जो खुली नजरों से ओझल है': अरुंधति से बातचीत की दूसरी किस्त
Posted by Reyaz-ul-haque on 9/29/2014 08:44:00 PMआपने लीना चंद्रन के साथ मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय की लंबी बातचीत की पहली किस्त पढ़ी. पेश है बातचीत का दूसरा और बाकी का पूरा हिस्सा. अनुवाद: रेयाज उल हक.
गांधी ने पुलय राजा के नाम से मशहूर पुलय अछूतों के नेता अय्यनकली से मिलने के लिए 14 जनवरी 1937 को तिरुअनंतपुरम के वेंगनुर का दौरा किया था. उन्होंने अछूत नौजवानों के साथ थोड़ी देर बातचीत भी की थी. उनमें से एक के. आर. वेलायुधन भी थे, जो भारत के पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन के बड़े भाई थे. वेलायुधन ने गांधी से पूछा था कि स्वराज में वे पुलयों को क्या ओहदा देंगे. गांधी ने जवाब दिया कि वे एक हरिजन को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में नियुक्त करेंगे.
गांधी हमेशा बड़े मजे से ‘हरिजनों’ की सरपरस्ती करते और उन्हें मुफ्त की सलाह देते थे. रेवरेंड जॉन मॉट के साथ 1936 में एक मशहूर बातचीत में, जिसमें उन्होंने ‘हरिजनों’ के बीच रेवरेंड के मिशनरी काम पर आपत्ति जताई थी, गांधी ने कहा, ‘डॉ. मॉट क्या आप शुभ संदेश को एक गाय को सुनाना पसंद करेंगेॽ खैर, समझदारी के मामले में इन अछूतों में से कुछ तो गायों से भी बदतर हैं. मेरा मतलब है कि वे इस्लाम, हिंदूवाद और ईसाइयत में उससे ज्यादा फर्क नहीं कर सकते, जितनी एक गाय कर सकती है.’
यहां तक कि आज भी लोग अय्यनकली को गांधी द्वारा ‘पुलय राजा’ कहे जाने को बड़े आराम से कबूल कर लेते हैं. इसी तरह डॉ. आंबेडकर को अक्सर ‘अछूतों का नेता’ कहा जाता है, लेकिन तब क्या हो अगर अय्यनकली या आंबेडकर या कोई भी दूसरा व्यक्ति गांधी को आज एक बनिया महात्मा कहेॽ जुलूस निकलेंगे, पुलिस में मुकदमे किए जाएंगे. दलितों को महज प्रतीकात्मक राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के बजाए दलितों द्वारा खुद अपना प्रतिनिधि चुनने के सवाल पर गांधी के असली नजरिए और कामों की कहानी जानने के लिए एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट पढ़िए. और साथ में दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान गांधी और आंबेडकर के बीच आमने-सामने हुई पहली बहस को भी पढ़िए.
जब भारत के पहले दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन 25 साल के थे और द टाइम्स ऑफ इंडिया के संवाददाता हुआ करते थे, वे गांधी से बंबई में मिले थे. उनके पास गांधी के लिए एक सवाल था: ‘जब इंग्लैंड में मुझसे भारत में अस्पृश्यता के मुद्दे के बारे में पूछा जाए तो क्या मुझे एक हरिजन के बतौर जवाब देना चाहिए या एक भारतीय के रूप में जवाब देना चाहिएॽ’ और गांधी ने फौरन जवाब दिया: ‘जब आप विदेश में हों तो आप कहेंगे कि यह हमारा आंतरिक मामला है, जिसे एक बार ब्रिटिश भारत को छोड़ दें तो हम सुलझा लेंगे.’
इसीलिए गांधी आंबेडकर के इतने खिलाफ थे- क्योंकि उन्होंने आजादी हासिल होने तक जाति के सवाल पर चुप रहने से इन्कार कर दिया था. गोलमेज सम्मेलन में उनके बीच में इसी को लेकर टकराव हुआ था. यह बात है कि जब सत्ताधारी या ताकतवर लोग जैसे ही कहें कि ‘यह एक आंतरिक मामला है’ तो हमें इसको एक अपशगुन के रूप में लेना चाहिए. इसका अगला कदम होता है ‘बाहरी’ लोगों को सारी राजनीतिक अशांति का दोषी बताया जाना. इसके बाद वे हमें बताते हैं कि कौन ‘बाहरी’ है और कौन ‘भीतरी’, कौन ‘असली’ भारतीय है और कौन नहीं, कौन ‘असली’ हिंदू और कौन नहीं, कौन ‘असली’ मुसलमान है और कौन नहीं और आपके पता लगने से पहले ही धार्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तथा हर तरह की हठधर्मिता, झगड़ते हुए प्रेतों की तरह, आपके दरवाजे पर बैठी भीतर आने देने की गुहार कर रही होगी.
आशीष नंदी की किताब इंटिमेट एनेमी: लॉस एंड रिकवरी ऑफ सेल्फ अंडर कोलोनियलिज्मआपकी ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ के संदर्भ ग्रंथों की सूची में शामिल है. हाल में एक मलयाली साप्ताहिक में दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने गांधी पर आपकी राय से अपनी असहमति जताई है. उन्होंने कहा: ‘अरुंधति मेरी दोस्त हैं. वे एक अच्छी लेखक हैं. लेकिन मैं उनकी टिप्पणियों को गंभीरता से नहीं लेता. एक बार उन्होंने नक्सलवादियों को बंदूकधारी गांधीवादी बताया था. देखते हैं कि वे गांधी पर अपनी राय को बदलती हैं या नहीं. गांधी ने जाति व्यवस्था को काम और कर्तव्य पर आधारित व्यवस्था बनाने की कोशिश की. अस्पृश्यता जैसे व्यवहारों के बारे में उनका एक यथार्थवादी रवैया था. गांधी को ढेर सारी आलोचनाएं हासिल हुई हैं. लेकिन यह कहना बकवास है कि उनका काम साजिश का हिस्सा था.’
मुझे उम्मीद है कि आप उन्हें सही सही उद्धृत कर रही हैं. मेरे लिए इस पर यकीन करना मुश्किल है कि उन्होंने यह सब कहा है, हालांकि उन्होंने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में दलितों के लिए जो कुछ कहा था उस पर यकीन करना भी मुश्किल था. आशीष नंदी एक वरिष्ठ प्रोफेसर और एक हैसियत रखने वाले सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं. इसलिए मैं इस पर बाल की खाल नहीं निकालूंगी कि उनका लहजा सरपरस्ती भरा है या मैंने जो लिखा है, उसे पढ़े बिना ही उन्होंने बिना किसी संकोच के उस पर टिप्पणी की है (उन्होंने नयनतारा सहगल पर, उनकी नई किताब के हाल में ही हुए विमोचन के मौके पर ऐसी ही मेहरबानी की है). मैं मान लेती हूं कि उन्होंने यह सब कुछ कहा है, और तब आइए हम बस कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं.
पहला: मैंने कभी भी नक्सलवादियों को ‘बंदूकधारी गांधीवादी’ नहीं कहा है. मैं उतनी बेवकूफ नहीं हूं. यह आउटलुक के कॉपी एडिटर द्वारा लगाया गया फोटो कैप्शन था. मैं इस विद्वान प्रोफेसर से यह उम्मीद करूंगी कि लापरवाही में ऐसे ही टिप्पणी करने से पहले वे मेरे लिखे को – इस मामले में मेरे निबंध ‘वॉकिंग विद द कॉमरेड्स’ को – सावधानी के साथ पढ़ने की मेहरबानी करें.
दूसरा: गांधी ने ‘जाति व्यवस्था को काम और कर्तव्य पर आधारित व्यवस्था बनाने की कोशिश’ नहीं की. गांधी से कुछ हजार साल पहले से जो जाति व्यवस्था चली आ रही थी, वह काम और कर्तव्य पर आधारित व्यवस्था थी. इसमें लोगों को परंपरागत और खानदानी पेशे सौंपे गए थे और उन्हें कर्तव्यों और हकदारियों के एक दर्जावार खांचे में बंद कर दिया गया था. जाति के खिलाफ पूरा संघर्ष इसी के बारे में है!
तीसरा: मुझे यह पक्का पता नहीं कि ‘अस्पृश्यता जैसे व्यवहारों के बारे में एक यथार्थवादी रवैए’ का क्या मतलब है. सच में, इसका क्या मतलब हैॽ
चौथा: मैंने कभी नहीं कहा कि गांधी का काम किसी साजिश का हिस्सा था.
पांचवा: मैं गांधी के बारे में अपनी राय नहीं बदलूंगी.
वैसे लोग यह क्यों कहते हैं कि ‘वह एक महान लेखिका है॒ और फिर मेरे नाम के साथ ऐसी बेवकूफी भरी बातें जोड़ देते हैं, जो मैंने कभी नहीं कहींॽ मैं कभी कभी सोचती हूं कि क्या यह कोई मर्दानगी का मामला हैॽ सबसे पहले तो इस मामले में यह बात कोई मायने नहीं रखती कि मैं एक महान लेखिका हूं या एक महान बेवकूफ. क्यों नहीं सिर्फ उस पर बात की जाए, जो मैंने लिखा हैॽ या अगर इसमें बड़ी मेहनत लगनी है, तो क्यों नहीं सिर्फ उन बातों पर बात की जाए जो गांधी ने कही थींॽ उन्हें खारिज कीजिए, उनका खंडन कीजिए, उनसे बहस कीजिए. कहिए कि मैंने उन्हें अपने से गढ़ा है. कहिए कि कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा (गांधी वांग्मय) फर्जी है. किसी के बचाव का यह कैसा तरीका हैॽ
एक मशहूर इतिहासकार एम.जी.एस. नारायण ने आपके नजरिए की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा है: ‘एक अच्छे उपन्यासकार के बतौर अरुंधति की हैसियत उन्हें इसके लायक नहीं बनाती कि वे इतिहास और राजनीति पर टिप्पणियां करें...उन्हें डॉ. बी.आर. आंबेडकर, अय्यनकली और मार्क्सवादियों को खुश करने के लिए हमारे राष्ट्रपिता का अपमान करने के बजाए कोई दूसरा उपाय खोजना चाहिए था...’
मुझे यह बात अच्छी लगी कि वे ऐसा सोचते हैं कि मैं लोगों को खुश करने की कोशिश कर रही हूं – यह तो मेरी कायापलट ही है! लेकिन इतिहास की अपनी समझ से एम.जी.एस. नारायण को यह पता होना चाहिए था कि आंबेडकरियों और मार्क्सवादियों को एक ही साथ खुश करना असल में नामुमकिन है. जो भी हो, यहां भी हमें फिर से वही बात मिलती है - ‘एक अच्छे उपन्यासकार के बतौर अरुंधति की हैसियत उन्हें इसका अधिकार नहीं देती...’ ! अरुंधति रॉय के अधिकारों और कर्तव्यों का वही मुद्दा. वही मर्दानगीॽ या फिर यह जाति का वही धोखेबाज चेहरा हैॽ एक अच्छा (अच्छी) उपन्यासकार किन किन विषयों पर टिप्पणी कर सकती हैॽ इतिहास नहीं, राजनीति नहीं, तो फिर क्याॽ बेबी फैशनॽ चमड़ी की देखभालॽ क्या कोई सूची बनाई गई हैॽ क्या अच्छे (अच्छी) उपन्यासकारों को कम से कम, राष्ट्रपिता को उद्धृत करने की इजाजत हैॽ या फिर हमें इसके लिए तीन प्रतियों में अपनी अर्जी पेश करनी होगीॽ क्या हमें सिर्फ जाने-माने इतिहासकारों द्वारा प्रमाणित चुने हुए उद्धरणों का ही इस्तेमाल करना होगाॽ
गांधी को उद्धृत करने के सवाल पर तिरुअनंतपुरम में एक यूथ कॉन्ग्रेस सेमिनार में बोलते हुए शशि थरूर ने इसकी तरफ ध्यान दिलाया कि गांधी ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया था, वे इतिहास के उस खास दौर से ताल्लुक रखते थे और उनके आधार पर कोई उनकी आलोचना नहीं कर सकती. उन्होंने यह भी कहा कि गांधी का नजरिया 21वीं सदी के भी अनुकूल है और उनके संदेश पूरी तरह ट्वीट करने लायक हैं. उन्होंने यह भी कहा कि गांधी-विरोधी विवादास्पद टिप्पणियां उस महापुरुष के बारे में आपकी गलत समझ का नतीजा हैं.
आह, मैं बेचारी-भ्रमित, चीजों को समझने में नाकाबिल, मैंने सबकुछ गलत समझा-शायद मुझे कोचिंग क्लासेज की जरूरत है. देखिए, मैंने गांधी विरोधी विवादास्पद टिप्पणियां नहीं की हैं. मैंने गांधी द्वारा कही गईं कुछ बेहद विवादास्पद बातों को उद्धृत किया है. अगर एक सांसद और जानेमाने लेखक शशि थरूर मानते हैं कि गांधी का काम और उनका बयान – काले अफ्रीकियों को ‘काफिर’ और ‘जंगली’ कहना, दक्षिण अफ्रीका में औपनिवेशिक युद्ध में ब्रिटिशों का साझीदार बनना और यह कहना कि ‘अछूत’ गायों से कम समझदार हैं – गांधी के दिनों में कबूल करने लायक थे और 21वीं सदी के लिए भी जायज हैं, तब यह बात थरूर के बारे में काफी कुछ बता देती है. यह बताती है कि जाति और नस्ल के बारे में उनका क्या नजरिया है, इतिहास की उनकी क्या जानकारी है – गांधी के पैदा होने के भी काफी पहले से भारत में दूसरे लोग जो कर रहे थे, कह रहे थे और लिख रहे थे इसके बारे में उनकी क्या जानकारी है.
बुजुर्ग मलयाली कवि और कार्यकर्ता सुगताकुमारी ने भी आपकी इस टिप्पणी पर आपकी खिंचाई की है कि गांधी की आम तौर पर स्वीकृत सार्वजनिक छवि पूरी तरह झूठ थी. उन्होंने आप पर गांधी के प्रति और महात्मा शब्द के प्रति नफरत से भरे होने का आरोप लगाया है.
जहां तक सुगताकुमारी के गुस्से की बात है – मुझे यह कहने दीजिए कि झूठ सिर्फ वही नहीं होता, जो आप किसी को बताते हैं, बल्कि झूठ वह भी होता है जिसे बिना कहे छोड़ दिया जाता है. मैंने यह जो बात कही कि पाठ्यपुस्तकों में जिस गांधी को परोसा गया है वह झूठ है, उसके पीछे की वजह यह है कि उनके जीवन और समय और लेखन के बारे में बहुत ही परेशान कर देने वाली बातें छोड़ दी गई हैं. जो चीज छोड़ दी गई है और जो चीज रखी गई है, इस चुनाव के पीछे एक पैटर्न है और राजनीति है जो चीजों को गंभीर तरीके से झूठ बनाती है.
गांधी के इन पहलुओं से निबटने की तो छोड़ ही दीजिए, उनका सामना करने की नाकाबिलियत उनका बचाव करने वालों की छवि को धूमिल कर रही है. मुझे ऐसा लगता है कि वे मुझ पर गांधी को न पढ़े होने का जो इल्जाम लगा रहे हैं, वे खुद इसके दोषी है. और अगर सचमुच उन्होंने गांधी को पढ़ रखा है, तब तो मैं चीजों तो जितना सोच रही हूं, वे उससे भी खतरनाक हैं. आप गांधी को उन पूर्वाग्रहों से - जिन्हें गांधी खुद सार्वजनिक रूप से खुशी खुशी कबूल करते थे - दोषमुक्त दिखाने के लिए द आयडियल भंगी की व्याख्या कितनी भी घुमा फिरा कर करें, यह रचना आधी सदी में पसरे एक राजनीतिक सफरनामे की सिर्फ एक कृति है. जाति के सवाल पर गांधी का नजरिया और उनका काम एक ही जैसे बने रहे. मैं इन नजरियों के प्रति नफरत से नहीं भरी हूं, नहीं. मैं उनके बारे में जो महसूस करती हूं, उसे बताने के लिए ‘नफरत’ एक बहुत ही हल्का और अधूरा शब्द है.
साहित्यिक आलोचक और कालीकट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रहे एम.एन. कारासरी ने एक लेख में आपकी हिमायत करते हुए कुछ दिलचस्प बातें कही हैं: ‘इन पागलपन भरे विवादों के बीच, यह बात बार बार स्थापित की जा रही है कि गांधी पवित्र हैं. लेकिन राजनीतिक नेताओं को इस पर गौर करना चाहिए कि इस जमीन पर पवित्र कही जाने वाली कोई चीज नहीं है. उसे होना भी नहीं चाहिए. यहां हर चीज धर्मनिरपेक्ष है. अगर कुछ ‘पवित्र’ है तो वह कहने की आजादी की राह में रोड़ा है और हमारे संविधान के खिलाफ है.’
ऐसी समझदारी और साफगोई के लिए बहुत आभार महसूस होता है. लेकिन इस देश के बारे में यही बात शानदार है. पागलपन भरी हठधर्मी और पूर्वाग्रहों के बावजूद, कुछ लोग हमेशा ऐसे होते हैं जो उसके सामने उठ खड़े होते हैं. केरल में अनेक लोग हैं, केरल विश्वविद्यालय का इतिहास विभाग भी इसमें शामिल है, जिसने मुझे बुलाया था.
जब मार्क्सवादी सिद्धांतकार और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद ने धार्मिक कट्टरपंथ के लिए गांधी की आलोचना की थी, तो मशहूर लेखक और राजनीतिक कार्टूनिस्ट ओ.वी. विजयन ने जवाब में लिखा था कि गांधी लिबरेशन थियोलॉजिस्ट थे.
गांधी किसी भी तरह से लिबरेशन थियोलॉजिस्ट नहीं थे. किसी भी तरह से नहीं.
हालांकि काले अफ्रीकी लोगों के बीच गांधी की हैरान कर देने वाली प्रतिष्ठा है. क्या आपकी गांधी-विरोधी टिप्पणियों पर कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया आई हैॽ
यह एक रहस्य ही है कि गांधी की प्रशंसा वही लोग करें, जिनका उन्होंने अक्सर इतने दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से वर्णन किया है. ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ अभी भारत के बाहर प्रकाशित नहीं हुई है.
‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में आपने इसका जिक्र किया है कि गांधी ने जॉर्ज जोसेफ को वायकोम सत्याग्रह के दौरान हिंदुओं के ‘आंतरिक मामले’ में दखल देने से रोक दिया था. उन्हें भूख हड़ताल पर जाने की इजाजत नहीं दी गई. इस पर अपने दादा के बारे में खूब लिखने वाले, गांधी के पोते तथा देवदास और लक्ष्मी गांधी के बेटे गोपालकृष्ण गांधी की टिप्पणी दिलचस्प है: ‘लेकिन वायकोम में वे विरोध के तरीके के बतौर जोसेफ या किसी और के भूख हड़ताल करने के पक्ष में नहीं थे. क्योंॽ मुझे लगता है कि भोजन को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के बारे में उनके इस विरोधाभास की वजह भूख हड़ताल और उपवास के बीच फर्क में निहित है, और इस कार्यवाही से जुड़ी संभावित धमकी में निहित है. एक भूख हड़ताल दबाव डालने की सीधी-सरल तरकीब है, यह उपवास से नैतिक रूप से कमतर है. और अगर इसमें बल है भी, तब भी इसमें सम्मान नहीं है. जबकि उपवास में प्रायश्चित, आत्म-शुद्धि और विचारों, शब्दों और कार्यों की संपूर्ण अहिंसा है और इन सबके साथ यह अपनी बात मनवाने का ऐसा तरीका है, जिसको सिर्फ एक माहिर व्यक्ति ही कर सकता है और इसलिए इसका इस्तेमाल केवल सत्ता पर ही नहीं, बल्कि समान रूप से समाज पर भी होता है. गांधी इसी तरह आगे चल कर केलप्पन को भी रोकने वाले थे.’ (केरला एंड गांधी, इंडियन लिटरेचर, जुलाई/अगस्त 2012.)
येरवदा जेल में गांधी को जबरदस्ती करने और हर मुमकिन अनुचित तरीके से दबाव डालने की तरकीब के रूप में भूख हड़ताल/आमरण अनशन का – आप इसे जो भी कहें – इस्तेमाल करने में तो कोई हिचक नहीं हुई. तब आंबेडकर को सार्वजनिक दबाव के कारण और इस डर से पूना समझौते पर दस्तखत करना पड़ा कि अगर वे नहीं झुके तो अछूत समुदाय को भारी हिंसा का सामना करना पड़ेगा और उसे गांधी की मौत जिम्मेदार ठहराया जाएगा. रैम्से मैक्डोनॉल्ड का कम्युनल अवार्ड रद्द कर दिया गया, जो दलितों को अपना खुद का निर्वाचन मंडल बनाने का अधिकार देता था और आंबेडकर बरसों से इसके लिए लड़ते आए थे. आंबेडकर ने बाद में आमरण अनशन को ‘एक बेईमान और गलीज कार्रवाई’ कहा था. इन सबके विस्तार में जाने की यह जगह नहीं है – लेकिन दलित अब भी पूना समझौते के बुरे असर को झेल रहे हैं. चाहे तो इसके बारे में मायावती से पूछ लीजिए.
प्रधानमंत्री 8 सितंबर को नई दिल्ली में अय्यनकली जयंती समारोह का उद्घाटन करेंगे. मैं बस सोच रही हूं कि क्या वे तिरुअनंतपुरम में आपके विवादास्पद भाषण पर टिप्पणी करेंगेॽ
मैं नहीं कह सकती कि मैं इस बारे में सोच सोच कर अपनी रातों की नींद हराम कर रही हूं.
ऐसा क्यों होता है कि जब आप दलितों के बारे में बात करती हैं तो लोग पागल हो जाते हैं. मुझे याद है कि दिल्ली गैंग रेप के बाद आपकी टिप्पणियों पर भी इसी तरह की आलोचनाएं हुई थीं. आप उन घिनौने, गुमनाम अपराधों की तरफ ध्यान खींच रही थीं, जो दलित औरतों के खिलाफ किए जाते हैं.
यह बात आपको उन्हीं से पूछनी पड़ेगी [जो आलोचना करते हैं]. लेकिन एक बात है: दिल्ली गैंग रेप (किसी वजह से ज्यादातर लोग इसका जिक्र करना भूल गए कि उस लड़की की हत्या भी की गई थी, मानो यह कोई छोटी-सी बात हो) वाले साल 2012 में, एनसीआरबी के मुताबिक 1500 दलित औरतों का ‘छूत मर्दों’ द्वारा बलात्कार किया गया था. ऐसा नहीं है कि वे विरोध प्रदर्शन महत्वपूर्ण नहीं थे, उनकी वजह से हमें बलात्कार के खिलाफ एक ज्यादा कठोर कानून हासिल हुआ. लेकिन हमें एक ठोस नजरिए की जरूरत है, नहींॽ 2002 में गुजरात में सैकड़ों मुसलमान औरतों का बलात्कार हुआ, लेकिन हमसे उम्मीद की जाती है कि हम उससे ‘आगे बढ़’ जाएं, नहींॽ अगर आप उनके बारे में या कुनन पोशपुरा में फौज द्वारा कश्मीरी औरतों के सामूहिक बलात्कार की बात करें तो लोग चिल्ला कर आपकी जुबान बंद कर देंगे.
तथाकथित अछूतों के लिए आपकी चिंता द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स की बुनियादी पृष्ठभूमि भी है.
मैं इसे ‘तथाकथित अछूतों के लिए चिंता’ नहीं कहूंगी. उस तरह की मिशनरी भावना को हम गांधीवादियों के लिए छोड़ देंगे. बाकी बातों के साथ-साथ द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स हमारे समाज की बीमारी के बारे में है. जब जाति की बात आती है, तो हमें तथाकथित ‘ऊंची जातियों’, मम्माचियों, बेबी कोचम्माओं और कॉमरेड पिल्लइयों के बारे में चिंता करनी चाहिए. बीमार लोग वे हैं, वेलुता नहीं. उसे उनकी बीमारी का एक बड़े भयानक और त्रासदीपूर्ण तरीके से खामियाजा भुगतना पड़ता है.
एक लेखक होने के नाते, एक ऐसा इंसान होने के नाते जो धारा के साथ बह नहीं जाता, बल्कि उन मुद्दों को उठाता है जिसे बहुत कम लोग उठाने का साहस कर पाते हैं, एक ऐसी शख्सियत होने के नाते जो गर्मागर्म राजनीतिक, पर्यावरणीय मुद्दों/विवादों के केंद्र में है...आपको अपना जीवन कितना जोखिमभरा लगता है? क्या आपकी मां समेत आपके प्रियजन आपकी सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं होतेॽ
इस देश की जनता मुझसे कहीं ज्यादा मुश्किल लड़ाइयां लड़ रही है और उससे कहीं ज्यादा बड़े खतरे उठा रही है. हरेक 16 मिनट में एक दलित के खिलाफ एक अपराध किया जाता है. 2012 में जातीय उत्पीड़नों में 650 दलितों की हत्या कर दी गई. अभी, जिस समय हम बात कर रहे हैं, हजारों मुसलमान शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं, जबकि हत्यारे फरसे और तलवारें चमकाते हुए दसियों हजार की तादाद में महासभाएं कर रहे हैं, वे और भी अधिक हिंसा का ऐलान कर रहे हैं. मैं उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर की बात कर रही हूं. कश्मीर में, मणिपुर में लोग मारे जा रहे हैं. पूरे देश में हजारों लोग जेल में हैं, जिसमें मेरे करीबी दोस्त भी शामिल हैं. जहां तक मेरी मां के फिक्र करने की बात है, वो उस तरह की मां नहीं हैं. वे एक मजबूत दमखम वाली महिला हैं.
अंधभक्ति के अंधड़ में आपने बड़े साहस के साथ उन लोगों के लिए एक चिराग जलाया है, जो गांधी के कुछ पहलुओं से निराश हैं. आपको इससे किस तरह के नतीजे की उम्मीद हैॽ आप इस बहस से किस तरह के सकारात्मक नतीजे की उम्मीद करती हैंॽ
नतीजा सिर्फ सकारात्मक ही हो सकता है. एक छुपा कर रखी गई बात को उजागर करना – या कम से कम उन चीजों की तरफ इशारा करना, जिन्हें खुली नजरों से ओझल रखा गया है, सिर्फ एक अच्छी बात ही हो सकती है. भले ही वह शुरू में थोड़ा दुख पहुंचाए. लेकिन मुझे यह बात पूरी तरह साफ कर देने दीजिए: मैंने आग नहीं जलाई है. इसका श्रेय अनेक अनेक लोगों को जाता है. मैं उनमें से सिर्फ एक हूं.
गांधी के पड़पोते आनंद गोकनी ने टिप्पणी की है कि आप ‘बराबरी में यकीन करनेवाले गांधी के बारे में ऐसे गलत बयान देने के लिए पछताएंगी और अफसोस करेंगी’. उन्होंने जो कहा वो इस तरह है: ‘रॉय ने किसी को खुश करने के लिए चलताऊ बयान दिया है. यह गांधी के बारे में उनकी अपनी राय है और उन्हें ऐसा करने का हक है. लेकिन गांधी के बारे में लिखी गई किताबें पढ़ने वाला हर इंसान उनके बारे में सच्चाई को जानता है. वे एक लेखक और कार्यकर्ता हो सकती हैं, लेकिन उसके परे, उस गांधी के बारे में चलताऊ बयान देना अच्छी बात नहीं है-जो कि एक अंतरराष्ट्रीय हस्ती हैं. इसीलिए अनेक हलकों से उनके बयान के खिलाफ आलोचनाएं उभरीं...’
‘वो लेखिका और कार्यकर्ता हो सकती हैं लेकिन...’ लेकिन, लेकिन, लेकिन, लेकिन. मैंने भविष्य का पता लगा लिया है और मुझे दूर दूर तक इसको लेकर कोई पछतावा या अफसोस नहीं दिखता...देखिए, गांधी अपने परिवार की धरोहर भर नहीं है. वे भारत के विचार की बुनियाद में लगे मुख्य पत्थरों में से एक हैं. गांधीवाद एक उद्योग बन गया है – इसमें बहुमत का शेयर (मेजर स्टेक्स), पैसा, रियल एस्टेट और राजनीतिक तथा अकादमिक संस्थान शामिल हैं. लापरवाही से इसकी आलोचना नहीं की जा सकती है. लेकिन बिल्ली कुछ समय से थैले से बाहर आने के लिए पंजे मार रही थी – अब यह आजाद घूम रही है, गलियारों में दौड़ती फिर रही है. जाहिर है, कुछ बिलौटे भी होंगे और बिलौटों के बिलौटे भी (नाती-पोते). वे अब थैले में वापस नहीं जाएंगे. बात तो निकल पड़ी है. पुलिस किसी काम न आएगी. न ही जेलें. और न ही राजनेताओं की धमियां किसी काम आएंगी. कुछ समय तक यह थोड़ा मुश्किल होगा, लेकिन आखिर में यह हम सबके लिए अच्छा होगा. एक लंबे दौर को अपनी निगाह में रखें तो थोड़ी ईमानदारी कभी किसी का नुकसान नहीं करती.
[अनुवादक की टिप्पणी: यह साक्षात्कार तब लिया गया था, जब किताब भारत के बाहर प्रकाशित नहीं हुई थी.]
साभार : http://hashiya.blogspot.in/2014/09/blog-post_29.html

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