Friday, 17 October 2014

"हैदर" यानी कश्मीरियत की त्रासदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी

     ”हैदर” फिल्म पर बातें करते समय दो चीजें मन में उठ रही हैं। पहली बात यह कि कश्मीर के बारे में मीडिया में नियोजित हिन्दुत्ववादी प्रचार अभियान ने आम जनता में एक खास किस्म का स्टीरियोटाइप या अंधविचार बना दिया है। कश्मीर के बारे में सही जानकारी के अभाव में मीडिया का समूचा परिवेश हिन्दुत्ववादी कु-सूचनाओं और कु-धारणाओं से घिरा हुआ है। ऐसे में कश्मीर की थीम पर रची गयी किसी भी रचना का आस्वाद सामान्य फिल्म की तरह नहीं हो सकता। किसी भी फिल्म को सामान्य दर्शक मिलें तब ही उसके असर का सही फैसला किया जा सकता है। दूसरी बात यह कि हिन्दी में फिल्म समीक्षकों का एक समूह है जो फिल्म के नियमों और ज्ञानशास्त्र से रहित होकर आधिकारिकतौर पर फिल्म समीक्षा लिखता रहता है। ये दोनों ही स्थितियां इस फिल्म को विश्लेषित करने में बड़ी बाधा हैं। फिल्म समीक्षा कहानी या अंतर्वस्तु समीक्षा नहीं है।
हैदरफिल्म का समूचा फॉरमेट त्रासदी केन्द्रित है। यह कश्मीरियों की अनखुली और अनसुलझी कहानी है। कश्मीर की समस्या के अनेक पक्ष हैं।फिल्ममेकर ने इसमें त्रासदी को चुना है।यहां राजनीतिक पहलु तकरीबन गायब हैं। इस फिल्म में राजनीति आटे में नमक की तरह मिली हुई है। यहां तक कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी इसके फॉरमेट में हाशिए पर है। मूल समस्या है कश्मीर जनता की आतंकी त्रासदी की। काफी अर्सा पहले कश्मीर के आतंकी पहलु पर गोविन्द निहलानी की फिल्म ‘द्रोहकाल’ आई थी, वहां आतंकी हिंसाचार को  कलात्मक ढंग से चित्रित किया गया था, जबकि ”हैदर” में आतंकी हिंसाजनित त्रासदी का चित्रण है। इस अर्थ में इस फिल्म को ”द्रोहकाल” की अगली कड़ी के रूप में भी रखा जा सकता है।
     ”हैदर” फिल्म में मूलपाठ त्रासदी है, लेकिन अनेक उप-पाठ भी हैं, जो अधूरे हैं। इस फिल्म की खूबी है कि इसमें राष्ट्रवाद कहीं पर नहीं है। साथ ही राजनीतिक संवाद बहुत कम है। इस अर्थ में यह ”द्रोहकाल” से विकसित नजरिए को व्यक्त करने वाली फिल्म है। हिन्दी में कश्मीर पर राजनीतिक फिल्म बने और उसमें राष्ट्रवाद न हो यह हो नहीं सकता, हिन्दी में कश्मीर और आतंकी थीम पर बनी फिल्मों में राष्ट्रवाद और उसके भड़काऊ संवाद खूब आते रहे हैं। लेकिन ”हैदर” इस मामले में अपवाद है। साथ ही मुसलमानों और कश्मीर को लेकर सचेत रूप से मीडिया में प्रचलित स्टीरियोटाइप को भी कलात्मक चुनौती दी गयी है। मसलन, इस फिल्म में मुसलमान कहीं नजर नहीं आते, कश्मीरी नजर आते। मस्जिद-नवाज-मौलवी आदि उनसे जुड़ा समूचा मीडिया स्टीरियोटाइप एकसिरे से गायब है। फिल्ममेकर सचेत रूप में कश्मीरियत को चित्रित करने में सफल रहा है। इस अर्थ में यह फिल्म कश्मीर की समस्या में पिस रहे कश्मीरियों की त्रासदी को सामने लाती है और इस समस्या के हिन्दू-मुसलमान के  नाम पर चल रहे हिन्दुत्ववादी मीडिया प्रचार का कलात्मक निषेध करती है।
      इसके अलावा इस फिल्म में बड़े ही संतुलन के साथ सेना और आतंकियों के मानवाधिकार हनन के रूपों के खिलाफ प्रतिवादी भावों और संवेदनाओं को उभारा गया है और उनको मानवाधिकार के फ्रेमवर्क में रखकर पेश किया गया है। त्रासदी यहां इवेंट की बजाय प्रक्रिया के रूप में चित्रित हुई है। त्रासदी जब प्रक्रिया के रूप में आती है तो वह मानवीय भावों-सरोकारों से जोड़ती है, स्मृति में स्पेस पैदा करती है। देश से जोड़ती है। इवेंट में ये संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। त्रासदी केन्द्रित होने के कारण समूची फिल्म में दर्शकों की सहानुभूति पीड़ितों के साथ है। वे इस प्रक्रिया में राजनीतिक पूर्वाग्रहों में बहते नहीं हैं, बल्कि फिल्म के अनेक अंश ऐसे हैं जो दर्शक को कश्मीर संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सोचने में मदद करते हैं। यह सच है कि कश्मीर में आतंकी हमलों और सेना की ज्यादती के कारण हजारों औरतें विधवा हुई हैं, हजारों बच्चे अनाथ हुए हैं, उनके कष्टों-पीड़ाओं को हम लोग बहुत कम जानते हैं। कश्मीर भारत का अंग है और कश्मीर में घट रही हिंसा से इस देश को सकारात्मक तौर पर परिचित कराने में हैदरजैसी अनेक फिल्मों की जरूरत है।
      ”हैदर” फिल्म की खूबी है कि इसमें आतंकी त्रासदी को महज भावुक नहीं रहने दिया। त्रासदी में विवेक पर बल देकर फिल्म मेकर ने त्रासदी को भावुकता से अलग कर दिया। त्रासदी की इमेजों का हम जब भी आस्वाद लेते हैं अभिनेता बार-बार अपने एक्शन से विवेकपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक पात्र लोकतांत्रिक ढंग से खुला है, वह कोई काम पर्दे के पीछे से नहीं करता, फिल्म मेकर दर्शक को कयास लगाने का मौका ही नहीं देता। सब कुछ दर्शक के सामने होता है। प्यार, चुम्बन, शैतानियां, मुखबरी, पक्षधरता आदि सबको सीधे दर्शकों के सामने खोलकर रखा गया है इसके चलते इस फिल्म में अंतराल में या प्रच्छन्न ढंग से भावों को मेनीपुलेट करने की कोई संभावना नहीं है।
      कश्मीर की त्रासदी ऐतिहासिक पीड़ा है। इसे नकली तर्कों के आधार पर न तो समझा जा सकता है और न पेश किया जा सकता है। यह सामान्य त्रासदी नहीं है। फिल्ममेकर ने इस ऐतिहासिक त्रासदी को फिल्म सौंदर्य के जरिए उद्घाटित किया है। यहां कलात्मक-सौंदर्यात्मक भाषा का भरपूर इस्तेमाल किया है। इस भाषा के जरिए दर्शक के आस्वाद को फिल्ममेकर कॉमनसेंस या स्टीरियोटाइप के धरातल से ऊपर उठाकर ले जाता है। कश्मीर की समस्या को कश्मीरियत की त्रासदी के रूप में चित्रित करना स्वयं में मुश्किल काम है। कश्मीरियत को तो हमारा मीडिया और जनमानस एक सिरे से भूल चुका है, ऐसे में फिल्म मेकर एक काम यह करता है कि वह कश्मीरियत को अस्मिता का आधार बनाता है, वह कश्मीर की समस्या को हिन्दू-मुसलिम समस्या या धर्म के आधार बने भारत-पाक विभाजन का निषेध भी करता है। कश्मीर की त्रासदी को चित्रित करने का मकसद भविष्य में होने वाली त्रासदी को रोकना है। फिल्ममेकर संदेश देता है कि मानवाधिकार सबसे मूल्यवान हैं और उनके हनन का अर्थ है अनिवार्यतः त्रासदी।
     यह फिल्म कश्मीर के नकली-विशेषज्ञों की भी प्रकारान्तर से पोल खोलती है। कश्मीर के मसले पर ज्योंही बातें होती हैं हमारे बीच में अचानक नकली कश्मीर विशेषज्ञ आ जा जाते हैं और कश्मीर पर वे नकली तर्कजाल से सारा माहौल घेर लेते हैं। इस तर्कजाल को वे तथ्य के नाम पर घेरना आरंभ करते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति में सत्य-तथ्य दोनों महत्वपूर्ण होते हैं और इन दोनों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सर्जनात्मक संवेदनाएं। सर्जनात्मक संवेदनाओं के जरिए ”हैदर” में कश्मीरियों की देशभक्ति पुख्ता रूप में सामने आई है। साथ ही कश्मीरी नागरिक की अनुभूतियां, आकांक्षाएं और त्रासदी भी सामने आई हैं। यह फिल्म संदेश देती है कि यह अस्मिता की त्रासदी का दौर भी है। कलात्मक त्रासदी को महसूस करने की चीज है और यह काम फिल्म ने बड़ी सफलता के साथ किया है।
     ”हैदर” फिल्म में कश्मीरियत को धर्मनिरपेक्ष शांतिमय संस्कृति के रूप में पेश किया गया है। साथ त्रासदी के प्रति आलोचनात्मक नजरिए को सम्प्रेषित करने में फिल्ममेकर सफल रहा है। कश्मीर की त्रासदी अन्य के बहाने से पेश नहीं की गयी है बल्कि सीधे पेश की गयी है। फिल्म में अतीत में लौटने वाले क्षण बहुत कम हैं। सारी फिल्म सीधे वर्तमानकाल में चलती है और भविष्य की ओर सोचने के लिए मजबूर करती है। अस्मिता के कई आयाम हैं मसलन्, प्रतिस्पर्धा, हिंसा, बदला, बदलाव, राष्ट्रीयता, आतंकवाद आदि इनमें से ”हैदर’ का जोर राष्ट्रीयता, बदलाव और शांति पर है।
साभार :http://www.hastakshep.com/hindi-news/film-tv/2014/10/17/%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A4

मोदी जी सारा माल-पानी पूंजीपतियों को और जनता के साथ बस हवा-बाज़ी

प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक चिठ्ठी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी,
   बीती 10 तारीख मैं अपने घरेलू राज्य मध्यप्रदेश पहुंचा। लंबे सफर की थकान थी, तबीयत भी कुछ नासाज़ थी; लेकिन जैसे ही अख़बार हाथों में लिया, शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। ये शायद कुछ-कुछ आपके उन भाषणों को सुनने जैसा ही था, जिन्हें सुनकर सुनने वालों के अंदर एक नया जोश भर जाता है। उन भाषणों को सुनने ना जाने कितने ही कामगार-मजदूर आते हैं जिन्होंने अच्छे दिनों की आस में आपको प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया है।
Modi Ambani Adani,Modi, Ambani, Adani पहले पन्ने पर ही बड़े-बड़े अक्षरों में आपके श्रीमुख से निकले शब्दों को जगह मिली हुई थी “भारत को सिर्फ़ बाज़ार ना समझें: मोदी“। मौका था हाल ही में संपन्न हुए वैश्विक निवेश सम्मेलन (इंदौर) का, जिसमें आप पधारे हुए थे। आपके अनुज मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान भी मौजूद थे और साथ ही एक पूरी टोली थी पूंजीपति-ठेकेदारों की। इस टोली में इस देश के पहले नम्बर के अमीर पूंजीपति मुकेश अंबानी से लेकर हाल ही में दंसवे नम्बर पर पहुंचे गौतम अडानी भी थे। आपके सामने इन सभी ने मध्यप्रदेश में पूंजी-निवेश के बड़े-बड़े वायदे किये। मुख्यमंत्री जी ने भी उन सभी को आश्वासन दिया कि “खुलकर निवेश करें, परिश्रम व पूंजी बेकार नहीं जाने दूंगा: शिवराज”। आपने भी फिर से सवा सौ करोड़ देशवासियों का जिक्र करते हुए पूंजीमालिकों को याद दिला दिया कि “भारत को सिर्फ़ बाज़ार न समझें व यहां के लोगों की क्रय-शक्ति यानी कि खरीदने का सामर्थ्य बढ़ाये बिना आप लोगों का सपना पूरा नहीं हो पाएगा”। बात तो बहुत बढ़िया कही आपने।
    वैसे आपका इस कार्यक्रम में इन पूंजीपतियों के बीच होना व आपकी उपस्थिति में मुख्यमंत्री के द्वारा उन्हें दिये गये तमाम आश्वासन यही सुझाते हैं कि आप भी विकास के उसी माडल पर विश्वास करते हैं जिसके मुताबिक पूंजी के बिना विकास असंभव है क्यूंकि पूंजी के बिना रोजगार पैदा नहीं हो सकता। सीधे शब्दों में कहें तो आप मानते हैं कि पूंजी ही श्रम को जन्म देती है। और पूंजी तो है पूंजीपतियों के पास, इसीलिये विकास का रास्ता भी यही दिखलायेंगे व विकास इन्हीं की शर्तों पर होगा।
हालांकि मैं विकास के इस माडल से सहमत नहीं हूं, क्यूंकि मेरा मानना है कि पूंजी श्रम को नहीं बनाती बल्कि ये इंसानी श्रम ही है जो अपने अलग-अलग रूपों में पूंजी पैदा करता है। इसलिये विकास का माडल श्रमिकों व कामगारों को केन्द्र में रखकर उनकी भागीदारी से तैयार किया जाना चाहिये नाकि पूंजीपतियों के। लेकिन अख़बार में आपकी कही बातें पढ़कर एक बारगी तो मुझे लगने लगा कि मैं ही गलत सोच रखता हूं और अब तो श्रमिकों के अच्छे दिन आ गये हैं और शुरुआत मध्य-प्रदेश से हो ही गई है।
    लेकिन जैसे ही मैंने आगे की खबरें पढ़ने के लिये अख़बार के पन्नें पलटे, श्रमिकों के लिये अच्छे दिनों का सपना टूटता सा लगा। खबर ही कुछ ऐसी थी। मेरे घर के पास ही कुछ कोयला खदानें हैं। उन खदानों में काम पर लगे ठेका-श्रमिकों से जुड़ी एक खबर छ्पी थी। “मजदूरी ना मिलने से परेशान मजदूरों ने किया प्रदर्शन”। ये मजदूर-कामगार पिछले 4 महिनों से तनख्वाह ना मिलने के चलते सड़कों पर उतरे हुए थे। ना ठेकेदार उनकी बात सुन रहा था, ना कालरी प्रबंधन और ना ही स्थानीय प्रशासन। लगता है शिवराज जी सिर्फ़ पूंजीपतियों के परिश्रम को ही बचाने की बात कर रहे थे। मुझे लगा कहां मोदी जी क्रय-शक्ति बढ़ाने की बात कर रहे हैं और कहां इन मजदूरों को वेतन ही नहीं नसीब हो रहा। ना जाने कितने लोगों ने आपके कहने पर बैंकों में खाते खुलवाये होंगे, पर उन खातों में डालें क्या सवाल तो यही है।
      मुझे असली झटका तो अगले दिन के अख़बार की एक खबर पढ़कर लगा जिसकी हेडलाईन थी “व्यापारियों, कारखाना-मालिकों को परेशान नहीं कर पायेंगे अब लेबर इंस्पेक्टर”। जो बात इस खबर व उससे जुड़ी मध्यप्रदेश सरकार के राजपत्र को पढ़कर मेरी समझ में आई कि मध्य-प्रदेश सरकार ने एक नई स्कीम शुरु की है – वालेंटरी कम्प्लायंस स्कीम (स्व-प्रमाणीकरण योजना ); जिसके तहत श्रम कानूनों से जुड़े 16 अधिनियमों, जिसमें वेतन भुगतान अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम भी शामिल हैं, से जुड़े मामलों में श्रम विभाग के इंस्पेक्टर कारखानों की जांच अब पहले की तरह कभी भी और बिना सूचना दिये नहीं कर पायेंगे। जो कारखाना मालिक इस स्कीम से जुड़ेंगे उनसे अपेक्षा होगी कि वो अपने नियोजनों मे तमाम श्रम कानूनों का स्वेच्छा से पालन करेंगे। साथ ही उनके कारखानों व नियोजनों में अब सिर्फ़ 5 सालों में एक बार ही जांच की जा सकेगी और उसके लिये भी मालिकों को पहले ही सूचना दे दी जायेगी। इसके अलावा और भी बहुत कुछ था राजपत्र में जिसे पढ़कर लगा कि आने वाले दिन श्रमिकों के लिये और कुछ भी हों अच्छे तो नहीं ही जान पड़ते।
     वैसे ये बात भी सही है कि श्रम-विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहा है- लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि ऐसी स्कीमें बनाकर सरकारें कामगारों के अधिकार मालिकों की इच्छा के भरोसे छोड़ दें। साफ़ जाहिर है कि ऐसी तमाम स्कीमें सरकारें निवेशकों को लुभाने के लिये ही निकाल रही हैं। अब निवेशक तो वहीं पैसा लगायेंगे ना जहां उनको ज्यादा फ़ायदा हो। और फायदा पूंजीपतियों को तभी ज्यादा होगा जब कामगारों के अधिकार कमतर होंगे।
     मोदी जी, आप अपने भाषणों में अकसर पानी से आधा भरा, आधा खाली गिलास दिखाकर कहते हैं कि “कोई कहता है कि ये गिलास आधा भरा है तो कोई कहता है आधा खाली – लेकिन मैं एक बहुत आशावादी व्यक्ति हूं, क्यूंकि मैं कहता हूं कि आधा गिलास पानी से भरा है और आधा हवा से”। ये बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है, लेकिन अगर श्रमिक इसे हकीकत से जोड़कर देखते होंगे तो शायद सोचते होंगे कि सारा माल-पानी तो मोदी जी ने पूंजीपतियों को दे दिया और हमारे साथ तो वो बस हवा-बाज़ी कर रहे हैं।
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/agenda/2014/10/16/modi-global-     investment-conference 
आईआईटी कानपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में PhD विवेक मेहता स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
आईआईटी कानपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में PhD विवेक मेहता स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
आपका,
विवेक
-o-O-O-O-O-O-O-O-O-O-O–O-O-O–
भारत को सिर्फ़ बाज़ार ना समझें: मोदी,
वैश्विक निवेश सम्मेलन (इंदौर), मध्य प्रदेश में पूंजी-निवेश, पूंजी-निवेश, वालेंटरी कम्प्लायंस स्कीम, वेतन भुगतान अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, स्व-प्रमाणीकरण योजना,   Please do not just market India: Modi; Global Investment Conference (Indore), Madhya Pradesh capital-investment, capital-investment, Kmplayns voluntary scheme, payment of wages act, minimum wages act, payment of wages Act, Minimum Wage Act, self-certification scheme,

Monday, 13 October 2014

भारत में एनजीओ की सक्रियता और अमेरिका-पोषित नोबेल का नाता 

अभिरंजन कुमार

अमेरिका और अन्य प्रमुख पश्चिमी देशों को हम जितना गालियां दे लें, लेकिन उनके विज़न की दाद देनी पड़ेगी। वे बीस साल, पचास साल, सौ साल आगे की सोचकर काम करते हैं। हम लोग चार दिन आगे नहीं सोच पाते हैं। भारत जैसे मुल्क आज भी उनके हाथों के खिलौने भर हैं। हम सब रंगमंच की वो कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर अमेरिका जैसे प्रभावशाली मुल्कों के हाथों में हैं।
मैंने कल ही कहा था कि कैलाश सत्यार्थी को सलाम है और उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जाना ख़ुशी की बात है, इसलिए अब मैं जो कहने जा रहा हूं, उसे सत्यार्थी के विरोध या द्वेष-ईर्ष्या आदि से जोड़कर न देखें। मैं नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग देख रहा हूं। मैं यह देख रहा हूं कि ऐसे वक़्त में जब भारत भर में ज़्यादातर NGOs को लेकर तमाम सवालात उठ रहे हैं, उन्हें हो रही विदेशी फंडिंग और उसके पीछे की मंशा पर चिंता जताई जा रही है, भारत के एक NGO संचालक को नोबेल मिला है।
क्या अजीब इत्तेफ़ाक है कि भारत में पिछले तीन-चार साल में NGOs का ज़बर्दस्त उभार देखा जा रहा है। पहले NGOs ने रातों-रात कुछ नए हीरोज़ गढ़कर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया, जिसका एक-एक सीन किसी फिल्म के स्क्रीन-प्ले की तरह पहले से लिखा हुआ जान पड़ता था। कैसी टोपी होगी, कैसे कपड़े होंगे, किन-किन प्रतीकों का इस्तेमाल होगा, कौन-कौन भागीदार होंगे, कौन-कौन टार्गेट होंगे, क्या-क्या ड्रामे होंगे, मीडिया को कैसे खींचना है, युवाओं को कैसे लुभाना है, आलोचकों और तटस्थ समीक्षकों पर कैसे हमला करना है- सब स्क्रिप्टेड था।
ऐसा लग रहा था जैसे एक-एक दृश्य पर दुनिया के बड़े-बड़े दिमागों और इवेंट मैनेजरों ने मंथन किया है। बिल्कुल मिलते-जुलते नज़ारे दुनिया के कुछ अन्य देशों में बिल्कुल ताज़ा-ताज़ा दिखाई दिये थे, जिससे लगा कि हो न हो, इन सारे इवेंट्स की प्लानिंग और फंडिंग करने वाले लोग कॉमन हैं। उस वक़्त ऐसा माहौल बना दिया गया था कि अगर आप आंदोलन से जुड़े किसी व्यक्ति की निष्ठा पर सवाल उठाते या यह कहते कि एक कानून से किसी जनम भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता, तो फौरन आप चोर, भ्रष्ट और देशद्रोही करार दिये जाते।
मेरे जैसे लोग कन्फ्यूज़ हो गए थे कि अगर इस देश में इतने सारे ईमानदार लोग हैं, तो फिर बेईमानी और भ्रष्टाचार है कैसे? फिर तो भ्रष्ट लोगों को ईमानदारी मिटाने के लिए आंदोलन करना चाहिए, न कि ईमानदार लोगों को भ्रष्टाचार मिटाने के लिए। उन दिनों भ्रष्ट लोग भी टोपी पहनकर ईमानदारी पर भाषण दे रहे थे, भ्रष्टाचार जैसे गंभीर सवाल पर दूध-पीते बच्चों की फोटो खिंचाई जा रही थी और छुट्टी के दिन पिकनिक मनाकर पूरा का पूरा परिवार क्रांतिकारी कहलाने लगता था।
इस घटना के बाद हमने देखा कि यह देश अचानक ही स्त्री-अधिकारों के लिए जाग उठा। रेव-पार्टियों का आयोजन करने और उसमें हिस्सा लेने वाली पीढ़ी, तमाम किस्म के नॉनवेज़ चुटकुलों, पोर्न लिटरेचर और फिल्मों के उपभोक्ता और दूसरों की बहन-बेटियों को “माल” समझने वाले लोग भी मोमबत्तियां जलाकर स्वयं को स्त्री-अधिकारों का पुरोधा घोषित कर लेते थे।
फिर हमने देखा कि NGO चलाने वाले लोग व्यवस्था-परिवर्तन की लड़ाई छोड़कर देश में सत्ता-परिवर्तन की लड़ाई में जुट गए। पूरी दुनिया से उन्हें पैसे मिलने लगे। कुछ पैसा उन्होंने वेबसाइटों पर दिखाया, बहुत सारा नहीं दिखाया। जब वे आइडियोलॉजी के सवाल पर दूसरे राजनीतिक दलों जितने ही ढुलमुल, मौकापरस्त, दिग्भ्रमित और पथभ्रष्ट दिखाई दिये, तो लोगों को समझ आया कि हो न हो, दाल में कुछ काला ज़रूर है।
यह सच है कि आज भारत में NGOs की एक ताकतवर लॉबी नक्सलवादियों को शह देती है। आतंकवाद पर ख़ामोश रहती है और फ़ौज की मुख़ालफ़त करती है। भारत की परिवार-व्यवस्था को ध्वस्त करने और स्त्री-आज़ादी के नाम पर महिलाओं को भ्रष्ट करने में जुटी हुई है। एक बड़ी लॉबी यह भी चाहती है कि देश की तमाम महिलाएं अपने कपड़े उतार दें और समूचा भारत एक वृहत सेक्स-मंडी में तब्दील हो जाए। यही आधुनिकता है, यही प्रगतिशीलता है, यही आज़ादी है, यही तरक्की है, यही आत्म-निर्भरता है।
बच्चों के लिए भी हज़ारों-लाखों NGOs काम कर रहे हैं, फिर भी हर लाल-बत्ती पर बच्चे भीख मांगते हैं, हर खान-खदान-ढाबे-फैक्टरी में बच्चे काम करते हैं, हज़ारों बच्चे ग़ायब कर दिये जाते हैं, अनगिनत की सेक्स करके हत्याएं कर दी जाती हैं। एक सुरेंद्र कोली पकड़ में आया, हज़ारों-लाखों सुरेंद्र कोली पकड़ से बाहर हैं। मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी NGO की कोशिश से चाइल्ड-ट्रैफिकिंग-मर्डर-रेप जैसे जघन्य अपराधों से जुड़े किसी बड़े सरगना को फांसी पर लटका दिया गया हो।
बहरहाल, भारत में यह NGOs के उभार और सक्रियता का दौर है और इस नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग से इतना कन्फर्म हो रहा है कि इसे दुनिया के प्रभावशाली मुल्कों, ख़ासकर अमेरिका का संरक्षण-समर्थन हासिल है। भारत के NGOs और अमेरिका-पोषित नोबेल का यह लिंक आज एक पुरानी घटना से भी स्थापित हो रहा है। नक्सलवाद से नाता रखने के आरोपी डॉक्टर विनायक सेन, जिन्हें भारत में भी कम ही लोग जानते थे, उनकी रिहाई के लिए दुनिया के 22 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था।
क्या यह माना जाए कि दुनिया भर के नोबेल पुरस्कार विजेता किसी एक ताकतवर लॉबी के इशारे पर काम करते हैं? क्या यह ताकतवर लॉबी अमेरिका की है? आख़िर अमेरिका की मंशा क्या है? क्या सचमुच वह भारत में मानवाधिकारों, बच्चों के अधिकारों, महिलाओं के अधिकारों आदि के प्रति जागरूकता लाना चाहता है और भारत को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाना चाहता है या फिर उसकी नीयत कुछ और ही है?
क्या अमेरिका की दूरगामी योजना भारत को अस्थिर करने की है या विदेशी फंडिंग और पुरस्कारों से पोषित-महिमामंडित NGOs के ज़रिेए भारत की सरकारों पर लगातार दबाव बनाए रखने की है? क्या अमेरिका यह चाहता है कि एक तरफ भारत की सरकारों को बाज़ार-समर्थक ग़रीब-विरोधी नीतियां अपनाने के लिए बाध्य किया जाए, दूसरी तरफ़ भारत के NGOs को यहां के आम अवाम में उनके ख़िलाफ़ और व्यवस्था के ख़िलाफ़ असंतोष भड़काने के काम में लगाया जाए?
या अमेरिका यह चाहता है कि भारत में NGOs की पोल खुले और उस पर नकेल कसे जाने की कोई कोशिश हो, इससे पहले ऐसा माहौल तैयार कर दो कि NGOs पर सवाल खड़े करते ही आपको देशद्रोहियों और ईर्ष्यालु लोगों की कतार में खड़ा कर दिया जाए? अगर नोबेल पुरस्कार समेत कथित रूप से प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की ज़रा भी विश्वसनीयता होती, तो आज ये सवाल मन में लाते हुए भी ग्लानि महसूस होती, लेकिन उनकी विश्वसनीयता है नहीं, तो संदेह क्यों न हो?
ज़रा उस दौर को भी याद करिए, जब पश्चिमी देशों को भारत में बाज़ार तैयार करना था, तो उसे भारत की हर लड़की ख़ूबसूरत दिखाई दे रही थी। पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने अमेरिका-पोषित अर्थनीति को ताज़ा-ताज़ा कबूल किया था और उसके ठीक बाद मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स जैसे सारे पुरस्कार भारत की झोली में आकर गिरने लगे थे। अब भारत ने ख़ुद ही बाज़ार के रास्ते में लाल कालीन बिछा दी है और प्रधानमंत्रीगण प्राइवेट कंपनियों के सीईओ की तरह दुनिया भर में घूम-घूमकर बिजनेस की बातें कर रहे हैं, तो भारत की लड़कियों को पुरस्कृत करने की ज़रूरत ही नहीं है।
क्या मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन और मिस वर्ल्ड ऐश्वर्या राय से पहले (1994) और मिस यूनिवर्स लारा दत्ता और मिस वर्ल्ड प्रियंका चोपड़ा (2000) के बाद भारत की लड़कियां ख़ूबसूरत नहीं थीं और नहीं हैं? 1994 से पहले सन्नाटा क्यों था और 2000 के बाद सूखा क्यों पड़ा है? ज़रा सोचिएगा।
मेरे मन में इन अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों को लेकर कई तरह के सवालात हैं। मेरे मन में नोबेल शांति पुरस्कारों की भी अधिक विश्वसनीयता नहीं है। अमेरिका का राष्ट्रपति बनते ही जिस तरह से इसे बराक ओबामा के चरणों में समर्पित कर दिया गया था, उससे साफ़ हो गया था कि यह अमेरिका का “बपौती पुरस्कार” है और अमेरिका इसे अपने तात्कालिक और दूरगामी राजनीतिक और कूटनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए “ट्रैप” और “लालच” के तौर पर बांटता है।
डिस्क्लेमर-
न तो मेरी कैलाश सत्यार्थी के योगदान पर सवाल खड़े करने की मंशा है, न ही सारे NGOs को अमेरिका या दूसरे मुल्कों का दलाल घोषित करने के लिए मेरे पास सबूत हैं। यह भी मानता हूं कि कई NGOs बेशक अच्छा काम कर रहे हैं और देश को उनकी ज़रूरत है, इसलिए मेरे सवालों को उचित संदर्भ में लें।
आभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2014/10/12/us-funded-ngos-active-in-india-and-the-alliance-of-nobel

जिन्दा बने रहिये क्योंकि डॉ. लोहिया ने इंतज़ार करने    के लिए मना किया है

इमरान इदरीस

 बीसवीं सदी के दो महान महामानव वैज्ञानिक आइन्स्टीन और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने एक व्यक्ति का उल्लेख महापुरुष में किया है वो है — डॉ राम मनोहर लोहिया।
असाधारण लोहिया 12 अक्तूबर 1967 को एक साधारण से ऑपरेशन के बाद इस संसार से चले गए। अंतिम समय अपने इर्द-गिर्द डॉक्टरों की फ़ौज देखकर उनकी चिंता भारत के आम नागरिक को मिलने वाली स्वास्थ सेवाओं को लेकर हुई थी।
कौन थे लोहिया। ना कोई परिवार, ना कोई घर, ना कोई बैंक या डाकखाने में खाता। पास में अगर कुछ था तो वो था एक चमड़े का बक्सा उसमें कुछ किताबें, कुर्ते और धोतियां।
1932 में मात्र 22 वर्ष की आयु में जर्मनी के विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि मिली। अनेक भाषाओं के जानकार जर्मन, अंग्रेजी, बंगला, मराठी और हिंदी पर उनका बराबर नियंत्रण।
1963-67 मात्र चार सालों में संसद के सदस्य, जिन्होंने आम भारतीय के, गरीबी की बात करके संसद को हिला दिया। 16 आना और 4 आना की एतिहासिक बहस यू-ट्यूब पर है।
आखिर लोहिया को पढ़ने वाला लोहिया क्यों बन जाता है। डॉ. साहब ने कहा था लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर, पर मेरे जाने के बाद। उन्होंने सही कहा था क्योंकि आज उनके जाने के 47 साल बाद भी नौजवान उनको पढ़ता है और आकर कहता है लोहिया जी मैं समाजवाद की उस परिकल्पना के साथ हूँ और आपके रास्तों पर चलने के लिए तैयार हूँ।
दरअसल लोहिया विचारधारा है और उस पर चलने वाले प्रहरी। जो भी इस विचारधारा पर चला है, ईश्वर ने उसे रास्ता और यश अपने आप दिया है।
आज डॉ. साहब आपको मेरा सलाम। श्रद्धांजलि शब्द नहीं बोलूँगा क्योंकि डॉ. साहब जैसे लोग अनंतकालीन जीवन जीते हैं, लोगों के अन्दर आत्म-विश्वास बनकर जिन्दा रहते हैं।
जिन्दा बने रहिये क्योंकि डॉ साहब ने इंतज़ार करने के लिए मना किया है। …-
 आभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/memoirs-reminiscences/2014/10/12/a-tribute-to-dr-ram-manohar-lohia

Tuesday, 9 September 2014

व्यक्ति स्त्री के नाभि के नीचे दुनिया की सारी खुशी और बेचैन मन को शांत तो कर लेता है या करने की फिराक में रहता है। लेकिन, वहीं नाभि के एक बित्ते ऊपर दिल से न तो कभी तादात्म्य स्थापित कर पाता है और न ही उस दिल का मर्म ही समझ पाता है। क्या हम आज भी इस मानसिकता से मुक्त हो पाए हैं ? शायद नहीं। वह पहले की अपेक्षा आज पुरुष मानसिकता की ज्यादा गुलाम है।

Tuesday, 19 August 2014

‘ब्याह हमें किस मोड़ पे ले आया…’

चर्चित लेखक-आलोचक और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर कृष्ण मोहन द्वारा अपनी परित्यक्ता पत्नी के साथ की गई सार्वजनिक बदसलूकी बीते दिनों खासी चर्चा में रही. वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा इस घटना के बहाने कुछ जरूरी सवाल उठा रही हैं

1-1
हम अपने आप को इक्कीसवीं सदी की स्त्रियां मान बैठे हैं. यही वजह है कि हम पितृसत्ता के नियमों-कानूनों से अपना विरोध जताते हुए भरपूर प्रतिरोध की पहचान बनाने पर गर्व करते हैं. हम चाहते हैं कि दबी सहमी स्त्री छवि नदारद हो जाए. लेकिन जरा रुक कर सोचिए, कहीं यह हमारी खामखयाली तो नहीं? क्योंकि हम ऐसा सोच ही रहे होते हैं कि अचानक हमें पुरुष सत्ता के किले की ईंट से ईंट बजा देने वाली नारियों का दूसरा चेहरा नजर आता है. जिसको हम ने आत्मसजग माना था वही स्त्री झुकी हुई कमर वाली समर्पिता के रूप में हम से मुखातिब है.
यह क्या हुआ? यह ब्याह का मामला है.
( ब्याह हमें किस मोड़ पे ले आया)
मैं बार-बार कहती हूं कि स्त्री जब तक प्यार में रहती है, उससे ज्यादा ताकतवर और खुदमुख्तार कोई नहीं होता मगर विवाह उसे घेर लेता है. बेशक आज भी औरत विवाह के ऐसे चक्रव्यूह में फंसी है जिसे भेदने की कला उसके पास नहीं. भेदने की कला या विद्या इसलिए भी उसके पास नहीं कि वह खुद भी विवाह संस्था को अपने लिए सुख, सुरक्षा और संतोष का गढ़ मान बैठी है.
पिछले दिनों बनारस में घटित स्त्री हिंसा की चर्चा हर जगह है. कहीं चोरी छिपे तो कहीं खुलकर उस पर बात हो रही है. इस घटना के मुख्य पात्र एक प्रोफेसर और उनकी पत्नी हैं. यह मोहब्बत और शादी के बीच अपना करिश्मा दिखाता कोई अजूबा नहीं है, बल्कि ऐसा हो जाता है की तर्ज पर जन्मी स्थिति है. प्रोफेसर साहब की पत्नी जाहिल नहीं हैं, एिक्टविस्ट रही हैं जागरूक और समझदार हैं, पढ़ी-लिखी हैं और सत्रह अठारह साल पहले तक प्रोफेसर साहब की जाने अदा रही हैं. वह तो प्यार की दीवानगी ही थी कि विवाह के सिवा कुछ न सूझा. वैसे भी लोग शादी हो जाने को ही पक्का प्रेम मानते हैं. प्रेम को सामाजिक दायरे में वैध बनाते हैं. साथ ही खाली प्रेम पर पुख्ता यकीन कौन करे, कल के दिन शादी किसी और से कर ली तो प्यार टूटे न टूटे भरोसा छूट जाता है. धैर्य विहीन लोगों को प्रेम नहीं करना चाहिए क्योंकि अधीरता में अक्सर अन्याय और हिंसा घटित हो जाती है.
खैर, हम प्रोफेसर साहब की शादी पर थे. शादी हुई. बेटा हुआ. गृहस्थी बसी. मेरा मानना यह भी है कि प्रेम विवाह में प्रेम तो शादी के मंडप में ही स्वाहा हो जाता है, अब आपकी जिंदगी विवाह की कब्जेदारी में आ जाती है. लोग कहते हैं कि जिससे प्यार किया है उसके साथ प्रेम निभाना है. विवाह के बाद आप प्रेम नहीं विवाह निभाते हैं और नहीं निभता तो तलाक लेने चल देते हैं किसी कोर्ट कचहरी में. प्यार के साथ तो ऐसा नहीं होता. प्रोफेसर साहब और उनकी पत्नी के साथ भी यही हुआ कि विवाह से पहले प्रेम खट्टा तक नहीं हुआ, शादी के बाद सड़ने लगा. प्रेम के समय जिस पुरुष-सा पुरुष दुनिया में नहीं था और जिस लड़की-सी हूर कहीं नहीं थी वही रिश्ता इतना बिगड़ जाता है! अनजाने ही कोई महीन दरार फटते-फटते भयानक खाई में तब्दील हो जाती है जिसकी प्रेमी युगल ने कल्पना तक नहीं की होती. क्या साथ-साथ रहने की अबूझ ललक अब ऊब में तब्दील होने लगी? क्योंकि पत्नी रह गई प्रेमिका गायब!
कोई क्या करे जब प्रोफेसर साहब को अपनी पत्नी रूपी प्रेमिका बासी, चिड़चिड़ी और उबाऊ लगने लगी. दिल हाथ पकड़ने लगा- कोई तरोताजा लड़कीनुमा हंसमुख, मन लुभावन नारी मिले. वे दिल के हाथों पहले हारे थे दिल के ही हाथों फिर हारने लगे! यह अकेले उनके मन की मुराद नहीं है, हमारे आगे ऐसी बड़ी दुनिया है जिसमें प्रोफेसर, समाजकर्मी, लेखक, कलाकार, राजनीतिज्ञ आते हैं जो ‘ये अपना दिल तो आवारा’ के बैनर तले रहना पसंद करते हैं.
मैं यहां पुरुषों की बातों के बाद स्त्रियों के उस पक्ष पर आती हूं जिसमें उनका दिल भी किसी पर आ जाता है. मानती हूं की यह मर्द का जज्बा ही नहीं है, स्त्री में भी ऐसी ग्रन्थियां हो सकती हैं. फिर भी उक्त घटना के चलते एक बात का जवाब चाहती हूं कि कोई स्त्री उस पुरुष से क्या अपेक्षा करती है जो अपनी पत्नी को घर से बलपूर्वक निकाल रहा है? अपनी स्त्री को सड़क पर घसीट रहा है. अपने बेटे की मां के बदन के उघड़ने से बेखबर है. अगर वह औरत अपनी इच्छा से किसी के सामने विवस्त्र हो जाती तो यह पति उसको क्या नाम नवाजता? अपना ही जाया बेटा उसे लाठी से पीट रहा है साथ ही ये बाप बेटे इस ‘परित्यक्त’ औरत का गुजारा भत्ता भी खाए पचाए जा रहे हैं. याद रखिए कि यह भी प्रेम विवाह ही था.
‘विश्वास किसी मर्द का नहीं, इंसान का किया जा सकता है और इंसान होने के लिए पुरुष होना जरूरी नहीं. स्त्री सशक्तिकरण के लिए आत्मविश्वास की जरूरत है जिसे पितृसत्ता हमसे छीनने की फिराक में रहती है’
प्रोफेसर साहब की मनचाही नई स्त्री तुम इस घर के बाशिंदों पर कितना भरोसा कर रही हो? यहां प्यार की आशा में आई हो तो हमें भी तुम्हारे लिए अफसोस है क्योंकि यह घर हमदर्द इंसानों का तो कतई नहीं. ये डिग्रीधारी होंगे शिक्षित और सभ्य होने के नाम पर जीरो हैं. तुमने स्त्री सशक्तिकरण क्या इसी रूप में अपनाया है कि किसी स्त्री के हक पर डाका दाल दें? क्या ऐसे भी प्यार होता है की दूसरी औरत को सड़कों पर घसीटा जाये और महसूस किया जाये कि घर में बैठी स्त्री पहली से सौ दर्जे बेहतरीन है? उस बेटे से भी आगे क्या उम्मीद बांधी है जो सोलह साल की अल्पायु में मां को तड़ातड़ पीट रहा है. यह अपनी मां का ही न हुआ तो सौतेली मां का क्या होगा? वह तो अपने बाप की मर्दानगी की रिहर्सल कर रहा है जो बीबी को काबू में रखने के काम आयेगी. सोच लो कि एक स्त्री जहां उजड़ रही है तो नई औरत के लिए अपनी बसावट का सपना भ्रम के सिवा क्या है?
1-2
स्त्री सशक्तिकरण संपन्नता में छलांग लगाने से नहीं होता, यहां तो सजग विचारों के खजाने चाहिए क्योंकि देश में महिला विचारकों की बहुत कमी है. सादगी सशक्तिकरण की पहली शर्त है और अभावों से लड़ना, चेतना सम्पन्न स्त्रियों का पहला कदम होता है. इसी कदम के आगे अत्याचारों, प्रताड़नाओं और घरेलू-बाहरी हिंसा से निजात के लिए पितृसत्ता से टकराने के लम्हे आमने-सामने होते हैं.
क्या हमारा स्त्री विमर्श किसी न किसी बिंदु पर डगमगाने लगता है?
प्यार, मोहब्बत, अपनत्व और हमदर्दी भरा लगाव, ऐसे कुदरती लक्षणों से लैस स्त्री अपनी मनुष्यता के लिए प्रतिबद्ध होती है लेकिन यह क्या कि अब उसे प्यार के नाम पर संपत्तियों की जागीरें नजर आने लगी हैं. यह प्यार है या प्यार का बाजार? पढ़ी लिखी ‘समझदार’ युवा स्त्रियां विवाह के नाम पर बूढ़े वरों को चुनकर अपने आप को प्यार का इश्तहार बना रही हैं और सात फेरों के जादुई असर से घंटे-भर में संपत्ति की स्वामिनी बन बैठती हैं. कहां गई प्रेमचंद के उपन्यास ‘निर्मला’ की त्रासदी और किधर गया बेमेल विवाह का अन्यायी चलन? मैं मानती हूं कि प्रेम की अपनी ताकत होती है सो कहा भी गया है- प्रेम न जाने जात कुजात/भूख न माने बासी भात. अब जब मोहब्बत का जलवा है तो कभी किसी समझदार आधुनिक युवती को किसी कंगाल बूढ़े से प्रेम क्यों नहीं होता? यदि कहीं ऐसा हुआ हो तो मुझे बताइये. मैं उस मौहब्बत को सलाम भेजूंगी.
पितृसत्ता दीमक की तरह स्त्री के जीवन से चिपटी है जो जिंदगी को भीतर ही भीतर खोखला करती जाती है. हम यहां आगे बढ़ने के उत्साह में अगली योजनाएं बना रहे हैं और वे वहां अपने धन-ऐश्वर्य और पद का लालच दिखाकर जागरूक स्त्रियों पर भी मर्दानगी की मूठ मार रहे हैं कि नई प्रेमिका के प्रेम में वे क्या-क्या नहीं कर गुजरेंगे. पहली औरत के लिए यातना-प्रताड़ना उनका जन्म सिद्ध अधिकार हो जैसे.
आखिर में यही कहूंगी विश्वास किसी मर्द का नहीं, इंसान का किया जा सकता है और इंसान होने के लिए पुरुष होना जरूरी नहीं. स्त्री सशक्तिकरण के लिए आत्मविश्वास की जरूरत है जिसे पितृसत्ता हमसे छीनने की फिराक में रहती है.
(मैत्रेयी पुष्पा द्वारा लिखित आलेख का सम्पादित अंश)
(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 16, Dated 31 August 2014)
तहलका (हिन्दी पत्रिका) से साभार

Sunday, 17 August 2014

सृष्टि पर पहरे के खिलाफ बज रही हैं घंटियां: केदारनाथ और अशोक वाजपेयी की कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/21/2014 01:35:00 PM

 रंजीत वर्मा के इस आलेख में अशोक वाजपेयी और केदारनाथ सिंह के नए कविता संग्रहों की विवेचना की गई है. हाशिया से साभार

हिंदी कविता की जो वरिष्ठतम पीढ़ी आज हमारे बीच सृजनरत हैं केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी वहीं से आते हैं। सृष्टि पर पहरा (केदारनाथ सिंह) और कहीं कोई दरवाजा (अशोक वाजपेयी) ये दोनों कविता संग्रह इस बात के उदाहरण हैं जो 2014 और 2013 में क्रमश: छप कर आए हैं। दोनों के पास कविता लिखने का लगभग पचास साल या उससे ज्यादा समय का अनुभव है। भाषा पर इन दोनों का समान रूप से अधिकार है और ये चाहें तो सिर्फ अभ्यास से भी कविता लिख सकते हैं और लोग कह सकते हैं कि कविता अच्छी बन पड़ी है। लेकिन कविता बन पढ़ने की चीज नहीं है बल्कि रची जाती है और इसका रचा जाना एक खास मनःस्थिति में ही संभव हो पाता है। दोनों इस बात से न सिर्फ अच्छी तरह वाकिफ होंगे बल्कि इसका अनुसरण भी करते होंगे फिर भी कोई बात है जो इन दोनों को एक दूसरे से अलग करती है। हम देखते हैं कि जहां एक ओर केदारनाथ सिंह का कविता-संसार व्यापक होता जाता है वहीं दूसरी ओर अशोक वाजपेयी का दायरा सिकुड़ता जाता है यद्यपि भौगोलिक रूप से देखें तो अशोक वाजपेयी की कविता देश की सीमा से बाहर निकल कर दूर तक फैलती दिखती है जबकि केदारनाथ सिंह की कविता महानगर से निकल कर कहीं पीछे छूट गए जनपदों में भटकते लोगों की गठरी और पोटली जैसी लगभग नगण्य चीजों की ओर जाती है। कोई कह सकता है कि आखिर इसमें ऐसा क्या है कि दूर तक फैलती कविता को सिकुड़ती जाती कविता और छोटी-छोटी चीजें को समेटती चलती कविता को व्यापक होती कविता कहा जा रहा है। वैसे भी यह तो कवि के स्वभाव और पहुंच से जुड़ा मसला भर है इसलिए इस आधार पर कुछ तय नहीं किया जा सकता। लेकिन बात सच में इतनी भर नहीं है बल्कि कहीं गहरे वहां तक जाती है जहां दो कविताएं एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनाने लगती हैं। यहीं इस बात के भी भेद छिपे हैं कि क्यो एक को सिकुड़ती जाती कविता और दूसरे को व्यापक होती कविता यहां कहा जा रहा है।

इसके पहले कि हम कविता में जाएं और इसकी वजहों की पड़ताल करें कुछ सूत्र जो हमारे हाथ लगे हैं उनका उल्लेख यहां करना अप्रासंगिक नहीं होगा। केदारनाथ सिंह ने अपना कविता-संग्रह अपने गांव के लोगों को समर्पित किया है जिनके बारे में उनका मानना है कि उन तक यह किताब कभी नहीं पहुंचेगी। जाहिर है कि इन पंक्तियों में कविता को लेकर कोई निराशा नहीं है बल्कि उस बाजार पर सवाल है जो लोगों तक कविता को पहुंचने नहीं देता। यानी कि जिस तरह से कविता बाजार के विरुद्ध खड़ी है उसी तरह से बाजार भी कविता के खिलाफ खड़ा है। इन पंक्तियों में वे इसी ओर इशारा कर रहे है। साथ ही वे यह भी कह रहे हैं कि उनकी कविता दूर जनपदों में उपेक्षित पड़ी जिंदगियों की कविता है इसलिए यहां एक सच्चे कवि की चिंता भी है जो सिर्फ लिख देने तक ही अपना दायित्व नहीं समझता बल्कि जिसके लिए लिखी गई है कविता वहां तक पहुंचे इसे भी वह अपने काम का हिस्सा मानता है। जबकि दूसरी ओर हम देखते हैं कि अशोक वाजपेयी में कविता को लेकर एक प्रकार की निराशा है जो शायद कविता को लेकर निरर्थकता बोध से पैदा हुई है जिसने इस चौदहवें संग्रह के बाद उनके कविता लिखने की रफ्तार को थाम लिया है। अपने संग्रह की भूमिका के पहले पैराग्राफ में उन्होंने लिखा है:

अच्छी-बुरी कविता लिखते एक अधसदी से अधिक का समय हो गया है। पहला कविता-संग्रह 1966 में प्रकाशित हुआ था और यह चौदहवां 2013 में आ रहा है। हालांकि कविता को लेकर उत्साह और उम्मीद में कोई कमी नहीं हुई है, कविता लिखने की रफ्तार जरूर धीमी पड़ गई है जो ठीक ही है।

इन पंक्तियों से पता चलता है कि वे उत्साह और उम्मीद में कविता लिखते हैं लेकिन यह उत्साह क्यों है और उम्मीद किस बात को लेकर वे पाले हुए थे या हैं इसका जिक्र अपनी भूमिका में उन्होंने करने की जरूरत नहीं समझी और न इसका पता उनकी कविताओं को पढ़ने से चल पाता है। आखिर वह कैसी उम्मीद थी जो बकौल उनके अब भी बनी हुई है लेकिन कविता लिखने की रफ्तार धीमी पड़ गयी है जिसे वे अच्छा बता रहे हैं। वे यहां फिर यह बताने की जरूरत नहीं समझते कि यह अच्छा कैसे है क्योंकि इस पंक्ति में यह आशय भी छिपा हुआ है कि पहले जरूर कुछ था जो बुरा था। अगर बुरा था तो क्या और क्यों इस पर भी उन्हें रोशनी डालनी चाहिए थी लेकिन वे ऐसा कुछ नहीं करते। कविता लिखने के लिए जिस आंतरिक मनःस्थिति की जरूरत पड़ती है क्या उस मनःस्थिति में कविता नहीं लिखा जाना भी संभव है जो अब वे कम लिख रहे हैं या पहले वे अभ्यासवश भी कविता लिख जाते थे जैसा करने का उन्हें अब कोई प्रयोजन नजर नहीं आ रहा है। क्या हम यह न मान लें कि जिसे वे उत्साह या उम्मीद कह रहे हैं दरअसल वह इच्छाएं थीं लेकिन कोई प्रयोजन-चाहे वह जो भी हो-सिद्ध ना होता देख कर जन्मी हताशा ने कविता लिखने की रफ्तार को थाम लिया है। भला सोचिए कविता लिखने की भी कहीं कोई रफ्तार होती है जिसका वो जिक्र कर रहे हैं। यहां तो गहरे उतर जाने वाली बात होती है।  

ऐसा क्यों होता है कि एक ही समय में लिखते हुए भी दो कवियों का विकास भिन्न तरीके से होता है। हम देखते हैं कि जो कवि कविता की चिंता करता है वह सिमटता जाता है फिर भी वह ऐसा करता है और वह भी उसी समय में जिसमें दूसरा कवि दुनिया की चिंताओं से कविता का जोड़ता चलता है और व्यापक होता जाता है। क्यों एक को चिंता नहीं होती कि वह सिमटता जा रहा है और वह भी इस हद तक कि कविता का कोई मकसद भी होता है उसे यह दिखना बंद हो जाता है जबकि दूसरा दुनिया भर के दुख और संघर्ष से जुड़ने की हर संभव कोशिश में लगा रहता है। जाहिर तौर पर विचारधारा होना और विचारधारा नहीं होना यह अंतर पैदा करता है। वही विचारधारा जिसे इन दिनों अप्रासंगिक करार देने की मुहिम सी कुछ लोगों ने साहित्य में चला रखी है। यहां तक कि उसे मृत तक घोषित किया जाने लगा है जबकि आज के विषमता भरे समय में कविता के लिए यह प्राणवायु की तरह है। यह धारणा केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की कविता को पढ़ते हुए और भी पुरजोर तरीके से पुष्ट होती है कि कैसे इसका होना या नहीं होना काम करता है। कैसे यह प्राणवायु केदारनाथ सिंह की कविता को समय के एक जीवंत दस्तावेज में बदल देती है जबकि इसके बिना अशोक वाजपेयी की कविता निरुद्देश्य भटकती हुई प्रतीत होती है। और इस भटकाव में भी कोई आवारगी नही है दीवानापन नहीं है बल्कि हड़बड़ी है। ’तेजी से क्यों?’ कविता में वे खुद कबूलते हैं ’हमारी मुश्किल है हमारी हड़बड़ी’। आखिर यह हड़बड़ी क्यों है? इसी कविता में वे एक जगह लिखते हैं:

जिस अनन्त वर्तमान में रहने को अब हम विवश हैं
उसमें स्मृति की जगह नहीं बची है
याद करना अपने को गुनाह में शामिल करना है।


यहां ’अनन्त वतर्मान’ शब्दावली ध्यान देने योग्य है। साफ है कि वे यह मान कर चल रहे हैं कि यह पूरा समय एक अनन्त वर्तमान की तरह है, इतिहास का अंत हो चुका है और इस पर अब बहस करने के लिए भी कुछ नहीं बचा है। अगली पक्तियों में वे ऐसा ही कुछ कह भी रहे हैं। बात सिर्फ इतनी ही भर नहीं है कि कविता इतिहासविहीन है बल्कि यह भविष्योन्मुखी भी नहीं है क्योंकि भविष्य के सपने इतिहास के गर्भ में पलते हैं और विचारधारा उसे निश्चित आकार देती है। अशोक वाजपेयी इन दोनों का निषेध करते हैं अतः वे ’अनन्त वर्तमान’ में रहने को अभिशप्त हैं। वे इस बात को समझते भी हैं लेकिन इस स्थिति से उबरने का कोई संघर्ष उनकी कविता या कविता की चेतना में दिखाई नहीं देता है। बल्कि इसके उलट एक प्रकार की स्वीकारोक्ति है। कोई दुख या क्षोभ भी नहीं है बल्कि एक तरह का सहज भाव है जो कविता को लम्पटता की हद तक ले जाता है। उपरोक्त कविता में एक जगह ये पंक्तियां आती हैं:

दूर से दुख, भले वह करोड़ों का रहा हो
जिनका संहार हुआ और जिन्हें उसका कारण
या अपना दोष तक पता नहीं चला
रंगीन-सा लगता है।


एक दूसरी कविता ’अपने शब्द वापस’ की इन पंक्तियों को देखिये:

शब्दों का इतिहास होता है
पर मेरे शब्द उसमें होंगे
ऐसी दुराशा करने का कोई आधार नहीं।


इसी कविता के अंत में जैसे हाथ खड़े करते हुए वे कह उठते हैं:


सचाई, शब्दों से, कम से कम मेरे शब्दों से
दूर जा चुकी है
और अब तो यह मानना तक मुश्किल है
कि वह कभी इन शब्दों में थी।


सवाल है कि अगर शब्दों में सचाई या कहना चाहिए कि अर्थ नहीं है तो क्यों नहीं है। जाहिर है कि शब्दों में सचाई या अर्थ जीवन से आते हैं। जीवन जितना अर्थपूर्ण और समर्पित होता है शब्द भी उतने ही अर्थपूर्ण और सच के रूप में सामने आते हैं और कई बार तो जीवन का नया आयाम खोलते हुए एक बिल्कुल नया अर्थ प्रकट कर जाते हैं। आप जिसके लिए जी रहे हैं आपकी कविता भी उसी के लिए होगी। इस भ्रम में रहने की कोई जरूरत नहीं कि आपकी कविता सब के लिए होगी। ठीक वैसे ही जैसे कि आप सबके लिए जी नहीं सकते। अगर आप यह भ्रम पैदा करने में सफल हो भी जाते हैं तो कविता सब कुछ उजागर कर देती है। संग्रह की अंतिम कविता ’कहां से उठाऊं शब्द’ बता देती है कि कवि तय नहीं कर पाया है कि वह किस ओर है। एक उहापोह की स्थिति है। और वह भी ऐसी कि वह चीजों को जोड़ कर नहीं देख पा रहा है। टुकड़े-टुकड़े में देख रहा है। अगर ऐसा है तो फिर जुड़ाव कहां से हो, कोई भी पक्ष कैसे सामने आए, जुझारूपन तो दूर की बात है। ’ऐसा क्यों हुआ’ कविता में वे कहते हैं:

हमें भ्रम है कि हम साहसी थे
जब साहस की सबसे ज्यादा दरकार थी
हम आगे की कतार में नहीं थे।

यहां वे ’हम’ शब्द का इस्तेमाल पता नहीं किन लोगों के लिए कर रहे हैं। वह हर जगह एक अकेले व्यक्ति की तरह दिखते हैं किसी संगठन या आंदोलन में शरीक कार्यकर्ता की तरह नहीं। फिर इस ’हम’ का क्या मतलब है। अगर यहां ’हम’ की जगह ’मैं’ होता तो मैं यह मान लेता कि वह जो कुछ कह रहे हैं वह उनकी ईमानदार स्वीकारोक्ति है लेकिन ’हम’ कह कर उन्होंने जो धुंधलका खड़ा करने की कोषिष की है वह उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़े कर जाती है। यह मैं यूं ही नहीं कह रहा हूं बल्कि देखने में यह आता है कि अनेक दूसरी कविताओं में उन्होंने ’हम’ नहीं बल्कि ’मैं’ का इस्तेमाल किया है जैसे कि ’फिर भी आवाज सुनाई देती है’, ’भले’, ’अब सब कुछ को’ , ’अपने शब्द वापस’, ’तीन कविताएं’, ’विनय गीत’, ’मैंने’ आदि बहुतेरी कविताओं में देखा जा सकता है।

दूसरी ओर हम देखते हैं कि केदारनाथ सिंह की कविता का स्वर अशोक वाजपेयी की कविता के मुकाबले कहीं ज्यादा समकालीन है। आसपास की आवाजें, बदलते रुख को यहां सुना और देखा जा सकता है। कई नाम मिलेंगे, कई जगहें मिलेंगी, कई घटनाएं मिलेंगी जो अपने जीवन में घटती रहती हैं, कई दृश्य आते हैं जो आपकी अपनी आंखों से देखी हुइ्र होती हैं और यह सब मिल कर कविता जो संसार रच जाती है वहां आपके जीवन के कई सारे अर्थ खुलने लगते हैं। संग्रह के नाम ’सृष्टि पर पहरा’ के नाम से संग्रह में एक छोटी कविता भी है जिसमें वे लिखते हैं:

कितना भव्य था
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना
उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते।


सूखता हुआ वृक्ष दुख का वह पहाड़ है जिसे वे पत्ते अपने अंदर समेटे हुए ऊपर निकल आए हैं। वे तीन चार पत्ते कविता हैं जो दुख के पहाड़ से निकले हैं शायद इसीलिए वह सही मायने में कविता की भूमिका अदा कर पाते हैं। ये कविताएं जूझते या लड़ते आदमी के हाथ में पतवार या तलवार की तरह होती हैं या नहीं तो कम से कम उसे यह अहसास जरूर करा जाती हैं कि वह कोई महती काम में शरीक है, उसका जीवन-संघर्ष निरर्थक या नगण्य नहीं है बल्कि वह जीवन-समर में जरूरी हस्तक्षेप कर रहा है। असफलताओं की मार से इस तरह ये कविताएं उसे बचाती हैं हालांकि मैं तुलनात्मक अध्ययन नहीं करना चाह रहा लेकिन मुझे जरूरी लग रहा है कि यहीं पर अशोक वाजपेयी की ’इतनी भर’ कविता पर भी बात कर ली जाए नहीं तो हो सकता है आगे मौका न मिले क्योंकि उनकी कविताओं को लेकर जो कुछ कहा जाना था कहा जा चुका है। ’इतनी भर’ में वे लिखते हैं:
 

दुनिया इतनी भर बची है
जितनी एक कविता में आ जाए
दुनिया इतनी भर है अब
जितनी एक उपन्यास में समा जाए
दुनिया इतनी भर बाकी है
जितनी एक बच्चे की किलकारी में बस सके।


यानी कि दुनिया को वे उतनी ही भर मान रहे हैं जो किसी बच्चे की किलकारी सी निष्छलता, मासूमियत और पवित्रता को बिना नष्ट किये उसमें आ सके। यही शर्त कविता के साथ भी दुनिया को लेकर लागू है जैसा कि प्रारम्भिक पंक्तियों में वे कहते हैं। यानी कि कविता से वे एक ही झटके में जिंदगी के उन तमाम पहलुओं को बाहर निकाल फेंकते हैं जो धूसर है, जिसे व्यवस्था की चालाकी, मक्कारी और बेईमानी ने पस्त होती या फिर लहूलुहान होती जिंदगी की ओर धकेल दिया है, जहां संघर्ष है, हताशा है फिर संघर्ष है और फिर फिर संघर्ष है। जबकि केदारनाथ सिंह की कविता इसी मिट्टी से तप कर निकली है। कविताओं में एक मद्धम राजनीतिक स्वर भी है जो रह रह कर सुनाई देता रहता है। कई बार यह स्वर अबूझमाड़ के जंगलों से भी उठता सुनाई देता है और अचानक सुनने वाला चौंक पड़ता है।

केदारनाथ सिंह हिंदी के संभवतः पहले बड़े कवि हैं जिनकी कविता में माओवादी राजनीति की धमक सुनाई पड़ती है। यह बेहद महत्वपूर्ण है इस अर्थ में कि कवि जो महसूस करता है उसे वह बिना इस बात की चिंता किये कि यह अभिव्यक्ति उसका नुकसान भी कर सकती है वह उसे कविता में उसके पूरे अधिकार और सम्मान के साथ रखता है। एक ऐसे समय में जब लोग ईमानदारी को ताख पर रखकर अपने नफे-नुकसान के गणित में इस कदर मशगूल हैं कि उनकी सवेदना को ऐसी बातें छू भी नहीं पातीं वहीं केदारनाथ सिंह इस जोखिम को उठाते नजर आते हैं। इस पहल को सभी नोटिस में लें यह जरूरी है क्योंकि तभी यह संग्रह एक अर्थ में हिंदी कविता का टर्निंग प्वायंट हो सकता है। यह हिंदी कविता के अराजनीतिकरण के छद्म को तोड़ता है। इस संग्रह का महत्व क्यों और कैसे है यह समझने के लिए जरूरी है कि साहित्य और राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को समझ लिया जाए। दरअसल पिछले दिनों हुआ यह कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से खुद को अलगाने की कोशिश में कविता या तो ’निरुद्देश्य भटकती’ कविता होकर रह गयी या फिर सामाजिक रूढि़यों से लड़ती पहचान की राजनीति करती हुई स्त्री विमर्ष या दलित विमर्ष की राजनीति में सिमट गई जो कहीं न कहीं से इसी व्यवस्था को मजबूत बनाये रखने का काम करती है। इसका नतीजा यह हुआ कि कविता भाषा, विचार और सत्ता के स्तर पर जकड़ गई। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती साहित्य को उसके इस जकड़न से निकालने की है। यह कहना अभी मुश्किल है कि माओवाद की लड़ाई को इस तरह की कविता से ताकत मिलेगी या नहीं लेकिन यह तय है कि माओवाद की लड़ाई की जो ताकत है वह कविता को उसके जकड़न से जरूर मुक्त कर सकती है और उसे जनता के बीच पुनः प्रतिष्ठित कर सकती है। केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह के जरिये यही काम किया है। संग्रह में एक कविता है ’कविता’ शीर्षक से जिसमें वे यह बताते हैं कि वास्तविक कविता कहां है। उनका साफ मानना है वह वहां नहीं है जहां मंच है, पुरस्कार है प्रतिष्ठान है और उसका संरक्षण है। वे कहते हैं

सरकारें परेशान
कि क्या करें-क्या करें इस कविता का
कि हवा दो
पानी दो
टैक्स में दे दो चाहे जितनी छूट
पर वोट मांगने जाओ
तो कभी अपने पते पर मिलती ही नहीं
जाने कैसी बनैली प्रजाति की लतर है
किसी राष्ट्रीय उद्यान में
खिलती ही नहीं।


फिर कहां है कविता। इसी कविता में पूरे आत्मविश्वास से वे बताते हैं कि वह कहां है:

पता लगा लो-जो मारे जाते हैं जंगलों में
उन युवा होंठों पर
अक्सर होती है कोई न कोई कविता।


मरते वक्त भी जिसके होंठों पर कविता होगी कोई शक नहीं कि कविता भी उसी की होगी, उसी के गीत गाएगी।

एक छोटी कविता है ‘बाजार में आदिवासी’ जिसे यहां पूरा का पूरा रखा जाना जरूरी है:

भरे बाजार में
वह तीर की तरह आया
और सारी चीजों पर
एक तेज हिकारत की नजर फेंकता हुआ
बिक्री और खरीद के बीच के
पतले सुराख से
गेहुंअन की तरह अदृश्य हो गया
एक सुच्चा
खरा
ठनकता हुआ जिस्म
कहते हैं वह ठनक अबूझमाड़ में
रात बिरात
अक्सर सुनाई पड़ती है
मिला कोई गायक
तो एक दिन पूछूंगा
संगीत की भाषा में
क्या कहते हैं इस ठनक को?


सात सुरों से सजे शास्त्रीय गायकों के लिए इसका जवाब ढूंढ पाना सरल नहीं होगा कि आखिर महज तीन सुरों में गाने वाले इन आदिवासियों ने यह कैसी ठनक पैदा कर दी है जिसका जवाब खंगालने से भी नहीं मिल रहा है। समझा जा सकता है कि कविता और संगीत की धुन पर जिस आंदोलन के कदम उठ रहे हों उसे बमों और गोलियों की बौछारों से ध्वस्त नहीं किया जा सकता। भला ध्वस्त किया भी कैसे जा सकता है जहां सिर्फ कान ही नहीं पांव भी सुनते हैं। ’पांव’ कविता में वे कहते हैं:

कभी चलते हुए अचानक
अगर तेज-तेज चलने लगे तुम्हारे पांव
समझना उन्होंने सुन ली है
किन्हीं जंजीरों की झन-झन


’जहां से अनहद शुरू होता है’ की पंक्तियां हैं:

कोहरे में ये घंटियों की आवाज
कहां से आ रही है सुबह-सुबह
क्या आज फिर कोई मीटिंग है
झरही किनारे
या बेलवा जंगल में


संग्रह में एक गजल है जिसका एक शेर इस प्रकार है:

इक शख्स वहां जेल में है सबकी ओर से
हंसना भी यहां जुर्म है क्या पूछ लीजिए


दरअसल देखा जाए तो इस तरह की पंक्तियां बिखरी पड़ी हैं संग्रह में। ’गुमशुदा कवि’ में वे लिखते हैं:

हर चेहरा लगता है
एक लपट के जैसा


या ’चुप्पियां’ में कहते हैं:

चुप्पियां बढ़ती जा रही हैं
उन सारी जगहों पर
जहां बोलना जरूरी था


आप कह सकते हैं कि इसी चुप्पी को तोड़ने की कोशिश है यह संग्रह। इस बेहद नाजुक दौर में यह संग्रह एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।