ही नहीं जा रहा, हाकी पिछड़ चुकी है। समस्या सिर्फ फास्ट फूड के नक़ल की नहीं है, गौ-पूज्य देश भैंस के दूध की चाय पी रहा है। आयातित दूध-पावडर और यूरिया निर्मित मावे की मिठाई खा रहा है। 
                                                             O- अंबरीश कुमार
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/interview/2015/01/09/%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

मुनाफे का खेल-हराम की कमाई अब धर्म है

मुनाफे का खेल-हराम की कमाई अब धर्म है

राजनीतिक मोर्चाबंदी नहीं, अब जरूरत है आम जनता के मोर्चे की!

गांधी की वापसी के इतिहास के मौके पर राजघाट पर अनशन, लेकिन गोडसे समय के खिलाफ फिर लवण सत्याग्रह की मस्त गरज आहे

अबे चैतू, तू कथे जात है। देश मुआ जात है, तू जिंदा रहबे?

गांधी जिसे पागल दौड़ बताते रहे हैं, उनके अनुयायी उस पागल दौड़ में शामिल हैं
ये तस्वीरें बताती हैं कि हम किस भारत का कायाकल्प करने में लगे हैं। गांधी जिसे पागल दौड़ बताते रहे हैं, उनके अनुयायी उस पागल दौड़ में शामिल हैं। वही पागल दौड़ अनंत विकास गाथा है। वही पागल दौड़ कटकटले अंधकार है। वही पागल दौड़ हिंदुत्व है जो दरअसल हिंदू साम्राज्यवाद है। नस्ली भेदभाव है। अमेरिकी जायनी जनसंहार राजसूय है और सारा देश महाभारत है। धर्म की बात गांधी भी करते थे। रामराज्य की बात भी करते थे गांधी। जब नाथूराम गोडसे ने गोली दाग दी तो बापू के आखिरी शब्द थेः हे राम!
उन्हीं राम के नाम यह पागल दौड़ है।
सेवाग्राम में इस पागल दौड़ चेतावनी के मुखातिब हुए हम, मैं, रविजी और निसार अली। हम जैसे बीचोंबीच हबीब तनवीर के आगरा बाजार में नाचा गम्मक खेल रहे हों इस सीमेंट के जंगल के कटकटले अंधकार में।
नागपुर से ट्रेन से लौट रहे थे तो टीटीई के भेष में रामभक्त एक देखा जो नागपुर से लेकर रायगढ़ तक जय श्री राम कहते-कहते रायपुर से खाली हुआ जात बैलगाड़ी के सफर में रात को कड़ाके की सर्दी के एवज में बिना रिजर्वेशन घुस आये मुसाफिरों से जय श्री राम कह-कहकर पचास से दो सौ रुपये वसूलता रहा। यही राजकाज है। संत समागम भी यही है।
गांधी बिना श्रम संपत्ति के खिलाफ थे। बिना श्रम भोजन उनके लिए हराम था। अब रामजादा हुआ हो या नहीं, देश गांधी के सिद्धांत के मुताबिक हरामजादा हुआ जात है। डायन हुई मंहगाई, सैंया हमार कमात भौत है, डायन ससुरी खाय जात है।
आंकड़ों की महिमा भारी मंहगाई भी जीरो दीख्ये अब, लेकिन जनता फिर भी मारी-मारी। सब ससुरे मुनाफा का खेल, हराम की कमाई अब धर्म है । हराम की कमाई अब अर्थ व्यवस्था है।
संत विनोबा जो सूत कातते थे, उसके मेहनताना बतौर उन्हें तीन आना मिलता था, उसी का खाते थे और गांव वालों से खुद को भंगी कहते थे। नदी में बाढ़ आयी तो पाखाना परिष्कार करने गांव जा नहीं पाये तो पवनार पार से हांक लगायी, गांववालों, नदी में बाढ़ है और आज तुम्हारा भंगी नहीं आयेगा।
अबे चैतू, तू कथे जात है। देश मुआ जात है, तू जिंदा रहबे?
गौर तलब है कि राजघाट पर आज से तीन दिनों के लिए गांधीवादी और सर्वोदयी कार्यकर्ताओं का अनशन है गांधी के नासमझ हत्यारे नाथूराम गोडसे के महिमामंडन के खिलाफ।
सेवाग्राम में वहां के प्रभारी जयवंत मठकर ने हमें उस कार्यक्रम का आमंत्रण पत्र दिखाया था 6 जनवरी को जब हम छत्तीसगढ़ के नाचा गम्मक कलाकार निसार अली और नागपुर के रंगकर्मी व युवा कारोबारी रविजी के साथ वर्धा में दो दिवसीय सफदर हाशमी रंग मोहत्सव के उपरांत वहां पहुंचे।
 कल आज की खबरों में राजघाट पर गांधी की दक्षिण अफ्रीका से वापसी के सौ साल के मौके पर इतिहास में वापसी की कोई हलचल कहीं है नहीं और न राजघाट पर अनशन की खबर है। सर्वोदयी कार्यकर्ताओं ने याद करें कि बाबरी विध्वंस के बाद भी राजघाट पर अनशन किया था।
इस वापसी शताब्दी पर देश बेचने वालों का कार्निवाल लेकिन खूब जोरों पर है। गांधी के हत्यारे की मूर्ति गढ़ दी गयी है और नई दिल्ली में 30 जनवरी रोड के एकदम पास मंदिर मार्ग स्थित में उसमें प्राण प्रतिष्ठा भी कर दी जानी है, ऐसे में प्रथम स्वयंसेवक ने गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस लौटने के सौवें साल पर डाक टिकट भी जारी कर दिया है। जबकि मेरठ में संत समागम मध्ये गोडसे मंदिर बनने की पूरी तैयारी है। भूमि पूजन संपन्न है।
तेरह साल की उम्र में बापू के सान्निध्य में आयी कुसुम ताई पांडे जो अब तेरानब्वे साल की हैं और महाराष्ट्र में कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ी अंबर चरखा से सूत कात रही युवा प्रभाताई ने एक स्वर से कहा कि नाथूराम गोडसे का मंदिर इस देश में नहीं बनना चाहिए।
कुसुमताई ने कहा कि अब फिर एक लवण सत्याग्रह की दरकार है पागल दौड़ के खिलाफ तो कुछ दूसरे कार्यकर्ताओं ने कहा कि उस नासमझ हत्यारे को माफ कर दिया बापू ने लेकिन यह देश उसे माफ नहीं कर सकता।
जयवंत मठकर ने जब उस बहुचर्चित गांधी के नाम नेताजी के पत्र की चर्चा की जिसमें नेताजी ने आजाद हिंद फौज के भारत में प्रवेश के लिए गांधीजी से इजाजत मांगी और उन्हें फादर आफ दि नेशन नाम से पहले संबोधित किया।
उनने याद दिलाया शांतिनिकतन में बापू के सान्निध्य कविगुरु रवींद्र की और कहा कि रवींद्र ने ही गांधी को महात्मा कहा। तो ढेरों बातें याद आयी और सेवाग्राम की सरजमीं पर उस माटी में खड़े होकर जहां खुल्ले आसमान के नीचे बापू की प्रार्थना सभा होती थी और जहां 1936 में बापू ने पीपल का पेड़ लगाया था, खुल्ला बाजार में धर्म के नाम, राम के नाम हमें चारों तरफ से दसों दिशाओं से बेदखल करती पागल दौड़ याद आयी और अचानक अहसास हुआ कि गांधी कोई कांग्रेस के नेता तो थे नहीं।
वे नेहरु के भी उतने ही नेता थे जितने नेताजी के, समाजवादियों के जितने उतने ही कम्युनिस्टों के।
सारी अस्मिताएं एकजुट थीं अस्मिताओं के आर-पार और यह जनता का मोर्चा था, जिसके नेता थे बापू।
अमेरिकी की स्वतंत्रता की लड़ाई, फ्रासीसी क्रांति से लेकर हाल में दक्षिण अफ्रीका की क्रांति और यहां तक कि अमेरिकी अश्वेत प्रथम राष्ट्रपति बाराक ओबामा के चुनाव में भी किसी विचारधारा, किसी अस्मिता या किसी राजनीति के बजाय निर्णायक था फिर वही सामाजिक और उत्पादक शक्तियों का संयुक्त मोर्चा।
क्या हम वह मोर्चा गढ़ नहीं सकते?
वही सामाजिक और उत्पादक शक्तियों का संयुक्त मोर्चा?
जनता का मोर्चा?
हमारे भीतर उस वक्त जैसे केदार जलप्रलय घमासान।
जैसे सारे के सारे पहाड़ दरकने लगे।
जैसे घाटियां यकबयक गायब होने लगीं।
जैसे सारे के सारे ग्लेशियर रेगिस्तान। जैसे भूकंप से जलथल एकाकार।
जैसे एडियोएक्टिव पोलोनियम जहर से हजार भोपाल गैस त्रासदियों के बीचोंबीच अकले हम महाभारत युद्ध के सारे जख्मों, सारे रक्तपात का बोझ ढोते हुए अश्वत्थामा।
हमने नई तालीम के बच्चों को टिफन खाते हुए, टिफिन साझा करते हुए गांधी की चर्चा करते सुना और दोपहर के भोजन से पहले सफाई करते बच्चे जब कहने लगे कि उन्हें मोदी नहीं, गांधी बनना है तो हमारे होश ठिकाने आये।
हमने गांधी को देखा नहीं है। न हम गांधी को समझे हैं और न उनके सत्य और सत्याग्रह को। हम जैसे नासमझ गांधीविरोधियों की रहने दें, जो गांधीवाद के झंडेवरदार हैं, पागल दौड़ की उनकी सियासत के मद्देनजर कहना सही होगा कि इस देश में गांधी को अब शायद ही कोई समझता हो।
हमने इरोम शर्मिला नाम की हमारी सबसे प्रिय, सबसे खूबसूरत एक लड़की के 14 साल का स्तायग्रह देखा है और आमरण अनशन मार्फते उनकी सत्यनिष्ठा देख रहे हैं। सत्ता के सैन्यतंत्र विरुद्ध लोकशाही की बहाली की इरोम की लड़ाई को समझें तो शायद हम गांधी को भी समझ सके हैं। गांधी के देश ने गांधी की सबसे महान अनुयायी में एक इरोम शर्मिला को भी भुला दिया गया। जबकि इरोम शर्मिला के संघर्ष की कहानी जबरदस्त नैतिक बल से भरी हुई है। इसके बावजूद इस संघर्ष में हिंसा की जगह नहीं है। इस कहानी में बलिदान है, सम्मान के साथ जीने के हक के लिए संघर्ष है। ये कहानी शुरू हुई थी सुदूर पूर्वोत्तर की एक छोटी सी झोपड़ी में इरोम आठ भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं, जब इरोम का जन्म हुआ तब उनकी मां इरोम सखी नवजात बच्ची को अपना दूध पिलाने के काबिल नहीं रहीं। इरोम को गांव की कई महिलाओं ने अपना दूध पिला कर एक तरह से जीवन दान दिया था।
वर्धा में एक मजदूर है जिसकी दिहाड़ी का इंतजाम हम अब कर नाही सकत है। वह काफिले की मजदूरी करता है। उसकी संगत में है एक कुमार गौरव। लड़के बहुत होशियार हैं। उनन के साथ दंगल जंगल के मोर मोरनियां हैं, जिनकी वसंत बहार है वर्धा महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय में, जहां हाशिमपुरा मलियाना नरसंहार का भंडाफोड़ करने वाले बहुनिंदित एक कुलपति विभूति नारायण राय ने नजीर हाट, बिरसा मुंडा हास्टल, भगत सिंह सुखदेव राजगुरु हास्टल, कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास, बाबा नागार्जुन सराय, मुंशी प्रेमचंद मार्ग, हबीब तनवीर प्रेक्षागृह वगैरह-वगैरह से हिंदी का एक बेममिसाल गांव रचा है और हमारे कुछ पुरातन मित्र जो पगलैट किसम के रहे हैं, रघुवीर सहाय के चेले चपाटे भी हैं, वहां वे भी बसै हैं। वहां दो दिनों तक ऊधम काटने के बाद बचे खुचे जनमाध्यम भारतीय रंगमंच के बिखरे रंगकर्मियों में संवाद की पहल शुरु करने की एक पहल भी हो गयी ठैरी, जिसके बारे में सिलसिलेवार तरीके से बतायेंगे।
नाचा गम्मक को हबीब तनवीर को न जानने वाले न समझें, ऐसी बात नहीं है। नाचा गम्मक कलाकार निसार मियां इप्टा के सहयोग से छत्तीसगढ़ में एक रंगकर्मी मोर्चा बना चुके हैं और नागपुर जंकशन पर शैला हाशमी के राजधानी एक्सप्रेस के इंतजार में इस मोर्चे को हम राष्ट्रीय शक्ल देने के बारे में घंटों बतियाते रहे। वर्धा के छात्र छात्राओं शिक्षकों और वहां हाजिर नाजिर रंगकर्मियों के सौजन्य से एक पहल भी हमने रंग चौपाल के जरिये कर दी है।
हम गोरख पांडेय छात्रावास में लहूलुहान असंख्य गोरख पांडेय के मुखातिब थे कि रविजी अपनी कार लेकर सेवाग्राम हो आये। नागार्जुन सराय में हमने उन्हें धर दबोचा और दो दिन में हम मुक्म्ल छात्र अवतार में थे। अकेले ही हो आये, अभ भरिये जुर्माना। तो उनने जो जुर्माना भरा, बाकायदा सारथी बनकर ले गये हमें सेवाग्राम, जहां जाकर शोर मचाने के लिए मशहूर हो चुके हम हकबका गये।
पूछा हमने निसार भाई से, हां भाई चैतू, कथे ले आयो हो हमें, ई तो हमार घर लाग्यो है। जो घर पीछे छोड़ आयो, जो घर सीमेट के जंगल में बेइंतहा एक कब्र है, ससुरा वहीच घर इथे दीख गयो रे।
मन बेहद कच्चा कच्चा हो गयो रे भाया। 
                                         O- पलाश विश्वास
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/travelogue/2015/01/09/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AB%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A5%87%E0%A4%B2-%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%88?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश-लोकतंत्र और जनता के विरुद्ध सरकार और कारपोरेट की दुरभिसंधि

पूंजीवादी विकास का रास्ता भ्रष्टाचार से होकर गुजरता है
भारतीय लोकतंत्र को कारपोरेट घरानों ने हाईजेक कर लिया है
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनस्र्थापना कानून 2013 भाजपा के सुझावों को शामिल करके उसके समर्थन से संसद में पारित हुआ था। कानून को स्वीकृति देने वाली संसदीय समिति की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन थीं जो वर्तमान लोकसभा की अध्यक्ष हैं। यह कानून जनवरी 2014 से अमल में आया। इस कानून में अधिग्रहण की जाने वाली जमीन के लिए किसानों को उचित मुआवजा देने और उनकी पूर्व अनुमति संबंधी प्रावधानों को पहले के 13 कानूनों पर एक साल के अंदर लागू करने की व्यवस्था भी की गई थी। उपनिवेशवादी दौर के 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह यह कानून लाया गया था। 1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीतियों के चलते किसानों-आदिवासियों की भारी तबाही, सामजिक तनाव और पर्यावरण विनाश के चलते दबाव में आई यूपीए सरकार ने यह कानून बनाया। इसके तहत भूमि अधिग्रहण यदि सरकार द्वारा होता है तो 70 प्रतिशत और कंपनियों द्वारा सीधे होता है तो 80 प्रतिशत लोगों की स्वीकृति अनिवार्य है। इसके साथ सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए) का प्रावधान भी अनिवार्य बनाया गया है।
अध्यादेश में कानून की धारा 10 ए में संशोधन किया गया है कि पांच क्षेत्रों – औद्योगिक गलियारों, पीपीपी (सार्वजनिक निजी भागीदारी परियोजनाओं), ग्रामीण ढांचागत सुविधाओं, रक्षा उत्पादन और आवास निर्माण योजनाओं-के लिए किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण में पूर्व अनुमति और एसआईए की बाध्यता नहीं होगी। इन क्षेत्रों के लिए बहुफसली सिंचित जमीन भी सीधे ली जा सकती है। सरकार ने यह अध्यादेश लाने का फैसला संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने पर 29 दिसंबर को किया। राष्ट्रपति ने जल्दबाजी का कारण पूछा तो सरकार के तीन मंत्री उन्हें स्पष्टीकरण दे आए और राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। इस कानून से किसानों-आदिवासियों की उनकी जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया में जो भूमिका बनी थी, अध्यादेश ने उसे खत्म कर फिर से नौकरशाही और कारपोरेट घरानों को दे दिया है। इन संशोधनों के पक्ष में भाजपा नेता जो तर्क दे रहे हैं, वे कानून बनने के समय देने चाहिए थे। जाहिर है, अध्यादेश लाकर सरकार ने आम चुनाव में कारपोरेट घरानों के समर्थन का मोल चुकाया है।   
ऐसा माना जाता है कि कारपोरेट घरानों ने मनरेगा, भूमि अधिग्रहण कानून और खाद्यान्न सुरक्षा कानून जैसे कदमों से खफा हो मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी की जगह नरेंद्र मोदी पर दांव लगाया था। मनमोहन सिंह शास्त्रीय ढंग से नवउदारवाद के रास्ते पर चलने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री थे। जबकि नरेंद्र मोदी अंधी छलांगें लगा रहे हैं। भाजपा का मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री बताने का प्रचार निराधार था। हालांकि, चुनावी जीत में वह प्रचार काफी कारगर रहा। वे भारत में नवउदारवाद के जनक और प्रतिष्ठापक के बतौर सबसे मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में याद किए जाएंगे । उन्होंने भारत की आर्थिक नीति और उनके लक्ष्य को संविधान की धुरी से उतार कर नवउदारवादी प्रतिष्ठानों – विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच, विविध बहुराष्ट्रीय कंपनियों आदि – की धुरी पर प्रतिष्ठित कर दिया। वे पूरी समझदारी से मानते थे कि विकास का पूंजीवादी रास्ता ही ठीक है। हर्षद मेहता प्रकरण से लेकर भ्रष्टाचार के अद्यतन घोटालों तक उनकी पेशानी पर शिकन नहीं आती थी तो इसीलिए कि वे ईमानदारी से मानते थे कि पूंजीवादी विकास का रास्ता भ्रष्टाचार से होकर गुजरता है। नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही विस्तार हैं इसलिए उनकी सरकार में वही सब नीतियां और कारगुजारियां हैं। लेकिन दोनों में फर्क भी है। मनमोहन सिंह न सत्ता के भूखे थे, न नवउदारवादी उपभोक्तावाद की चकाचैंध से आक्रांत। नरेंद्र मोदी के अति उत्साह के पीछे ये दो कारक सर्वप्रथम हैं।
यह संविधान की मूल भावना में है और 1987 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि अध्यादेश आपात अथवा असामान्य स्थिति में ही लाना चाहिए। ध्यान किया जा सकता है कि अध्यादेशों का सिलसिला मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री काल में ही शुरू हो गया था। वाजपेयी सरकार ने उसे तेजी से आगे बढ़ाया। यूपीए सरकार भी अध्यादेशों की सरकार थी। लेकिन सात महीना अवधि की मौजूदा सरकार ने संसद के सत्र के समानांतर और समाप्ति पर नौ अध्यादेश लाकर संसदीय लोकतंत्र को अभी तक का सबसे तेज झटका दिया है। यह कहना कि अध्यादेशों से संसदीय लोकतंत्र को आघात पहुंचता है, जैसा कि कुछ अंग्रेजी टिप्पणीकारों ने भी कहा है, महज तकनीकी आलोचना है। सवाल है कि पहले की या मौजूदा सरकार ऐसा क्यों करती हैं? इसका उत्तर यही हो सकता है कि सरकारें यह कारपोरेट पूंजीवाद के वैश्विक प्रतिष्ठानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कारपोरेट घरानों के हित में करती हैं।
नवउदारवादी दौर में चुनाव अत्यंत मंहगे हो गए हैं। खबरों के अनुसार पिछले आम चुनाव में भाजपा ने बीस से पच्चीस हजार करोड़ और कांग्रेस ने दस से पंद्रह हजार करोड़ रुपया खर्च किया। यह धन कारपोरेट घरानों से आता है। प्रधानमंत्री बनने के दावेदार नेता पूंजीपतियों के संगठनों/सम्मेलनों में शामिल होकर खुले आम कहते हैं, हमें जितवाइये हम आपका काम करेंगे। भारतीय लोकतंत्र को कारपोरेट घरानों ने हाईजेक कर लिया है। भूमि अधिग्रहण कानून लागू होने के चार महीने बाद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में बनी भाजपा सरकार ने उसे बदलने की मंशा जाहिर कर दी थी। तीस प्रतिशत समर्थन को वह मतदाताओं की नहीं, कारपोरेट घरानों की देन मानती है। ऐसे में बड़े बिजनेस घरानों का हित सरकार के लिए सर्वोपरि हो जाता है। चुनाव में कारपोरेट घरानों का धन नहीं रुकेगा तो उनके हित में लाए जाने वाले अध्यादेश भी नहीं रुकेंगे।
इस अध्यादेश से जल, जंगल, जमीन का पहले से उलझा मसला और जटिल होगा। मंहगा मुआवजा मिल जाने से किसानों-आदिवासियों का ‘मोक्ष’ नहीं हो जाता है। ज्यादातर किसान छोटी जोत वाले होते हैं। जमीन अधिग्रहण के चलते उनमें ज्यादातर न घर के रहते हैं न घाट के। मोटा मुआवजा अक्सर फिजूलखर्ची और व्यसन में जल्दी ही खत्म हो जाता है। बहुत कम लोग मुआवजे का समझदारी से दूरगामी उपयोग कर पाते हैं। गांव की जमीन पर निर्भर रहने वाली दलित एवं कारीगर जातियों को 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के समय से ही कोई मुआवजा राशि, आवासीय प्लाॅट या नौकरी नहीं मिलती है। ऐसे में बिना पूर्व अनुमति और सामाजिक प्रभाव आकलन के जमीन अधिग्रहण से सामाजिक विग्रह तो बढ़ेगा ही, नक्सली हिंसा में इजाफा हो सकता है।
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का एक महत्वपूर्ण सबक यह है कि कुछ भले लोगों का नवउदारवादी दायरे में सरकार के सलाहकार बन कर किसानों-आदिवासियों-मजदूरों को कुछ राहत दिलवाने का गैर-राजनीतिक प्रयास स्थायी नहीं हो सकता। उन्हें समझना होगा कि जनता की जिस जागरूकता और सक्रियता की वे बात वे अपने एनजीओ कर्म के तहत करते हैं, उसका बिना राजनीतिक सक्रियता के कोई अर्थ नहीं है।
कांग्रेस समेत ज्यादातर पार्टियों ने इस अध्यादेश का विरोध किया है। कई जन संगठन, किसान संगठन और महत्वपूर्ण लोग भी विरोध में हैं। जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने अपने बयानों और लेखों में कड़ी आलोचना दर्ज की है। हो सकता है भाजपा का किसान प्रकोष्ठ भी विरोध करे। उससे संबद्ध मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने सरकार के खिलाफ हाल में हुई कोल माइंस वर्कर्स यूनियन की सांकेतिक हड़ताल में अन्य मजदूर संगठनों के साथ मिल कर हिस्सा लिया है। यह विरोध तभी सार्थक है जब ये सब पार्टियां और संगठन नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का भी विरोध करें। यानी विकास के पूंजीवादी मॉडल का विरोध। विरोध के साथ कुछ फौरी कदम भी उठाने चाहिए। राजनीतिक पार्टियों को भूमि अधिग्रहण कानून की मजबूती के साथ, जैसा कि सोशलिस्ट पार्टी की मांग है, एक भूमि उपयोग आयोग (लैंड यूज कमीशन ) बनाने की पहल करनी चाहिए। उसमें किसानों और आदिवासियों का समुचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में किसान आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उसके कई महत्वपूर्ण विचारक ओर नेता रहे हैं। आजादी के बाद चौधरी चरण सिंह से लेकर नंजुदास्वामी व किशन पटनायक तक खेती-किसानी के स्वरूप व समस्याओं पर गहराई से विचार करने वाले लोग हुए हैं। इस विरासत को विकास के विमर्श का हिस्सा बनाना चाहिए।
प्रेम सिंह

About The Author

समाजवादी चिंतक डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। 
साभार : http://www.hastakshep.com/columnist/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%AF-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-columnist/2015/01/09/%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%AE%E0%A4%BF-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A4%A3-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%B2?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

Wednesday, 31 December 2014

भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था गांधी की हत्या

राम पुनियानी

भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था गांधी की हत्या

भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था गांधी की हत्या

 

पुनरूत्थान गोडसे के महिमामंडन का

समय बदल रहा है और इस परिवर्तन की गति काफी तीव्र है। पिछले कुछ दशकों में अधिकांश हिन्दू राष्ट्रवादियों को अपने नायक नाथूराम गोडसे के प्रति अपने प्रशंसाभाव को दबा-छिपाकर रखने की आदत-सी पड़ गई थी। कभी कभार, कुछ कार्यक्रमों में उसका गुणगान किया जाता था परंतु ऐसे कार्यक्रम बहुत छोटे पैमाने पर आयोजित होते थे और उनका अधिक प्रचार नहीं किया जाता था। पिछले कुछ सालों में, प्रदीप दलवी के मराठी नाटक मी नाथूराम बोलतोए (मैं नाथूराम बोल रहा हूं), जिसमें गांधी पर कटु हमला और गोडसे की तारीफ की गई है, का मंचन महाराष्ट्र में कई स्थानों पर हुआ और नाटक देखने के लिए भारी भीड़ भी उमड़ी। इस नाटक का अलग-अलग लोगों द्वारा समय-समय पर विरोध भी किया जाता रहा है।
मई 2014 में दिल्ली में नई सरकार आने के बाद से साम्प्रदायिक भाषणबाजी, टिप्पणियों और कार्यकलापों में तेजी से वृद्धि हुई है। ऐसा लगता है कि सत्ताधारी वर्ग इन हरकतों का मूकदर्शक बना रहना चाहता है। यह निष्कर्ष इसलिए तार्किक प्रतीत होता है क्योंकि अब तक गोडसे प्रशंसकों को न तो किसी सत्ताधारी ने फटकार लगाई है और ना ही उनका विरोध किया है। सरकार में रहने की मजबूरी के चलते वे गोडसे प्रशंसक क्लब के सदस्य तो नहीं बन सकते परंतु वे उसकी निंदा भी नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे स्वयं भी हिन्दू राष्ट्रवाद की गोडसे विचारधारा में आस्था रखते हैं। इस हिन्दू राष्ट्रवाद को ‘राष्ट्रवाद‘ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। हिन्दू शब्द का उच्चारण इतने धीमे स्वर में किया जाता है कि वह सुनाई ही नहीं देता।
गोडसे प्रशंसक क्लब की सबसे ताजा गतिविधि है मेरठ में 25 दिसम्बर 2014 को हिन्दू महासभा द्वारागोडसे के मंदिर के निर्माण के लिए भूमिपूजन । अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के कार्यकर्ता, महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मेरठ में देश का पहला मंदिर बनाने जा रहे हैं। हिन्दू महासभा के कई कार्यालयों में गोडसे की मूर्ति स्थापित करने की तैयारी चल रही है। हिन्दू महासभा ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि दिल्ली में गोडसे की मूर्ति स्थापित करने के लिए उसे भूमि आवंटित की जाए। गोडसे की किताब का द्वितीय पुनर्मुद्रित संस्करण बाजार में आ चुका है।
भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कुछ समय पहले गोडसे को राष्ट्रवादी बताया था। बाद में वे अपने बयान से पीछे हट गए ताकि सत्ताधारी भाजपा परेशानी में न फंस जाए। भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस ने आतंरिक वितरण के लिए दो नई पुस्तकें जारी की हैं। इन पुस्तकों का उद्धेश्य है संघ के प्रचारकों और स्वयंसेवकों को उसकी विचारधारा से परिचित करवाना। इन पुस्तकों के शीर्षक हैं, ‘आरएसएस-एक परिचय‘ व ‘आरएसएस-एक सरल परिचय‘। इनमें से दूसरी पुस्तक के लेखक आरएसएस के वरिष्ठ सदस्य एम. जी. वैद्य हैं। वैद्य का कहना है कि ‘आरएसएस के चारों ओर आरोपों का घेरा बना दिया गया है‘। इस पुस्तक का उद्धेश्य, आरोपों के इस घेरे से आरएसएस को बाहर निकालना है।
जहां प्रधानमंत्री मोदी इस मुद्दे पर मौन धारण किए हुए हैं वहीं विपक्षी नेताओं ने हिन्दू महासभा व अन्यों द्वारा गोडसे के कृत्य का महिमामंडन करने के प्रयास की कड़ी आलोचना की है।
गोडसे और आरएसएस का क्या रिश्ता था? क्या वह आरएसएस का सदस्य था और क्या उसने बाद में संघ छोड़ दिया था या फिर उसने संघ का सदस्य रहते हुए, सन् 1930 के मध्य में, हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली थी? आधिकारिक रूप से आरएसएस हमेशा यह कहता आया है कि उसका गोडसे से कोई लेनादेना नहीं है और गोडसे ने जब महात्मा गांधी की हत्या की थी, उस समय वह संघ का सदस्य नहीं था। इस बहाने, आरएसएस हमेशा से गोडसे से अपना पल्ला झाड़ता रहा है। यहां यह याद करना मुनासिब होगा कि सन् 1998 में तत्कालीन आरएसएस प्रमुख प्रो. राजेन्द्र सिंह ने कहा था कि ‘गोडसे अखंड भारत की परिकल्पना से प्रेरित था। उसका उद्धेश्य पवित्र था परंतु उसने गलत साधनों का इस्तेमाल किया‘ (‘आउटलुक‘, अप्रैल 27, 1998)।
हम इस पूरे मुद्दे को कैसे देखें? इसे समझने के लिए सबसे पहले हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को समझना आवश्यक है-उस राजनीति को, जिसके कर्ताधर्ता हिन्दू महासभा और आरएसएस थे। ये दोनों संगठन स्वाधीनता संग्राम से दूर रहे। हिन्दू महासभा की रूचि हिन्दू साम्प्रदायिक राजनीति के झंडाबरदार बतौर राजनीति में प्रवेश करने में थी। आरएसएस, अपने कार्यकर्ताओं का जाल खड़ा करना चाहता था और अलग-अलग संगठन बनाकर शिक्षा, संस्कृति व राज्यतंत्र में घुसपैठ करने का इच्छुक था। इन दोनों संगठनों के एजेन्डा में अनेक समानताएं थीं क्योंकि दोनों, मूलतः हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए काम कर रहे थे। नाथूराम गोडसे इन दोनों संगठनों की विचारधारा के ‘अद्भुत मिलन‘ का प्रतीक था।
आरएसएस, गोडसे को स्वयं से इसलिए अलग कर सका क्योंकि संघ के सदस्यों का कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं रखा जाता था और इसलिए कानूनी दृष्टि से संघ को गोडसे से जोड़ना संभव नहीं था। गोडसे ने सन् 1930 में आरएसएस की सदस्यता ली और जल्दी ही वह उसका बौद्धिक प्रचारक बन गया। हिन्दू महासभा और आरएसएस की तरह, वह भी अखंड भारत – अर्थात वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यानमार का संयुक्त भूभाग – की परिकल्पना का जबरदस्त समर्थक था।
कट्टर हिंदुत्ववादी होने के नाते, वह गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत और उनके नेतृत्व में चलाए गए ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन का कटु आलोचक था। गोडसे, स्वाधीनता संग्राम में गांधी की भूमिका में कुछ भी अच्छा नहीं देखता था। आरएसएस और हिन्दू महासभा, गांधी की लगातार इस बात के लिए आलोचना करते थे कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में सभी धार्मिक समुदायों को भागीदार बनाया। गांधी की मान्यता यह थी कि धर्म एक व्यक्तिगत मसला है और उनका प्रयास था कि सभी देशवासी, धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर, भारतीय के रूप में अपनी पहचान स्थापित करें। हिन्दू महासभा और आरएसएस को यह बर्दाश्त नहीं था क्योंकि वे चाहते थे कि केवल हिन्दुओं को ही भारतीय के रूप में स्वीकार किया जाए। गांधी के राष्ट्रवाद का मूल्यांकन, गोडसे, हिन्दू राजाओं के राष्ट्रवाद की कसौटी पर करता था। गांधीजी का मूल्यांकन करने के लिए वह बहुत अजीब मानकों का इस्तेमाल करता था। ‘उनके (गांधी) समर्थक वह नहीं देख पा रहे हैं जो किसी अंधे को भी साफ-साफ दिखाई दे सकता है और वह यह कि शिवाजी, राणाप्रताप और गुरू गोविंद सिंह के सामने गांधी एकदम बौने हैं‘ (वाय आई एसेसिनेटिड गांधी, 1993, पृष्ठ 40) व ‘जहां तक स्वराज और स्वाधीनता प्राप्त करने का सवाल है, उसमें महात्मा का योगदान नगण्य था‘ (पूर्वोक्त, पृष्ठ 87)।
वह महात्मा को मुसलमानों का तुष्टिकरण करने का दोषी और पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार मानता था। आरएसएस और हिन्दू महासभा से अपने जुड़ाव के बारे में वह लिखता है, ‘‘हिन्दुओं की बेहतरी के लिए काम करते हुए मुझे यह अहसास हुआ कि हिन्दुओं के न्यायपूर्ण अधिकारों की रक्षा के लिए राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेना आवश्यक है। इसलिए मैंने संघ छोड़कर हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली‘‘ (पूर्वोक्त पृष्ठ 102)।
उस समय हिन्दू महासभा एकमात्र हिन्दुत्ववादी राजनैतिक दल था। गोडसे, महासभा की पुणे शाखा का महासचिव बन गया। कुछ समय बाद उसने एक अखबार का प्रकाशन शुरू किया जिसका वह संस्थापक संपादक था। अखबार का शीर्षक था ‘अग्रणी या हिन्दू राष्ट्र‘। यह साफ है कि गांधी की हत्या, उन कारणों
(देश का विभाजन और पाकिस्तान को उसके 55 करोड़ रूपये चुकाने पर गांधीजी का जोर), से नहीं की गई थी, जिनका ये संगठन प्रचार करते हैं। गांधी की हत्या इसलिए की गई क्योंकि हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों और गांधी की राजनीति में बुनियादी मतभेद थे। इन दोनों कारणों को तो केवल बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
जब गोडसे कहता है कि उसने आरएसएस छोड़ दिया था, तब उसका क्या अर्थ है? क्या यह सच है? गोडसे के आरएसएस छोड़ने के पीछे के सच का खुलासा उसके भाई गोपाल गोडसे ने ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया‘ (25 जून 1998) को दिए गए एक साक्षात्कार में किया। गोपाल गोडसे, जो कि गांधी हत्या में सहआरोपी था, नाथूराम गोडसे के इस बयान कि ‘उसने आरएसएस छोड़ दिया था‘ के बारे में कहता है, ‘‘उनकी (गांधी) तुष्टिकरण की नीति-जो सभी कांग्रेस सरकारों पर लाद दी गई थी-ने मुस्लिम अलगाववादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया और इसका अंतिम नतीजा पाकिस्तान के निर्माण के तौर पर सामने आया…तकनीकी और सैद्धांतिक दृष्टि से वे (नाथूराम) सदस्य (आरएसएस के) थे परंतु उन्होंने बाद में उसके लिए काम करना बंद कर दिया था। उन्होंने अदालत में यह बयान कि उन्होंने आरएसएस छोड़ दिया था इसलिए दिया था ताकि हत्या के बाद गिरफ्तार किए गए आरएसएस कार्यकर्ताओं की सुरक्षा हो सके। वे यह समझते थे कि उनके आरएसएस से स्वयं को अलग कर लेने से उन्हें (आरएसएस कार्यकर्ताओं) को लाभ होगा और इसलिए उन्होंने खुशी-खुशी यह किया‘‘।
गोडसे के आरएसएस छोड़ने का दावा करने का असली कारण यह था। गोडसे की दोहरी सदस्यता (आरएसएस व हिन्दू महासभा) से दोनों ही संगठनों को कोई परेशानी नहीं थी। इस तरह, यह स्पष्ट है कि गांधी की हत्या के पीछे हिन्दुत्व की राजनीति की दोनों धाराएं-आरएसएस व हिन्दू महासभा- थीं। गोडसे के संपादन में प्रकाशित समाचारपत्र का शीर्षक ‘हिन्दू राष्ट्र‘ भी इसी तथ्य को रेखांकित करता है। गांधी की हत्या को हिन्दू महासभा व आरएसएस दोनों की ही स्वीकृति प्राप्त थी और उनके कार्यकर्ताओं ने हत्या के बाद, मिठाईयां बांटकर जश्न भी मनाया था। ‘उसके (आरएसएस) सभी नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक  जहर से भरे रहते थे। इसका अंतिम नतीजा यह हुआ कि देश में ऐसा जहरीला वातावरण बन गया जिसके चलते इतनी भयावह त्रासदी संभव हो सकी। आरएसएस के लोगों ने इस पर अपनी खुशी का इजहार किया और गांधी की मृत्यु के बाद मिठाईयां बांटी‘ (सरदार पटेल के एम. एस. गोलवलकर और एस. पी. मुकर्जी को लिखे पत्रों से उद्वत)। गोडसे सनकी नहीं था। जो कुछ उसने किया, वह हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा गांधी के खिलाफ फैलाए जा रहे जहर का तार्किक परिणाम था। और गोडसे को तो आरएसएस व हिन्दू महासभा दोनों की शिक्षाओं का ‘लाभ‘ प्राप्त था। वे गांधी की हत्या के लिए ‘वध‘ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। सामान्यतः इस शब्द का इस्तेमाल उन राक्षसों की हत्या के लिए किया जाता है जो कि समाज के शत्रु हों। एक अर्थ में, गांधी की हत्या, भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था। इसने उसके आगे की राह प्रशस्त की और पिछले कुछ दशकों में हिन्दुत्ववादी राजनीति कहां से कहां जा पहुंची है, हम सब इससे वाकिफ हैं।
यद्यपि आधिकारिक रूप से संघ परिवार गोडसे के हाथों गांधी की हत्या से स्वयं को अलग रखता है परंतु निजी बातचीत में उसके सदस्य न केवल इस कायराना हरकत को उचित ठहराते हैं बल्कि महात्मा गांधी के महत्व और उनकी महानता को कम करके बताते हैं। उन्हें गोडसे से पूरी सहानुभूति है। यह चालबाजी, यह दोगलापन अब तक चला आ रहा था। मोदी सरकार के आने के बाद अब इस सच को छुपाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। और इसलिए गोडसे का महिमामंडन बिना किसी लागलपेट के, पूरे जोशोखरोश से किया जा रहा है। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)
(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)
                                                               O -राम पुनियानी
sabhar :http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/views/2014/12/31/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

Saturday, 27 December 2014

खत्म नहीं हुई औरत को गुलाम मानने की सोच

Not ending thinking about women as slave
Updated @ 9:02 PM IST

      आज जब मल्टी रिलेशनशिप और ब्रेकअप को पार्टी देकर सेलिब्रेट करने का जमाना है, ऐसे में एक डॉक्टर अपनी सहयोगी और सहपाठी डॉक्टर के प्यार में इतना पागल हो गया कि उसने कुछ किशोरों को उस पर तेजाब फेंकने की ट्रेनिंग दी। बताया कि सिरिंज से किस तरह तेजाब फेंकना है, जिससे कम नुकसान हो। यह डॉक्टर इस महिला डॉक्टर से नाराज था, क्योंकि उसने कभी उसके प्यार का जवाब नहीं दिया था। हां, वह उसे अपना सबसे अच्छा दोस्त जरूर मानती थी। इसीलिए जब उस पर हमला हुआ, तो उसने सबसे पहले उसे ही फोन किया।

हमारी पीढ़ी के लोगों के जमाने में मुकेश की आवाज में एक गाना खूब बजता था-तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी। और वह मुश्किल बेचारी लेडी डॉक्टर को अपने चेहरे और आंख पर तेजाब के हमले के रूप में झेलनी पड़ी। डॉक्टरों का कहना है कि उसकी आंख की रोशनी शायद ही वापस आ पाएगी। एक हंसते-खिलखिलाते जीवन को एक ईर्ष्यालु पुरुष ने इस तरह रौंद दिया। पढ़-लिखकर भी वह मानसिकता नहीं बदली कि मैं पुरुष अगर किसी स्त्री को चाहता हूं, तो उस स्त्री को मना करने का, किसी और को पसंद करने का कोई हक नहीं। स्त्री नहीं, मेरी गुलाम। और अगर वह ऐसा करेगी, तो जान से हाथ धो बैठेगी या इस प्रकार के तेजाबी हमलों का शिकार होगी। स्त्री दुनिया के हर आदमी की जैसे जागीर है।

लेकिन आजकल इस तरह के कुप्रयास भारी पड़ते हैं। अपराधी बचने की कोशिश करते-करते पकड़े जाते हैं। हालांकि दुख इस बात का है कि ऐसे जघन्य अपराधों के मामलों में भी कोई खास सजा नहीं मिलती। हां, ऐसे अपराधों की शिकार महिलाओं को जरूर जीवन भर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। ऐसी महिलाओं को एसिड अटैक सरवाइवर कह देने भर से ही बात नहीं बनती। पिछले दिनों दिल्ली में तेजाब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। मगर रोक सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहती है। जितनी रोकें लगती हैं, उनकी जांच करने वाले अधिकारियों की जेबें भरती चली जाती हैं। वर्ना ऐसा कैसे हुआ कि हमलावर किशोर खुले बाजार से पैंतालीस रुपये का तेजाब खरीद सका। इस कांड के आरोपी किशोरों ने पच्चीस हजार रुपये के लिए इस कृत्य को अंजाम दिया। जब दिल्ली में यह हाल है, तो छोटे शहरों में क्या होता होगा? महिला डॉक्टर पर एसिड फेंकने वाले इन नाबालिग किशोरों को सजा हुई भी, तो मात्र तीन साल की होगी। जबकि विदेशों में अगर नाबालिग होते हुए भी किसी किशोर ने बड़ों जैसा अपराध किया है, तो उस पर बड़ों का कानून लागू होता है। बाल विकास मंत्री मेनका गांधी भी अपराधों में किशोरों की बढ़ती भागीदारी और कम दंड मिलने के बारे में कई बार खुलेआम चिंता प्रकट कर चुकी हैं। सरकार ने भी बार-बार कहा है कि तेजाब से हमला करने वालों से कठोरता से निपटा जाना चाहिए। लेकिन कब और कैसे?

होना तो यह चाहिए कि जिस डॉक्टर ने यह हमला कराया, उसे और इन हमलावर किशोरों को कड़ी सजा मिले। उस महिला के इलाज और प्लास्टिक सर्जरी का खर्च और भारी मुआवजा भी इस डॉक्टर से वसूला जाना चाहिए। जब तक ऐसे अपराधी बचते रहेंगे, इनसे सीख लेकर और हमले होते रहेंगे। अफसोस इसका है कि औरतों को इस बर्बर पुरुष मानसिकता का शिकार उस दौर में होना पड़ रहा है, जब हम महिलाओं की सुरक्षा और चौतरफा विकास की बात लगातार कर रहे हैं। यह कैसा विकास है, जहां औरतों को सबक सिखाने के लिए दरिंदे हर नुक्कड़, चौराहे यहां तक कि घरों में भी मौजूद हैं!
साभार : http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/columns/not-ending-thinking-about-women-as-slave-hindi/