Monday, 23 June 2014



यह आवाज मुझे सच्ची नहीं लगती

एक चिथड़ा तक नहीं बदन पर मेरे कपड़े का गुजरात की सड़कों पर
दंगाइयों से बचकर भागती एक औरत हूँ मैं
छीनकर गोद से मेरी मेरे बच्चे को पछीट दिया गया है सड़क पर
पछीट दिए जाने का मतलब समझते हैं न आप,
एक साथ कई हाथों से बुरी तरह स्तन मसले गए हैं मेरे
उस वक्त उनसे निकलते दूध की चिपचिपाहट को भी
नहीं किया गया है अपनी हथेलियों पर महसूस
जननांग में घुसेड़ कर मेरे डंडा फहराया गया है उस पर एक ध्वज

भाइयों पिताओं और बुजुर्गों के सामने मुझे अपने
करके एकदम नंगा दौड़ाया गया है सड़कों पर
जिन्होंने पाल पोसकर किया मुझे बड़ा सँजोए मुझे लेकर सपने
सोचती हूँ अपने सामने मुझे नंगा दौड़ते हुए उन्हें कैसा लगा होगा
दौड़ाते समय मेरी पीठ के नीचे बुरी तरह बरसाए गए हैं डंडे

पुरुषों की तरह मुझसे नहीं पूछा गया मेरा नाम
नहीं की गई है कोशिश जानने की मेरा धर्म
उतरवा कर कपड़े नहीं की गई है मेरी पहचान
पहनावे के आधार पर दूर से ही चीन्ह लिया गया है मुझे
लेकिन मेरे भाइयों और पिताओं की गर्दनों की तरह तलवार से
एक झटके में नहीं उड़ाई गई है मेरी गर्दन
बल्कि मेरे मौत मांगने से पहले कुत्तों की तरह
बख्श देने के लिए जुड़े मेरे हाथों को चाटा गया है
रौंदा गया है मेरे आंसुओं को वीर्य तले

दूर कहीं से चलकर आवाज आती है दंगा खत्म हो गया है
सच्ची नहीं लगती मुझे यह आवाज
मुझे नहीं लगता दंगा खत्म हुआ है अभी
ये दंगा कभी खत्म होगा भी नहीं, मेरे और
मेरी देह के खिलाफ ये दंगा सदियों से जारी है
और जारी है इन दंगाइयों से बचकर मेरा भागना
जैसे मैं इन दिनों भाग रही हूँ गुजरात की सड़कों पर
                   (साभार, नया पथ, जनवरी-मार्च, पवन कारण, पृ. १३९-१४०)
 


Friday, 28 March 2014

महान क्रांतिकारी भगत सिंह का एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण पत्र
----------------------------------------------------------------
(२३ मार्च,१९९५ को दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित श्री ओ.पी. बनमाली का आलेख )
भगत सिंह का क्रांतिकारी स्वरुप तो हमेशा ही जनता के सामने आता रहा है ,लेकिन ध्यान देने की बात यह भी है कि क्या उस किशोर क्रांतिकारी में मानवीय गुण थे या नहीं ? भगत सिंह के प्रेम संम्बंध पर अटकलें प्पूर्व में लगाई जाती रही हैं , लेकिन नारी के प्रेयसी-रूप संबंधी उनके दृष्टिकोण पर अब तक कम ही चर्चा हुई है ! कहा जाता है कि भगत सिंह ने असेम्बली पर बम फेंकने का निर्णय भी किसी नारी के कारण ही लिया था ! एक हम उम्र किशोरी की मुस्कुराहट का उसी अंदाज़ में जवाब देकर उन्होंने यह जरुर साबित किया था कि मानवीय संवेदना के धरातल पर वे किसी से कम नहीं थे ! सुखदेव के द्वारा विरोध किये जाने पर उन्होंने सुखदेव को एक दुर्लभ पत्र लिखा था , जिसमें नारी के प्रेयसी-रूप के प्रति उनके दृष्टिकोण का पता चलता है ! नीचे वह पत्र संलग्न है :---
प्रिय भाई ,
जैसे ही यह पत्र तुम्हें मिलेगा , मैं जा चुका हूँगा --- दूर एक मंजिल की ओर ! मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं आज बहुत खुश हूँ ! हमेशा से ज्यादा ! मैं यात्रा के लिए तैयार हूँ ! अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी एक बात मेरे मन में चुभती रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मेरे ऊपर बहुत ही गम्भीर आरोप लगाया...कमजोरी! आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ ! पहले से कहीं अधिक !
आज मैं महसूस करता हूँ कि वह बात कुछ भी नहीं थी , एक गलतफहमी थी . एक गलत अंदाज़ था ! मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी ! परन्तु अब मैं महसूस करता हूँ कि कोई गलतफहमी नहीं, मैं कमजोर नहीं, अपनों में स किसी से भी कमजोर नहीं !
भाई, मैं साफ़ दिल से विदा हूँगा ! क्या तुम भी साफ़ होगे ! यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए !गम्भीरता और शान्ति स तुम्हें काम को आगे बढाना है ! जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना ! जनता के प्रति तुम्हारा कुछ कर्त्तव्य है ! उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना !
ख़ुशी के इस वातावरण में मैं कह सकता हूँ कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है , मैं उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता ! मैं पूरे जोर से कहता हूँ कि मैं आकांक्षाओं और आशाओं से भरपूर हूँ और जीवन की आनंदमय रंगीनियों से ओतप्रोत हूँ, पर आवश्यकता के समय पर सब कुछ कुर्बान कर सकता हूँ और यही वास्तविक बलिदान है ! ये चीज़ें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो ! निकट भविष्य में ही तुम्हें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा !
किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बात करते हुए यह बात सोचनी होगी कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है ! मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूँ ------ हाँ, यह मेजिनी था ! तुमने अवश्य ही पढ़ा होगा कि अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालनेवाली हार , मरे हुए साथियों की याद वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था ! वह पागल हो जाता या आत्मह्त्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक पत्र से वह, यही नहीं कि किसी एक से मजबूत हो गया, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया !
जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का सम्बन्ध है , मैं यह कह सकता हूँ कि यह अपने आप में कुछ नही है, सिवाय एक आवेश के , लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं . एक मानवीय , अत्यंत मधुर भावना है ! प्यार अपने में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है ! प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊंचा उठाता है , यह कभी भी उसे नीचा नहीं करता , बशर्ते कि प्यार प्यार हो ! तुम कभी भी इन लडकियों को वैसी पागल नहीं कह सकते, जैसे कि फिल्मों में हम प्रेमियों को देखते हैं ! वे सदा पाशविक वृत्तियों के हाथों खेलती हैं! सच्चा प्यार कभी भी गढा नहीं जा सकता ! वह अपने ही मार्ग से आता है ! कोई नहीं कह सकता कब !
हाँ, मैं यह कह सकता हूँ कि एक युवक, एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं ! मैं यहाँ एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ कि जब मैंने कहा था कि प्यार इनसानी कमजोरी है, तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था , जिस स्तर पर कि आम आदमी होते हैं ! वह एक अत्यंत आदर्श स्थिति है, जहाँ मनुष्य प्यार-घृणा आदि के आवेशों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपने कार्यों का आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा , लेकिन आधुनिक समय में यह कोई बुराई नहीं है, बल्कि मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक है ! मैंने एक आदमी के एक आदमी से प्यार की निंदा की है, पर वह भी एक आदर्श स्तर पर ! इसके होते हुए भी मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए , जिसे कि वह एक ही आदमी में सीमित न कर दे बल्कि विश्वमय रखे !
मैं सोचता हूँ , मैंने अपनी स्थिति अब स्पष्ट कर दी है ! एक बात मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि क्रांतिकारी विचारों के होते हुए हम नैतिकता के सम्बन्ध में आर्यसमाजी ढंग की कट्टर धारणा नहीं अपना सकते ! हम बढ़-चढ़ कर बात कर सकते हैं और इसे आसानी से छुपा सकते हैं , पर असल जिंदगी में हम झट थर-थर काम्पना शुरू कर देते हैं !
मैं तुमसे यह कहूँगा कि तुम यह छोड़ दो ! क्या मैं अपने मन में बिना किसी गलत अंदाज़ के गहरी नम्रता के साथ निवेदन कर सकता हौं कि तुम में जो अति आदर्शवाद है , उसे जरा कम कर दो ! और उनकी तरफ से तीखे न रहो , जो पीछे रहेंगे और मेरे जैसी बीमारी का शिकार होंगे, उनकी भर्त्सना कर उनके दुखों, तकलीफों को न बढाना ! उन्हें तुम्हारी सहानुभूति की आवश्यकता है !
क्या मैं यह आशा कर सकता हूँ कि किसी ख़ास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है ! लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते , जब तक कि तुम स्वयम उस चीज़ का शिकार न बनो ! मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ! मैं बिलकुल स्पष्ट होना चाहता था ! मैंने अपना दिल साफ़ कर दिया है !
तुमरी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित !
-----तुम्हारा भाई,
भगत सिंह



Sunday, 23 March 2014

भगत सिंह के जन्मदिवस पर उनके नाम प्रो. लाल बहादुर वर्मा का एक ख़त


प्यारे दुलारे भगत,


ख़त में एक दूरी तो है पर यह ख़त हम तुम्हारे मार्फ़त खुद को लिख रहे हैं- तुम से जुड़कर तुम्हे अपने से जोड़ रहे हैं ..

तुमे हम क्या कहकर पुकारे यह तय करना बाकी है , क्योकि तुमसे जन्म का रिश्ता तो है नहीं कर्म का रिश्ता है और तुम्हे जो करना था कर गए , हमें जो करना है वह कितना कर पाते है यह इसे भी तय होगा की हम तुम्हे कैसे याद करते हैं .बहरहाल इतना तो तय ही है की तुम्हें ''शहीदे आज़म'' कहना छोड़ दिया है . इसमें जो दूरी , जो परायापन था वह पास आने से रोकता रहा है . तुम्हें अनूठा ,असाधारण ,निराला बनाकर हम बचते रहे की तुम जैसा और कोई हो ही नहीं सकता . आखिर क्यों नहीं हो सकता? आखिर तुमने ऐसा क्या किया है जो दूसरा नहीं कर सकता ? तुमने देश से प्रेम किया , समाज को बदलना चाहा . घर परिवार को समाज का अंग मान समाज को आज़ाद और बेहतर बनाना चाहा , आखिर तभी तो घर परिवार आज़ाद और बेहतर हो सकते थे ..तुमने अनुभव और अध्ययन से जाना और लोगों को बताया कि शोषण और जुल्म करने वालों में देशी-विदेशी का अंतर बेमानी होता है , तुमने कितनी आसानी से समझा दिया कि तुम नास्तिक क्यों हो गए थे ? तुमने कुर्बानी दी पर कुर्बानी देने वालों की तो कभी कमी नहीं रही है .आज भी कुर्बानी देने वाले हैं . हाँ तुम्हारी चेतना का विकास और व्यापक पहुँच असाधारण थी,पर कोई करने आमादा हो जाय तो ये सब मुश्किल भले ही हो पर असंभव तो नहीं होना चाहिए!

पर हाँ , तुम्हारी तरह लगातार अपने साथ आगे बढ़ते जाने का जज्बा और कोशिश तो चाहिए ही . 

तुमने जब अपने वक्त को और उसी से जोड़कर अपने को जाना पहचाना . तो हिन्दुस्तान पर बर्तानिया के हुक्मरानों की हुकूमत बेलौस और बेलगाम हो चुकी थी . आज अमरीकी निजाम उसी रास्ते पर है , वह ज्यादा ताकतवर, ज्यादा बेहया और ज्यादा बेगैरत है . उसे हर हाल में अपनी जरूरतें पूरी करनी हैं .पर दूसरी तरफ दुनिया तो पहले से ज्यादा जागी हुई है . खुद अमेरिका में ही लाखों लोग अपने ही देश में अमन और तहजीबो-तमददुन के दुश्मनों के खिलाफ बगावत पर आमादा हैं . यह सच है की दुनिया को भरमाने और तरह तरह के लालचों के जाल में फसाकर न घर न घाट का कुता बना देने के ढेरों औजार और चकाचौध पैदा करने वाली फितरतें हैं हुक्मरानों के पास . लोगों को तरह तरह से बाट कर रखने के उपाय हैं पर आम लोग भी तो पहले की तरह भेड़ बकरी नहीं रहे .आज ठीक है कि ज्यादातर लोग सम्मान पूर्वक रोटी दाल भी नहीं खा रहे और पढ़े लिखे लोग रोटी पर तरह तरह के मक्खन और चीज चुपड़ने में ही मरे जा रहे हैं पर यह भी तो सच है कि ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो जानने समझने लगे है कि जो कुछ उनका है वह उन्हें क्यों नहीं मिल पा रहा है ? आज आदमी के हक़ छीने जा रहे हैं यहाँ तक की हवा पानी के हक़ भी .. जो कुदरत ने हर किसी को दे रखा है . पर हकों की पहचान भी तो बढ़ रही है . आज इन्साफ की उम्मीद नहीं रही . पर इन्साफ के लिए खुदा नहीं ,इंसान को जिम्मेदार ठहराने की तरकीबें बढ़ रही हैं . इंसान धरती सागर ही नहीं अन्तरिक्ष को भी रौंद रहा है पर उसकी इंसानियत खोती जा रही है . पर साथ ही बढ़ रहा है हैवानियत से शर्म का अहसास , बढ़ रहे हैं भारी पैमाने पर लालच बेहयाई और बर्बरता ..पर क्या गुस्सा नहीं बढ़ रहा?



तो भगत ! हम तुम्हारे अनुयायी नहीं ,तुमसा बनना चाहते हैं बल्कि तुमसे आगे जाना चाहते हैं .क्योकि तुमसा बनने से भी काम नहीं चलेगा . तुम रूमानियत से उबरते जा रहे थे ,पर क्या पूरी तरह ? आज के हालात में भी रूमानियत जरूरी है पर दाल में नमक भर ...


दुखी मत होना यह जानकर कि अब तो सफल होने में जुटे लोगों के लिए तुम प्रासंगिक नहीं रहे . आज़ादी के फ़ौरन बाद शैलेन्द्र ने लिखा था कि ''भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की ,देश भक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की'' .
मैं जानता हूँ, तुम्हें इतिहास से कितना प्रेम था .इत्मीनान रखना कि अनगिनत लोग तुमसे यानी अपने इतिहास से प्रेम करते हैं . वे इतिहासबोध से लैस हो रहे हैं . तुम्हारी मदद से,इतिहास की मदद से वे दुनिया बदलने पर आमादा हैं .हम पुराने हथियारों पर लगी जंग छुडा उन्हें और धारदार बनायेंगे और लगातार नए नए हथियार भी ढूढते जायेंगे .दोस्त दुश्मन की पहचान तेज करेंगे , हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि तुम आज होते तो क्या क्या करते ? हमें तुम्हारे बाद पैदा होने का फायदा भी तो मिल सकता है . एक भगत सिंह से काम नहीं चलने वाला , हमसब को 'तुम' भी बनना होगा.



यह सब लिख पाना भी आसान काम नहीं था , बरसों लग गए यह ख़त लिखने में , जो कुछ लिखा है उसे कर पाने में तो और भी ना जाने कितना वक्त लगे ....!


तुम्हारा , लाल बहादुर 
इतिहासबोध

http://jantakapaksh.blogspot.in से साभार 

Saturday, 25 January 2014

आम आदमी कौन
वह जो लोहा पीटता
चंद रोटी के लिए
पसीने से तरबदर
अपने भाग्य को ढोने
को विवश है
या फिर वह
जो वातानुकूलित कमरों में
हाथ में काजू लिए
गर्म कॉफी का स्वाद लेता हुआ
आम आदमी को मुख्यधारा में
लाने की बात करता है।

Monday, 20 January 2014

मोहन जी मोहन जी

मोहन जी मोहन जी
ये क्या किया आप ने
जनता बिलख रही है
मंहगाई और गरीबी की मार से ।
क्या हुआ उस नारे का
की सब के हाथ में
रोजगार होगा
और रहने के लिए मकान होगा। 
सुना है सरकारी आंकड़े में
युवाओं वाले बेरोजगार भारत 
के प्रधानमंत्री हैं आप ।

Thursday, 9 January 2014

राजेन्द्र यादव की निगाह में इतिहास और औरत


व्यक्ति अपने जीवन में यदि किसी के प्रति सकारात्मक सोच बना लेता है तो उसे आए-पास के सभी लोग, उसकी संस्कृति और राष्ट्र-राज्य के लिए एक नकारात्मक सोच बनने लगती है। यही कुछ राजेन्द्र यादव जी के साथ भी था। निश्चित रूप में राजेन्द्र यादव हंसके माध्यम से अनेक विमर्शों, मुद्दों को अहमियत दी और उसे एक सकारात्मक जमीन प्रदान की। लेकिन गाहे-बगाहे हंसकी संपादकीय में तर्क से ज्यादा कुतर्क दिखाई देता था। कुछ लोगों का मानना है कि ये सारे कुतर्क वे चर्चा के केंद्र रहने के लिए गढ़ते या देते थे। इसलिए इसको नजर अंदाज कर देना चाहिए। लेकिन ऐसे लोगों को यह भी समझना चाहिए कि एक ही बात को बार-बार कहने पर उसका प्रभाव समाज पर धीरे-धीरे पड़ने लगता है वह और सत्य-सा लगने लगता है। उदाहरण स्वरूप 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज़ गलत तरीके से हिन्दू-मुस्लिम भाई-चारे को एक दूसरे के लिए खतरा बता कर व्यापक पैमाने पर प्रचार-प्रसार किया, जो बाद के समय में दोनों एक दूसरे के लिए खतरा बन गए जिसकी परिणति हमें भारत-पाकिस्तान विभाजन के रूप में दिखाई देता है।
            खैर, मैं अपने मुद्दे पर राजेन्द्र यादव की एक संपादकीय (जून, 2006) से आता हूँ। संपादकीय कुछ इस प्रकार से था- उन्होंने (अंग्रेज़) हमें भारतदिया। उसकी सरहदें तय कीं और कुशल राष्ट्र-राज्यकी स्थापना की। ..... मुझे यह भी लगता है कि अंग्रेजों जैसा सुगठित और सुव्यवस्थित शासन न होता तो भारत जैसा लद्दद, निकम्मे, भविष्यहीन समाज को सामंती चंगुल से निकल पाना असंभव था। शायद सारा परिदृश्य सऊदी अरब, नेपाल, अफगानिस्तान या अफ्रीका जैसा ही होता। ..... अंग्रेजों ने हमें दो-ढाई सौ साल बुरी तरह लूटा और ऐसे- ऐसे जघन्य अत्याचार किए गए अत्याचार बौने दिखाई दें। ..... मगर हम भी जानते हैं कि शासन चलाने के लिए कानून और व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है। ..... हम शायद दुनिया के सबसे बड़े कृतघ्न देश होंगे जो कहे कि अग्रेजों ने हमें आधुनिक नहीं बनाया।ये कुछ उदाहरण हैं जो राजेन्द्र यादव हंसकी संपादकीय में लिखे थे।
             दरअसल राजेन्द्र यादव जिस तरह से अंग्रेज़ शासन पद्धति को भारत के लिए लाभकारी मान रहे थे, वह एक मानसिक गुलामी है। इतिहास पर बिना दृष्टि डाले भारत को लद्दद, निकम्मे और भविष्यहीन बताने वाले राजेन्द्र यादव को क्या यह भी पता नहीं था कि जिस देश में वे रह रहे हैं या थे उसी देश ने विश्व के सामने एक से बढ़कर एक नायाब खोजे दी हैं। गणित से लेकर विज्ञान तक यहाँ तक ब्रह्मांड के रहस्यों से पूरी दुनियाँ को अवगत कराया। माना अंग्रेजों ने सामंतवाद के चंगुल से भारत को निकाला लेकिन वहीं उसने जमींदारी प्रथा लागू किया जो अपने आप में यह एक नया सामंतवादथा। इतिहास गवाह है कि सामंतवादी प्रथा ने न केवल जातियों को मजबूत किया बल्कि निचली जातियों का जिस रूप में शोषण किया वह आज भी रोये खड़े कर देना वाले हैं।
            
मुगल काल के पहले से ही भारत वस्त्र उद्योग और मसाले की उत्पादकता में अग्रणी था। दुनिया के कई देशों में भारत के बने कपड़े और मसाले भेजे जाते थे। भारतीय औपनिवेशिक काल में भी इग्लैंड में भारतीय वस्त्रों की मांग ज्यादा थी। कारण स्पष्ट था कि यहाँ के बने कपड़े वहाँ कि अपेक्षा काफी अच्छे होते थे। इसलिए बाद के वर्षों में भारतीय कपड़ों के आयात पर इग्लैंड में अत्यधिक मात्रा में कर लगा दिया गया जिससे वे काफी महगें हो गए। क्या यह भारत पिछड़ेपन की निशानी थी?  
            संपादकीय में राजेन्द्र यादव अंग्रेजी शासन पद्धति की हिमायत करते हुए कहते हैं- अंग्रेजों ने भारत पर जो कुछ भी अत्याचार किए वह सब कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए।ये तर्क राजेन्द्र यादव जी के लिए सही होंगे, लेकिन कम से कम मैं और मेरे जैसे तमाम लोग इन चीजों को सिरे से खारिज कर देंगे। राजेन्द्र यादव जिस शासन पद्धति को बनाए रखने की बात इस संपादकीय में कर रहे थे, वह तो उसी प्रकार हुआ जिस प्रकार से अमेरिका-ब्रिटेन इराक, अफगानिस्तान में अपनी सेनाओं को भेज कर कर रहा है, क्योंकि इसके पीछे इन देशों का तर्क भी कमोवेश राजेन्द्र यादव ही जैसा है। (ये देश इन राष्ट्रों में अपनी सेनाओं को भेज कर वह शांति व्यवस्था कायम करने की बात करते हैं लेकिन आज कौन नहीं जानता है कि अमेरिका और ब्रिटेन की गिद्ध आँखें वहाँ की अकूत खनिज सम्पदा पर है।)
            इसी संपादकीय के अंत में वे भारत को आधुनिक बनाने में अंग्रेजों की प्रशंसा करते हैं। (हम शायद दुनिया के सब से कृतघ्न देश होंगे जो कहें कि अंग्रेजों ने हमें आधुनिक नहीं बनाया।) राजेन्द्र यादव तो रहे नहीं लेकिन कुछ लोग जो आने वाले समय में उनका वारिस मान कर बैठे हैं क्या बताने का यह जहमत उठाएंगे कि अंग्रेजों ने हमें किस तरह से आधुनिक बनाया? औपनिवेशिक गुलामी, सत्ता का गंदा खेल (फूट डालो राज करो), अंग्रेजों की शासन पद्धति का एक हिस्सा था, क्या यही आधुनिकता थी? राजेन्द्र यादव शायद यह भूल गए कि असली आधुनिकता लोकतंत्र में हैं। क्या अंग्रेजों द्वारा किया गया शासन लोकतंत्र का ही एक हिस्सा है? 1857 से लेकर 1947 ई. तक की लड़ाई किस लोकतंत्र के लिए लड़ा गया? लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए हजारों, लाखों की संख्या में लोगों को सरे आम शूली पर लटका दिया गया या फिर गोलियों का शिकार होना पड़ा, राजेन्द्र यादव क्या इसी लोकतंत्र की बात कर रहे थे? अगर जीवित रहे होते या उनके पद चिन्हों पर चलने वाले लोग यदि यह तर्क देते हैं कि अंग्रेजों ने हमें रेल, डाक (लाए), शिक्षा जैसी चीजों का विकास किया तो उनके अंदर इतिहास-बोध की कमी या इतिहास को गलत तरीके से व्याख्या करने की लत लग गई है। अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर रेल पटरियों का जाल बिछाया इससे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके पीछे भी व्यावसायिक कारण थे। दरअसल अंग्रेजों ने मालगाड़ी का विकास किया था न की सवारी गाड़ी का, जिससे भारत का कच्चा माल बड़े पैमाने पर इग्लैंड ले जा सकें। इसी प्रकार से डाक, तार की सुविधा भी अंग्रेजों के लिए भी लाभकारी था न कि आम लोगों के लिए। रही बात शिक्षा कि तो सन 1947 के बाद भारत की कुल आबादी की मात्र 10 प्रतिशत ही जनता शिक्षित हो पाई थी, बाकी 90 प्रतिशत अशिक्षित थी, यहीं चीजे राजेन्द्र यादव की निगाह में आधुनिक था और इन्हीं कारणों से वे अंग्रेज़ प्रशंसक भी थे। राजेन्द्र यादव जैसे लोगों का तर्क ये भी है कि अंग्रेजों ने हमारे यहाँ से सती प्रथा जैसे अमानवीय कृत्यों के खिलाफ कानून बनाया, लेकिन वे शायद यह भूल रहे हैं कि अंग्रेजों ने यहाँ की कई जातियों को चोर, असभ्य एवं जंगली माना जो आज भी समाज के मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाए। क्या इन चीजों का खुलासा राजेन्द्र यादव हंसकी संपादकीय में किया (कम से कम मुझे तो नहीं मालूम), संभवत: नहीं। यह उनका ब्रिटिश शासन के प्रति अंध श्रद्धा है या फिर कुछ और?
            पूरे संपादकीय को पढ़ने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि राजेन्द्र यादव को औपनिवेशिक सत्ता से कोई खतरा नहीं था। वे उपनिवेशवाद को भारत के लिए एक बेहतर शासन प्रणाली मानकर विश्लेषण करते हैं जो इतिहास को नजर अंदाज करने के बराबर है। इस संपादकीय में राजेन्द्र यादव द्वारा भारत और उसके लोगों के प्रति जो तर्क (हालांकि ये कुतर्क के अलावा कुछ नहीं है) दिए गए हैं, क्या चर्चा के केंद्र में रहने के लिए दिए गए हैं या ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादारी का एक हिस्सा है।
            इधर के कुछ वर्षों में उन्होंने स्त्री विमर्श को देह विमर्शके दायरे में लाकर सीमित करने की जो कोशिश की है, क्या वास्तविक रूप में यह स्त्री विमर्श का एक हिस्सा है? मैं इस बात का समर्थन नहीं करता कि स्त्रियों के देह पर पुरुषों का वर्चस्व या अधिकार हो और न ही इस बात को स्वीकार करने के पीछे कोई तर्क है कि स्त्रियाँ पुरुषों के समान स्वछंद और पुरुषवाचित गुणों को अपनाकर पुरुषों जैसा व्यवहार करने लगें। स्त्री समस्या केवल देह मुक्तिनहीं है। उसके अन्य कारण भी है जहां उसे सर्व प्रथम मुक्त होने की जरूरत है। अभी कुछ महीने पहले यही राजेन्द्र यादव स्त्री विमर्श से आगे बढ़ते हुए समाज में गोपन समझी जाने वाली स्त्री योनि’ (इस शब्द की जगह उन्होंने एक दूसरे शब्द का प्रयोग किया था जिसे वे बुराशब्द से उत्पत्ति मानते थे) की जिस तरह से व्याख्या की थी वह कम से कम राजेन्द्र यादव के मुख से शोभा नहीं देता, जो हमेशा स्त्री के उत्थान (एक मानसिक छलावा था) की बाते किया करते थे। राजेन्द्र यादव स्त्री मुक्ति को मध्यवर्ग की स्त्री मुक्ति तक ही सीमित कर सकें। उन्होंने भारत की पैसठ प्रतिशत उन महिलाओं को छोड़ दिया जो आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई हैं। वहाँ यौनिकता की मुक्ति की चाहत उतनी नहीं है जितनी कि अन्य चीजों के लिए। बहरहाल स्त्री को समाज के मुख्य धारा से जोड़ने की जरूरत है। स्त्री विमर्श स्त्री को समाज के केंद्र में लाने के लिए है न कि स्त्री यौनिकता की मुक्ति के लिए। स्त्री यौनिकता की मुक्ति स्त्री विमर्श का एक माध्यम हो सकता है लेकिन स्त्री समस्याओं की जड़ नहीं। वह जब तक आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत नहीं होगी तब तक विमर्श आधारित यह मुद्दा अपने सही मुकाम पर नहीं पहुँच सकता। इस बात को राजेन्द्र राजेन्द्र यादव जी को समझने की जरूरत थी।
            राजेन्द्र यादव जिस लेंस के चश्में से भारत और उसकी सभ्यता, संस्कृति और उसकी आधुनिकता तथा स्त्री स्वतन्त्रता की बात कर रहे थे वह भारतीय इतिहास को सही अर्थों में न समझने का परिचायक था या कुतर्क करके अपने आप को चर्चा के केंद्र में रहने की मानसिक छटपटाहट।  (यह लेख रवीन्द्र त्रिपाठी के एक आलेख को आधार बनाकर लिखा गया है। इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ।)

       अरविन्द कुमार उपाध्याय
       arvindkumar.hindi@gmail.com
        +91-8796729610                                                                                                                                                                                                     
                                                                                                          
                                                                                                                                                                                                                                                                   
      

Saturday, 17 August 2013

नकली आजादी का जश्न ----- अरविन्द कुमार उपाध्याय

नकली आजादी का जश्न 


आजादी की जश्न में पूरा संपन्न समाज शराब और अफीम की जश्न में डूबा हुआ है। पता नहीं कितने लाखों-करोड़ों की सीसी के सील तोड़े गए। लाखों रूपए घूमने और सैर-सपाटा के लिए खर्च किए गए। बाजार में नई वस्तुओं की आमद बढ़ गई। सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराया गया। राष्ट्रगान और महापुरुषों की शौर्य गाथा का पुनर्पाठ किया गया। फिर अंत में यही सवाल रह गया कि यह आजादी किसके लिए? क्या आजादी के मायने यही है? जहाँ स्वार्थ लिप्सा, छद्म राजनीति, भूख, गरीबी, हत्या, बलात्कार, वेश्यावृत्ति, साप्रदायिकता आदि पापाचार हो वहाँ आजादी का क्या मतलब? आज भी हमारे समाज में एक ऐसा तबका है जिसे ये तो पता है कि देश 1947 में स्वतंत्र हुआ लेकिन किसके लिए? और किस लिए? शायद उनके पास इसका कोई वाजिब उत्तर नहीं है। हम ऐसे दो राहें मोड़ पर खड़े हैं जहाँ एक तरफ स्वार्थ की राजनीति है तो दूसरी तरफ बाजार का वितंडतावाद। एक ने समाज को लूट-खसोट, हत्या, बलात्कार जैसे चीजों को दिया और दूसरे ने मुखौटा। हमारी जो वास्तविकता है उसे हम स्वीकार नहीं कर रहे हैं बल्कि नकली आधुनिकता ओढ़े हुए हैं।................ । शेष फिर कभी