Thursday, 11 December 2014

स्त्री देह ही अब मुक्त बाजार है


स्त्री देह ही अब मुक्त बाजार है

स्त्री देह ही अब मुक्त बाजार है

कोई दूसरा होता तो मटिया देता और नजरअंदाज कर जाता या ज्यादा गंभीर होता, तो सीधे जवाब दे देता।
हमने तुरंत ही फोन लगाया। उसने उठाया नहीं।
समझ गये हम पट्ठा घोड़ा बेचकर सो गया।
हम तो भोर चार पांच बजे तक पीसी के साथ होते हैं।
अभी हम गहरी नींद में थे कि अभिषेक का फोन आ गया। मतलब तो समझबे करै है। बोला, कि नई दिल्ली में बलाताकार का मामला इंडिविजुअल केस है जबकि निवेश का फेनामेनन दूसरा होता है।
इस पर हमने कहा कि यह महज कानून व्यवस्था का मामला नहीं है।
उबेर ग्लोबल कंपनी है और उसका निवेश भी ग्लोबल है।
दुनिया भर में नई दिल्ली की प्रतिक्रिया हो रही है। उसको जो छूट दी गयी है, उसीका नतीजा यह बलात्कार है।
अगर उबेर अमेरिकी कंपनी नहीं होती तो यादवज्यू का यह करिश्मा देखने को नहीं मिलता।
हम दरअसल कानून व्यवस्था की बात ही नहीं कर रहे हैं।
गौरतलब है कि अमेरिका के पापकर्म के खुलासा वाले तमाम दस्तावेजों को उत्तर आधुनिक विमर्श वाले कांस्पिरेसी थ्योरी कहकर मटिया देते हैं।
इलुमिनेटी परिवार का शताब्दियों का इतिहास भी, हथियारों का कारोबार भी, मस्तिष्क नियंत्रण विचार नियंत्रण तंत्र भी, तेल युद्ध भी और सारा अमेरिकी इजराइली पाप कर्म कांसपिरेसी थ्योरी कहा जाता है।
अभिषेक से कमसकम दस पंद्रह सालों का अपनापा ही नहीं है, बल्कि वह हमारा भविष्य भी है और हम उसे यह कह नहीं सकते कि यह मंतव्य करके वह अमेरिका से सावधान समेत हमारा अभ तक का रोज रोज का लिखा सब कुछ खारिज किये जा रहा है एक झटके से। क्योंकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसा आशय उसका नहीं है।
उसने कहा कि अर्थव्यवस्था की बात हम समझ रहे हैं लेकिन आपने जो लिखा है, उससे तो लगता है कि बलात्कार के लिए ही अमेरिका ने निवेश किया है।
खुदै अभिषेक लिख मारो हैः भलेमानुस अर्जुन को अपने रिश्‍तेदारों-संगियों-प्रियजनों पर तीर चलाने में संकोच हो रहा था। तब श्रीकृष्‍ण ने उसे युद्धभूमि में एक लंबा लेक्‍चर दिया। इस लेक्‍चर से वह अपने भाई-बंधुओं को मारने के लिए प्रेरित हुआ। कालांतर में इस लेक्‍चर को गीता का नाम दिया गया। गीता मूलत: ”युद्ध का दर्शन” है।
अभिषेक ने आगे लिखा हैः वे चाहते हैं कि इस देश के सारे भलेमानुस अर्जुन बन जाएं। अपने भाइयों को मारें-काटें। आपस में लड़ें। सिविल वॉर हो जाए। भारत में एक और महाभारत हो। चूंकि लोग मोटे तौर पर सभ्‍य हो चुके हैं और साम्‍प्रदायिक नफ़रतों का डोज़ उनके बहुत काम नहीं आ रहा, इसलिए गीता को राष्‍ट्रीय पुस्‍तक बनाना उनके लिए इकलौता विकल्‍प रह गया है।
यह सही है कि हम भौंकने वाले कम हैं।
हम विशेषज्ञ भी नहीं हैं। जो विशेषज्ञ हैं वे सत्ता पक्ष में हैं ही नहीं।
हमारी समझ में जो आता है, उसे साझा करने की कोशिश करते हैं और कारपोरेट मीडिया के विपरीत हम लोग वैकल्पिक मीडिया में हर सूचना को साझा करते हैं और तत्काल करते हैं। यह फास्ट फूड जैसा करतब ही समझिये। भाषा और शैली की अपनी सीमाये हैं और हम शायद पूरी बात सही तरीके से समझा नहीं पा रहे हैं।
लेकिन हमने अभिषेक को बता दिया कि अनमेरिका निवेश का आशय वही बलात्कार है।
अंततः मुक्त बाजार का निर्णायक शिकार वही स्त्री है, जिसकी देह और आत्मा पर लिखा होता है हर विजेता का इतिहास।
द्रोपदी की तरह तमाम यूनानी मिथक हेलेन से जुड़ते हैं। ट्राय के युद्ध में सारे देव देवियां पक्ष विपक्ष में थीं और उनके मिथक ही यूरोपीय साहित्य, संस्कृति के मुहावरे हैं।
ठीक वैसे ही जैसे हमरा महाकाव्यों रामायण और महाभारत के तमाम मिथक हमारी भाषाओं और लोक के मुहावरे हैं।
हेलेन को भी ट्राय के युद्ध का कारण बताया जाता है।
ट्राय का वह युद्ध भी हेलेन की देहमुक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध था। जो उसकी देह और आत्मा पर लड़ा गया, जैसा महाभारत द्रोपदी की देह और आत्मा पर।
इलियड में तो पीड़ित वह अकेली स्त्री हेलेन है।
महाभारत के गर्भनाल से जुड़े हैं भागवत गीता और भागवत पुराण। जहां राधा से लेकर द्रोपदी हर स्त्री अबाध यौन शोषण की शिकार है।
गंगा, सत्यवती, अंबा, अंबिका, अंबालिका, कुंती,  माद्री के सारे मिथक स्त्री देह के साथ पुरुषतांत्रिक व्याभिचार को वैधता देते हैं। यौनता के अबाध कार्निवाल की घटना और परिणाम का उत्तरदायी स्त्री मन और शरीर, यही हमारा सनातन धर्म है, धर्मांतर में या से कुछ फर्क नहीं पड़ता है।
रंग बिरंगे पुरोहितों मुखियों का फतवा ही स्त्री नियति है। यह नियति मुक्त बाजार में बदली नहीं है, और भयंकर हो गयी है।
मुक्त बाजार के राजकाज में गीता को राष्ट्रीय धर्म ग्रंथ बनाया जाना उसी बलात्कार संस्कृति का धारक वाहक है, जो मुक्त बाजार की सांढ़ संस्कृति भी है।
ट्राय विध्वंस का वह काठ का घोड़ा अब हिंदुत्व का राजकाज है और उसके पेट से विदेशी सेनाएं हमें खत्म करने को निकल रही हैं।
रात दिन सातों दिन चौबीसों घंटे जो कामकला का प्रदर्शन है खुल्ल खुल्लम, फ्रीसेक्स का जो खुल्ला आमंत्रण है और जो फ्री सेक्स बाजार है, जो कंडोम के निर्लज्ज विज्ञापन पल छिन पल छिन हैं, जो वियाग्रा जापानी तेल और सेक्सी सुगंध के अलावा सौंदर्य बाजार है।
वहां बलात्कारियों को फांसी देकर बलात्कार रोकने का रियाज बेमतलब है।
क्योंकि अभिषेक के कहे मुताबिक कानून व्यवस्था का यह कोई इकलौता मामला नहीं है, सीधे तौर पर निवेश का मामला है, जिस निवेश के हितों की हिफाजत के लिए जघन्य से जघन्य अपराधी को शह दी जाती है कानून व्यवस्था और लोकतंत्र की धज्जियां उधेड़कर और कारपोरेट पूंजी के दम पर युद्ध अपराधियों को सत्ता की बागडोर सौंप दी जाती हैं, जो स्त्री अस्मिता को कुचलकर ही राजसूय का आयोजन करते हैं।
हजारों साल से सेक्स से वंचित देश में हीनताग्रंथियों से लैस समाज में, नस्ली और जाति भेदभाव, धार्मिक अनुशासन की वजह से पश्चिम के विपरीत सेक्स के लिए समानता के अधिकार से वंचित बहुसंख्य जनसंख्या के मध्य पुरुषतांत्रिक समाज में जहां स्त्री दरअसल वही द्रोपदी है, घटना की जिम्मेदार भी वह और परिणाम भी उसे भुगतने हैं, जो शूद्र भी है और पुरुषतंत्र में जो सिर्फ भोग्या, नरकद्वार है, शास्त्रों के मुताबिक उसकी सर्वत्र पूजा पूजा पंडालों में ही संभव है।
पूजा पंडालों से बाहर फिर वह या तो सती है या फिर वेश्या।
स्त्री देह ही अब मुक्त बाजार है।
ऐसे में बलात्कार जैसी घटनाओं के आशय सीधे अर्थव्यवस्था से जुड़ते हैं, सारे के सारे बलात्कारियों को भले ही आप फांसी दे दोबलात्कार रुकेंगे नहीं कि क्योंकि मुक्तबाजारी समाज में अपने घर में भी स्त्री सुरक्षित नहीं है।
हमारे मित्रों, परिजनों और खासतौर पर सविता को हमारी सेहत के लिए फिक्र लगी रहती है और उनकी हिदायते मानना मेरे लिए नामुमकिन है।
हम तो जानते हैं कि अपने रचे हुए नरक को भोगे बिना नरक की मेहरबानी भी नहीं मिलती और कयामत सी जिंदगी का बोझ ढोना ही होता है। रोज जी जीकर मरकर जीना होता है।
हम जो मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था के तिलिस्म को तोड़ नहीं सकें तो इसका पूरा मजा लिए बिना मरना भी मुश्किल है।
इस भारत देश का राजकाज राजकाज नहीं कारोबार है अमेरिकी।
नई दिल्ली में उबेर वेब टैक्सी के गोरखधंधे के खुलासे के बाद साफ हो गया है कि अमेरिकी हितों के लिए सरकार अमेरिकी कंपनियों की कोई निगरानी करना तो दूर, उन पर किसी तरह का अंकुश भी नहीं रखती।
भारतीय कंपनियों को जो नाना प्रकार के कर उपकार भरने पड़ते हैं, अमेरिकी और दूसरी विदेशी कंपनियों को वह झमेला झेलना ही नहीं है।
अबाध पूंजी प्रवाह का बीज मंत्र यह है।
सेज और औद्योगिक गलियारों में टैक्स होलीडे का प्रावधान है।
उबेर प्रकरण से साफ है कि सेज गलियारा के अलावा राजधानी नई दिल्ली में भी अमेरिकी पूंजी के लिए टैक्स होली डे है।
हमारे हितैषी हमारे लिखे से भी परेशान हो जाते हैं। लेकिन हम जैसे दो चार भौकने वाले कुत्तों की परवाह इस मुक्तबाजार को नहीं है क्योंकि उन्हें मालूम है कि हमारी कोई सुनवाई नही है।
वे यकीनन हमें फोकस पर लाने की गलती नहीं कर सकते। इसलिए लिखने वालों से निवेदन है कि बिंदास लिखिये, जो हाल है, उससे बुरा कुछ भी हो नहीं सकता। फिलहाल इस देश में हमारी कोई भूमिका नहीं है।
इसी बीच संसद में हो हल्ला का दौर फिर शबाब पर है और आगरा में मुस्लिम समाज के 57 परिवारों के धर्म परिवर्तन के मामले ने राजनीतिक रंग अख्तियार कर लिया है। राज्यसभा में बीएसपी की नेता मायावती ने लालच के आधार पर लोगों को फुसलाने के आरोप लगाए। राज्यसभा में विपक्षी सांसदों ने इस मामले में प्रधानमंत्री के बयान की मांग करते हुए कहा कि सरकार इस मामले में दखल दे। वहीं सरकार ने कहा कि यह राज्य सरकार का मामला है।
O –  पलाश विश्वास
साभार:http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2014/12/10/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B9-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%AC-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%9C?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

‘घर वापसी’ नहीं दंगों की वापसी का प्रयास है यह

‘घर वापसी’ नहीं दंगों की वापसी का प्रयास है यह

‘घर वापसी’ नहीं दंगों की वापसी का प्रयास है यह

योगी के बाद साध्वी और संत आए आग लगाने

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव से पहले एक प्रयोग किया जो सफल रहा। अब उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव से पहले इसी प्रयोग को दोहराने का प्रयास शुरू हो चुका है। राजनीति में ऐसे प्रयोग पहले भी हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे। पर बीते लोकसभा चुनाव जैसी सफलता पहली बार मिली इसलिए इसे दोहराया जा रहा है। बहुत ही भौंडे ढंग से। एक साध्वी है, जो बोली तो आग लग गई फिर माफ़ी मांगी। एक संत पुरुष है साक्षी महाराज उनकी संतई के किस्से एक नहीं अनेक हैं। अब वे भी नए विचारों के साथ सामने आ गए हैं। इनसे पहले पूर्वांचल में हिंदुत्व की नर्सरी चलने वाले योगी आदित्यनाथ ‘लव जेहाद’ के साथ उप चुनाव में मैदान में उतरे थे, पर प्रयोग नाकाम हुआ तो वापस चले गए और भाजपा फिर विकास के एजेंडा पर लौट आई। पर रह-रहकर विकास के साथ हिंदुत्व जाग जाता है। वजह आने वाले कुछ राज्यों के चुनाव हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश और बिहार मुख्य है।
सभी जानते हैं कि खाली विकास से चुनाव नहीं जीता जा सकता उसके लिए धर्म और जाति का समीकरण जरूरी है। नरेंद्र मोदी इस खेल में कामयाब रहे जिन्होंने विकास और हिंदुत्व का गजब का समीकरण सामने रखा और विरोधी चित हो गए। मोदी ने उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह पर जब तंज कसते हुए कहा था ‘नेताजी गुजरात बनाने के लिए छप्पन इंच का सीना चाहिए, तब पूर्वांचल का एक तबका बमबम हो गया था। सभा में ही एक ने कहा था, ये है अपना मोदी जिसने मुल्ला मुलायम को चित कर दिया। इससे साफ़ था कि मोदी विकास के साथ हिंदुत्व का भी एक मजबूत चेहरा थे।
कैसा विकास, किनका विकास और कौन सा विकास, यह अलग बहस का मुद्दा है। विकास के दो माडल सामने रखे मोदी ने। एक गुजरात का जिसके बारे में लोग सुनते रहे हैं मीडिया आदि के जरिए, दूसरे उत्तर प्रदेश का एक खाका उन्होंने खींचा। पूर्वांचल में सड़क बिजली पानी का मुद्दा कांग्रेस, भाजपा बसपा और सपा सभी के राज्य में एक ही जैसा रहा है पर ठीकरा अखिलेश यादव सरकार पर फूटा। क्योंकि वे रोज जाती हुई बिजली ज्यादा देखते रहे आती हुई कम। बाकी राजकाज में कोई ज्यादा फर्क रहा नहीं इसलिए मोदी को लोगों ने हाथों-हाथ लिया। पर अब छह महीने बाद हालात बदल रहे हैं। उप चुनाव से यह तो साफ़ हो गया कि पिछड़े भी लौट गए और मुसलमान भी। बाकी महंगाई और लोक लुभावन वायदों को लेकर मोहभंग शुरू हो चुका है यह कोई अप्रत्याशित भी नहीं है। ऐसे में संघ परिवार की चिंता स्वभाविक है जो दीर्धकालीन रणनीति पर चलती रही है। उत्तर प्रदेश संघ के एजंडा पर सबसे ऊपर है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के ठीक बाद इस पर काम शुरू हो गया था। वजह थे अखिलेश यादव। वे जिस अंदाज में आए थे उससे आम राजनीतिज्ञों का मानना था कि वे सत्ता की लम्बी पारी खेलेंगे। हालांकि इस पारी को छोटा करने का काम समाजवादियों ने ही शुरू किया पर संघ ने इसे और छोटा करने के लिए धार्मिक गोलबंदी का सहारा लिया। प्रयोग शुरू हुआ पश्चिम से। समाजवादी जब सत्ता में आते है तब दूर की सोचना बंद कर देते हैं, ऐसा कई बार महसूस हुआ और मुजफ्फरनगर के दंगों को लेकर यही नजर भी आया। इससे पहले मजहबी गोलबंदी की दर्जनों घटनाओं से सरकार ने कोई सबक नहीं लिया था। अखिलेश सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया और सैफई महोत्सव के साथ ही सरकार विपक्ष और मीडिया के निशाने पर आ गई। यह सामान्य दंगा था भी नहीं, इसने पश्चिम में जाट और मुसलमानों को ही नहीं बांटा, बल्कि दलित और मुस्लिम को भी बांट दिया। इसका असर सिर्फ पश्चिम में ही नहीं पड़ा बल्कि पूरे देश पर पड़ा। संघ के तंत्र ने इसे सत्तारूढ़ दल के तुष्टिकरण के रूप में पेश किया और केंद्र के साथ उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ वोट को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आवाहन किया। अमित शाह ने तो खुलकर यह एलान किया था। मोदी एक तरफ विकास के जरिए अत्याधुनिक भारत के निर्माण का नारा दे रहे थे तो साथ ही दंगाइयों का बड़ा गिरोह मजहबी गोलबंदी में जुटा था। ठीक यही रणनीति अब फिर अपनाई जा रही है। मंदिर पर लाउड स्पीकर का मुद्दा सामने आ ही चुका है।
उत्तर प्रदेश के बहुत से जिलों में में धार्मिक यात्रा जारी है। मोदी को ऐसा प्रधानमंत्री बताया जा रहा है जो ‘उन लोगों’ को ठीक कर देगा और किसी के मुंह से आवाज भी नहीं निकलेगी। लव जिहाद भी इसी रणनीति का एक हथियार था, जो भोंथरा साबित हुआ तो अब ‘घर वापसी’ का हथियार सामने है। आगरा को छोड़िए, बड़े दिन पर यानी 25 दिसंबर को अलीगढ़ में जो इंतजाम हो रहा है वह समूचे विश्व में अपनी धर्म निरपेक्षता की थू-थू करा देगा। और संघ परिवार इसका ठीकरा भी अखिलेश सरकार पर फोड़ेगा, जैसा उसने आगरा में किया। आगरा पुलिस जाँच में जुटी है और सरकार की साख गिर रही है। समाजवादी नेता यह समझ ही नहीं पा रहे हैं, ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर कितनी त्वरित कार्यवाही की जरूरत होती है। ठीक मुजफ्फरनगर की तरह अगर इस मामले में कोताही हुई तो फिर यह सरकार सांसत में फंसेगी और यही संघ का राजनैतिक एजेंडा भी है।
O- अंबरीश कुमार
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2014/12/11/%E0%A4%98%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%A6%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AA

द्रोपदी की देह और आत्मा दोनों सत्ता शतरंज की चालों में जीती मरती हैं और मर-मरकर जीती हैं

द्रोपदी की देह और आत्मा दोनों सत्ता शतरंज की चालों में जीती मरती हैं और मर-मरकर जीती हैं

द्रोपदी की देह और आत्मा दोनों सत्ता शतरंज की चालों में जीती मरती हैं और मर-मरकर जीती हैं

ओस्लो में आज भारत के लिए गौरव का दिन है। भारत के लिए सम्मान का दिन है क्योंकि एक भारतीय को मिल रहा है नोबेल पुरस्कार। मुझे नहीं मालूम कि वे हमें जानते होंगे या नहीं। हमारी लिस्ट में तो वे दशक भर से हैं।
आज के रोजनामचे की शुरुआत उनको बधाई के साथ।
दुनिया भर में बाल मजदूरी और बाल शोषण के खिलाफ अद्भुत काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी को आज नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में आज एक भव्य कार्यक्रम में दुनिया की मशहूर हस्तियों के बीच कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।
इस सम्मान को पाकर पूरा भारत देश गर्व से फूला नहीं समा रहा है।
अब हमारे तकनीकी समृद्ध लोगों की प्राथमिकता पर गौर करें और समझें कि देश क्यों मुक्त बाजार में गा गा ग्लाड है। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी मुकेश अंबानी इस साल देश के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति रहे। ऑनलाइन सर्च कंपनी याहू इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में यह बात कही है।
ऑनलाइन सर्च की संख्या और पैटर्न के आधार पर साल 2014 के लिए जारी वार्षिक समीक्षा रिपोर्ट में याहू इंडिया ने देश के 50 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में अंबानी दूसरी बार शीर्ष स्थान बनाने में कामयाब रहे हैं। इस सूची में उनके बाद टाटा समूह के नए चेयरमैन साइरस मिस्त्री हैं जबकि अडानी समूह के मुखिया गौतम अदानी तीसरे स्थान पर हैं। खास बात यह है कि सूची में पहले पांच स्थानों पर सिर्फ उद्योगपति ही हैं। जिनमें ए.एम. कुमार मंगलमचौथे और रतन टाटा पांचवें पायदान पर हैं।
कैलाश के अलावा शांति का नोबेल पुरस्कार पाकिस्तानी समाजसेवी और पूरे विश्व में महिला शिक्षा के लिए आवाज बनने वाली मलाला युजुफई को भी मिलेगा। मलाला युजुफई पाकिस्तान से हैं और तालिबान के खिलाफ खड़े होकर खुद लड़कियों की शिक्षा के लिए एक आवाज बन गईं।
इसी के साथ इस पर भी गौर करें कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और मेक्सिको की सरकारी पेट्रोलियम कंपनी पेमेक्स के बीच तेल उत्खनन को लेकर समझौता हुआ है। समझौते के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज मेक्सिको में तेल और गैस उत्खनन के लिए पेमेक्स को सहयोग देगी और दोनों कंपनियां आपस में मिलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में साझा अवसर तलाशेंगी। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और पेमेक्स अपनी एक्सपर्टीज़ और स्किल का इस्तेमाल गहरे पानी में तेल और गैस की खोज जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल करेंगी।
भारत के पूर्वी तट पर रिलायंस की शानदार कामयाबी और अमेरिकी शेल गैस में रिलायंस इंडस्ट्रीज के अनुभव को भी समझौते के मुताबिक पेमेक्स के साथ इस्तेमाल किया जाएगा। रिलायंस इंडस्ट्रीज पेमेक्स को टेक्नीकल मदद भी देगी। पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी के मोर्चे पर भी दोनों कंपनियां आपस अपने अनुभव साझा करेंगी। रिजर्व बैंक के ब्याज दरों को यथावत बनाए रखने के बाद निजी क्षेत्र के दो बड़े बैंकों आईसीआईसीआई और एचडीएफसी बैंक ने जमा दरों में 0.50 प्रतिशत तक की कटौती करने की घोषणा की है।
इसी के मध्य राज्य सभा सेलेक्ट कमिटी ने इंश्योरेंस पर रिपोर्ट सौंप दी है। चंदन मित्रा के नेतृत्व में बनी सेलेक्ट कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में री-इंश्योरेंस की परिभाषा में बदलाव का सुझाव दिया है। सेलेक्ट कमिटी ने 49 फीसदी की सीमा सभी तरह के एफडीआई और एफपीआई पर लागू करने की सिफारिश की है। सेलेक्ट कमिटी ने नई इक्विटी के जरिए कैपिटल बेस बढ़ाने की सिफारिश की है। हेल्थ इंश्योरेंस के लिए 100 करोड़ रुपये की पूंजी अनिवार्य करने की सिफारिश की है। आईआरडीए और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को हेल्थ इंश्योरेंस नियम बनाने की सिफारिश की है।
अश्वत्थामा के जख्मों की तरह अमर है द्रोपदी की देह और आत्मा भी, हालांकि यह किसी महाकाव्य या पवित्र ग्रंथ में नहीं लिखा है। द्रोपदी की देह और आत्मा दोनों सत्ता शतरंज की चालों में जीती मरती हैं और मर मरकर जीती है।
याद करें कि गीता के उपदेश कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरु होने पहले स्वजनों का वध करने से इंकार करने वाले अर्जुन को दिये गये, जिसने उस द्रोपदी को स्वयंवर में जीता जो कुरुवंश के ध्वंस के लिए राजा द्रुपद ने जो यज्ञ किया, उसकी अग्नि से निकली। कुरुवंश के राजकुमारों में सुलह हो भी गयी थी और इंद्रप्रस्थ देखने चले भी आये थे दुर्योधन, लेकिन मायामहल में जल को स्थल समझने के विभ्रम के शिकार दुर्योधन की जो हंसकर खिल्ली उड़ायी द्रोपदी ने, वहीं से शुरु हो गया था महाभारत। कुरुक्षेत्र युद्ध के अंत पर विधवा विलाप से गूंजते महाभारत में सबसे मार्मिक क्रंदन फिर वहीं अट्टहास करने वाली रमणी द्रोपदी का ही, जिसके पांचों पुत्र कुरुक्षेत्र हारने के अपराध में मार दिये गये।
कुरुक्षेत्र की वजह द्रोपदी तो कुरुक्षेत्र की अंतिम परिणति भी उसके ही खिलाफ जो एकमुशत पांच भाइयों की पत्नी है और वह भी उसके पूर्व जन्म की तपस्या का फल।
गीता उपदेश का सार भी वहीं कर्मफल सिद्धांत जो जाति व्यवस्था के नाम पर शाश्वत रंग भेद और आर्य आक्रामक वर्चस्व को वैधता देने का सबसे बड़ा उपकरण है।
लालकिले पर गीता महोत्सव इसलिए नये सिरे से कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र में देश के तब्दील हो जाने का परिदृश्य है, इसे जो देख नहीं पा रहे हैं, उन पर कर्मफल का वही सिद्धांत लागू होना है। जैसी करनी वैसी भरनी।
अयोध्या काशी मथुरा के बाद अब तमाम इतिहास और भूगोल के केसरियाकरण की बारी है और ताज महल पर दावा हो चुका है, लालकिले की बारी है।
इसी के साथ शुद्धिकरण अभियान के तहत घर वापसी का खेल शुरु हो चुका है। घर लौटने वालों की जाति क्या होगी और उनकी नई जाति के प्रतिमान क्या है, हालांकि संघ परिवार ने इसका खुलासा नहीं किया है।
विडंबना यह है कि मुक्त बाजार का स्थाई भाव लेकिन अभूतपूर्व हिंसा है। परिवार, समाज भाषा संस्कृति लोक जनपद आजीविका प्रकृति पर्यावरण समेत इतिहास भूगोल के विरुद्ध एकाधिकारवादी कारपोरेट आक्रमण से कानून का राज खतम है और सांढ़ संस्कृति में अपराधी निरंकुश हैं।
ऐसे परिवेश में तात्कालिक तौर पर मुक्तबाजार को त्वरा जरुर मिलती है लेकिन गीता महोत्सव से जो निरंकुश अराजकता फैलने वाली है वह आखिरकार मुक्त बाजार और अमेरिकी हितों के ही विरुद्ध है।
खलबली इतनी है कि मुक्त बाजार के सिपाहसालार तमाम कारपोरेट दिलो दिमाग जो अब तक केसरिया कार्निवाल के मुख्य आयोजक हैं, वे सर धुनने लगे हैं।
आज के इकानामिक टाइम्स की इस खबर को जरुर पढ़े और उस पर गौर भी करेंः
At closed-door CII meet, top industrialists voice concern over apparent lack of enough efforts to kick start growth
नवभारत टाइम्स में अनुवाद भी छपा है-
मोदी सरकार बड़ी उम्मीदों के बीच 6 महीने पहले सरकार में आई थी। इंडस्ट्री को लग रहा था कि पिछले कुछ साल से इकनॉमी पर जो काले बादल छाए थे, वे जल्द ही छंट जाएंगे और देश फिर से तेजी से तरक्की की राह पर आगे बढ़ेगा। हालांकि, अब यह आस टूट रही है।
कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज की पिछले शनिवार को बंद कमरे में एक मीटिंग हुई थी। इसमें इंडिया इंक के कुछ जाने-माने दिग्गजों ने यह सवाल पूछा कि क्या सरकार ग्रोथ तेज करने, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और नए इनवेस्टमेंट को प्रमोट करने के लिए वो कदम उठा रही है, जिनकी जरूरत है। इस मीटिंग की मीडिया को भनक नहीं लगने दी गई थी। मीटिंग में कई तल्ख कमेंट्स आए- ‘इस सरकार ने मायूसी के बाद उम्मीदों का दीया जलाया था, लेकिन अब मुझे लग रहा है कि यह आस टूट रही है।’ ‘मुझे लग रहा था कि शायद यह सरकार बोल्ड फैसले ले सकती है।’ ‘सरकार रियायतों पर जोर दे रही है, क्या उससे ग्रोथ को नुकसान नहीं पहुंचेगा?’ ‘भारत अभी भी ग्रोथ और टैक्स रिफॉर्म के मामले में पीछे है।’
गौरतलब है कि यह खबर सिर्फ आर्थिक सुधारों और सहूलियतों के बाबत नहीं है जैसे कि अक्षरशः पढ़ने से लगता है।जो धर्मोन्माद और धर्मांतरण का खुल्ला खेल फर्रूखाबादी शुरु हुआ है, उससे मुक्तबाजार को बाट ही लगने वाली है।
अल कायदा और तालिबान के जरिये मध्यएशिया के तेल कब्जाने का दांव उलटा पड़ गया है तो हिंदू तालिबान और हिंदू अलकायदा से अमेरिका और इजराइल पर भी घात लगना तय है।
तेल के कारोबार से विश्व व्यवस्था के सरगना बने अमेरिका की हुक्म उदूली करने लगा है औपेक और तेल गिरते गिरते पैसठ डालर पर पहुंच गया। डालर की तो अब ऐसी की तैसी होने वाली है।
जाहिर है कि डालर के जरिये अमेरिकी कंपनियों को अपना कारोबार सौंपने वाले भारतीय उद्योग जगत का हाल भी वही होना है जो भारतीय कृषि, उत्पादन प्रणाली और खुदरा बाजार का हुआ है।
हम आम भारतीयों की तरह बुरबक नहीं हैं पैसा बनाने वाले।
पैसे डूबने के खतरे हों तो उनके त्रिनेत्र खुल जाते हैं।
वह त्रिनेत्र खुलने ही वाला है।
उद्योग जगत के लिए यह खतरे की घंटी है कि धर्मोन्माद का यह दावानल कहीं जनादेश प्रयोजन और आर्तिक सुधारों और टैक्स होलीडे, कमीशन वगैरह के अलावा उनका आशियाना ही न जला दें।
सारे कानून बदले जा रहे हैं। फिर कारपोरेट बेचैनी का सबब क्या है, समझने वाली बात है।
भूमि अधिग्रह्ण के नये संशोधन के तहत नेशनल हाईवे पर जमीन कोने वालों को धेला तक नहीं मिलने वाला है। कोलकाता में उद्योगपति आदि गोदरेज कल ही बोले कि जमीन की हदबंदी सिरे से हटा देनी चाहिए।
जाहिर है, वह प्रक्रिया शुरु हो गयी है। भूमि सुधार के घोषित लक्ष्य के बदले जमीन की यह कारपोरेट चकबंदी का जमाना है।
जैसे ब्रिटेन में बाड़ेबंदी हुई, वैसा ही कुछ नजारा है।
कल कारपोरेट जमावड़े के साथ सुंदरवन में बाघ देखने गयी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और लौटते हुए उनकी बाट जोह रही सुंदरवन की विधवाओं की ओर देखा तक नहीं।
भारत भर की स्त्रियों की उसी विधवा दशा और वृंदावन परिणति ही गीता के मनुसमृति अनुशासन का आशय है।
हमारे गुरुजी तारा चंद्र त्रिपाठी सत्तर के दशक में कहते थे कि यह देश सेक्स का भूखा है। इतनी वर्जनाएं है कि जब ये वर्जनाएं टूटेंगी तो कयामत ही समझो।
हम लोग तब टीनएजर थे और उनकी कड़ी निगाह रहती थी कि हम लोग सेक्स के तिलिस्म में फंस न जायें कहीं।
आज वह तिलिस्म ही यह भारत देश है और मुक्तबाजार की देहमुक्ति सुगंध में वर्जनाएं सारी एकमुश्त टूटने लगी है, रिश्तों की मर्यादाएं भंग हैं।
खबरों पर गौर भी कीजियेगा, हम उदाहरण नहीं गिना रहे हैं कि कहां क्या हो रहा है। सब कुछ खुलेआम हो रहा है और हिंदुत्व के कार्निवाल के तहत हो रहा है।
सारी वर्जनाएं टूट रही हैं और कयामत हमारे दरवज्जे खड़ी मुस्कुरा रही है और हम खुल्ला ताला तोड़कर रासलीला में निष्णात है और रासलीला भी उन्हीं की, जिनका वह पवित्र गीता उपदेश है।
O- पलाश विश्वास
साभार:http://www.hastakshep.com/interventionhastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2014/12/10/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B9-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%8Butm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

सांप्रदायिक दंगों से भी खतरनाक होने जा रहा है संघ परिवार का घर वापसी अभियान

सांप्रदायिक दंगों से भी खतरनाक होने जा रहा है संघ परिवार का घर वापसी अभियान
File photo

सांप्रदायिक दंगों से भी खतरनाक होने जा रहा है संघ परिवार का घर वापसी अभियान

संघ परिवार के प्रवक्ता बतौर देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गीता के राष्ट्रीय धर्म ग्रंथ बनाये जाने का ऐलान कर दिया है जैसे शिक्षा मंत्री ने संस्कृत को अनिवार्य पाट बना देने का अभियान छेड़ा हुआ है।
इसी बीच, हमारे पुरातन मित्र कैथालिक संगठन के जॉन दयाल ने पूछा है कि देश में पहले से ही एक राष्ट्रीय धर्मग्रंथ है, जो भारतीय संविधान है, तो दूसरे ग्रंथ की जरुरत क्यों है। उनका सवाल वाजिब है।
यह शायद साबित करने की कोई जरुरत नहीं है कि धर्मग्रंथों को पवित्र मानने वाली और पवित्रता के सिद्धांत के तहत नस्ली नरसंहार को अभ्यस्त सत्ता पक्ष के लिए भारतीय संविधान कोई पवित्र ग्रंथ नहीं है।
जान दयाल जी, संघ परिवार तो मनुस्मृति अनुशासन लागू करना चाहता है और इसीलिए गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की यह कवायद है।
हांलांकि आनंद तेलतुंबड़े का कहना है कि इस संविधान का आज तक सत्ता पक्ष के हित में ही इस्तेमाल हुआ है, उसकी बुनियादी फ्रेम में वर्तनी में भी बिना किसी बदलाव के।
बाकायदा संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध और संवैधानिक फ्रेम को तोड़ते हुए तमाम कायदे कानून बदले जा रहे हैं मनुस्मृति शासन के हिंदू साम्राज्यवाद के हित में।
मौलिक अधिकार और नागरिकता तक खतरे में है।
लोकतंत्र और राष्ट्र का वजूद ही नहीं है।
सब कुछ मुक्त बाजार है।
देश और देश की जनता नीलामी पर है। नीलामी पर है प्रकृति और मनुष्यता।
हमने इसीलिए देश भर में इस बार संविधान दिवस मनाने की अपील की थी, जो मनाया भी गया। लेकिन संवैधानिक प्रावधानों के लिए, जल जंगल जमीन आजीविका नागरिक मानवाधिकार प्रकृति और पर्यावरण के हक हकूक के लिए जब तक आम जनता सड़क पर नहीं उतरती, इस संविधान का दो कौड़ी मोल नहीं रहने वाला है।
अभी इस संविधान की मनचाही व्याख्याएं संभव है और मनचाहा इस्तेमाल संभव है। वरना जैसे केसरिया कारपोरेट सत्ता ने योजना आयोग को कूड़ेदान में फेंक दिया, भारतीय संविधान का भी वही हश्र हुआ रहता।
गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का दांव इस बाबा अंबेडकर के अनुयायियों को वध्य बनाने का आयोजन है। जिसके तहत भारत अब सही मायने में हिंदुस्तान है और यहां गैर हिंदुओं को रहने की इजाजत नहीं है।
गैरनस्ली हिंदुओं की भी शामत है, जो सारे बहुजन हैं।
सांप्रदायिक दंगों से भी खतरनाक होने जा रहा है संघ परिवार का घर वापसी अभियान। इतिहास का बदला चुकाने का वक्त है यह केसरिया समय।
इतिहास गवाह है कि नारी उत्पीड़न ही धर्म अधर्म का सबसे बड़ा खेल है और धर्मांतरण का अचूक हथियार भी वही।
भारत विभाजन के वक्त, बांग्लादेश युद्ध के समय़ लाखों औरतों की जो अस्मत लूटी गयीं और उस लुटी हुई अस्मत की लाश पर हम अब तक सीमाओं के आर-पार आजादी का जश्न मना रहे हैं। इस इतिहास पर गौर करने की जरुरत है क्योंकि हिंदू साम्राज्यवाद फिर वहीं इतिहास दोहरा रहा है और उसके धनुर्धरों की निगाह में हम सारे लोग निमित्तमात्र वध्य ही हैं।
बांग्लादेश की विवादास्पद बना दी गयी मानवाधिकारवादी लेखिका तसलिमा नसरीन ने अपने ताजा फेसबुक पोस्ट पर लिखा हैः
১৯৭১ সালে পশ্চিম পাকিস্তানের হানাদার বাহিনীর বিরুদ্ধে ন’মাস যুদ্ধ করে জিতেছিল পূর্ব পাকিস্তানের মানুষ। ভারত সাহায্য করেছিল যুদ্ধে জিততে। ওই সাহায্যটা না করলে বাংলাদেশের পক্ষে যুদ্ধে জেতা সম্ভব হত বলে আমার মনে হয় না। বাংলাদেশের জন্ম আমাদের বুঝিয়েছিল, ভারত ভাগ যাঁরা করেছিলেন, দূরদৃষ্টির তাঁদের খুব অভাব ছিল। তাঁরা ভেবেছিলেন ‘মুসলমান মুসলমান ভাই ভাই, হোক না তারা বাস করছে হাজার মাইল দূরে, হোক না তাদের ভাষা আর সংস্কৃতি আলাদা, যেহেতু ধর্মটা এক, বিরোধটা হবে না।’ ভুল ভাবনা। ভারত ভাগ হওয়ার পর পরই বিরোধ শুরু হয়ে গেল। পশ্চিম পাকিস্তানি শাসকগোষ্ঠী শোষণ করতে শুরু করলো পূর্ব পাকিস্তানের মুসলমানদের । নিজেদের ভাষাও চাপিয়ে দিতে চাইলো। আরবের ধনী মুসলমানরা যেমন এশিয়া বা আফ্রিকার গরীব মুসলমানদের তুচ্ছতাচ্ছিল্য করে, মানুষ বলে মনে করে না, পশ্চিম পাকিস্তানী শাসকরা ঠিক তেমন করতো, বাঙালিদের মানুষ বলে মনে করতো না। পূর্ব পাকিস্তান ফসল ফলাতো, খেতো পশ্চিম পাকিস্তান। পুবের ব্যবসাটা বাণিজ্যটা ফলটা সুফলটা পশ্চিমের পেটে। এ ক’দিন আর সয়! মুসলমানে মুসলমানে যুদ্ধ হল। শেষে, বাঙালি একটা দেশ পেলো। ভীষণ আবেগে দেশটাকে একেবারে ধর্মনিরপেক্ষ, সমাজতান্ত্রিক, গণতান্ত্রিক ইত্যাদি চমৎকার শব্দে ভূষিত করলো। ক’জন মানুষ ওই শব্দগুলোর মানে বুঝতো তখন? এখনই বা কতজন বোঝে? বোঝেনি বলেই তো চল্লিশ বছরের মধ্যেই দেশটা একটা ছোটখাটো পাকিস্তান হয়ে বসে আছে। ইসলামে থিকথিক করছে দেশ। টুপিতে দাড়িতে, হিজাবে বোরখায়, মসজিদে মাজারে চারদিক ছেয়ে গেছে। মানুষ সামনে এগোয়, বাংলাদেশ পিছোলো। চল্লিশ বছরে যা পার্থক্য ছিল বাংলাদেশে আর পাকিস্তানে, তার প্রায় সবই ঘুচিয়ে দেওয়া হয়েছে। সমান তালে মৌলবাদের চাষ হচ্ছে দু’দেশের মাটিতে। বাংলাদেশ মরিয়া হয়ে উঠেছে প্রমাণ করতে, যে, ‘মুসলমান মুসলমান ভাই ভাই। দ্বিজাতিতত্ত্বের ব্যাপারটা ভুল ছিল না, ঠিকই ছিল’।
দেশের সংবিধান বদলে গেছে। পাকিস্তানি সেনাদের আদেশে উপদেশে যে বাঙালিরা বাঙালির গলা কাটতো একাত্তরে, পাকিস্তান থেকে আলাদা হতে চায়নি, দেশ স্বাধীন হওয়ার পর খুব বেশি বছর যায়নি, দেশের তারা মন্ত্রী হয়েছে, দেশ চালিয়েছে। আমার মতো গণতন্ত্রে সমাজতন্ত্রে সমতায় সততায় বিশ্বাসী একজন লেখককে দেশ থেকে দিব্যি তাড়িয়ে দেওয়া হয়েছে কিছু ধর্মীয় মৌলবাদীকে খুশি করার জন্য। যারা তাড়ালো, যারা আজও দেশে ঢুকতে দিচ্ছে না আমাকে, সেই রাষ্ট্রনায়িকারা ওপরে যা-ই বলুক, ভেতরে ভেতরে নিজেরাও কিন্তু মৌলবাদী কম নয়।
বিজয় উৎসব করার বাংলাদেশের কোনও প্রয়োজন আছে কি? আমার কিন্তু মনে হয় না। আসলে ঠিক কিসের বিরুদ্ধে বিজয়? পাকিস্তান আর বাংলাদেশের নীতি আর আদর্শ তো এক! সত্যিকার বিরোধ বলে কি কিছু আছে আর? পাকিস্তানের ওপর নয়, বরং বাংলাদেশের বেশিরভাগ মানুষের রাগ একাত্তরের মিত্রশক্তি ভারতের ওপর। বিজয় দিবস করে খামোকাই নিজের সঙ্গে প্রতারণা না করলেই কি নয়! ১৬ ডিসেম্বরে নয়, বাংলাদেশ বরং ১৪ই আগস্টে
উৎসব করুক। পাকিস্তানের জন্মোৎসব করুক ঘটা করে। পাকিস্তানের সঙ্গে মিলে মিশে রীতিমত জাঁকালো উৎসব। মুসলমানের উৎসব। বিধর্মীদের থেকে মুসলমানদের আলাদা করার ঐতিহাসিক উৎসব। বিজয় উৎসব।
तसलिमा नसरीन ने भारत विभाजन के जिम्मेदार लोगों के विजन पर सवाल उठाये हैं पहली बार। यह गौर तलब है और उनने जो पूछा है यह सवाल कि बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी ,लोकतांत्रीक राष्ट्र का मतलब कितने लोग समझते हैं, उन सवालों का जवाब हम भी सोच लें तो बेहतर। तसलिमा ने बांग्लादेश के छोटा पाकिस्तान बन जाने के हालात बयां किये हैं और बताया है कि मातृभाषा को राष्ट्रीयता बनाकर जिस देश को भारत की सक्रिय मदद से आजादी मिली है, वह किस तरह इस्लामी बांग्लादेशी राष्ट्रीयता में तब्दील हो गयी है और इसके नतीजे क्या निकल रहे हैं।
बांग्लादेश की जगह भारत को रखें और इस्लामी की जगह हिंदू राष्ट्रवाद को रखें तो भारत में क्या चल रहा है, वह तस्वीर निकल कर आयेगी।
सच तो यह है कि अमन चैन के बिना बाजार का विस्तार भी नहीं होता। केसरिया के चलते कारपोरेट राज भी आकुल व्याकुल होने लगा है।
O- पलाश विश्वास
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2014/12/10/%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%98%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29





मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का सांप्रदायिकीकरण हो चुका है

मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का सांप्रदायिकीकरण हो चुका है
     भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश से आए लगभग 40 प्रतिनिधियों ने इस सत्र में भागीदारी की। सत्र की शुरूआत सभी उपस्थित प्रतिभागियों के परिचय से हुई। तत्पश्चात, सीएसएसएस के निदेशक इरफान इंजीनियर ने सत्र के आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर विमर्श की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक वर्गों में चेतना का उदय साम्राज्यवादी दौर में हुआ जब हमारे विदेशी शासकों ने बड़ी संख्या में लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने पर मजबूर किया ताकि उन्हें सस्ता श्रम उपलब्ध हो सके। आबादी के इस स्थानांतरण से देशों की सीमाएं बदलीं और नई राजनीतिक व्यवस्थाओं ने जन्म लिया। विभिन्न क्षेत्रों में नए लोगों के बसने का एक प्रभाव यह हुआ कि दक्षिण एशिया के एक देश में जो समुदाय बहुसंख्यक था वह दूसरे देश में अल्पसंख्यक बन गया। इससे परिस्थितियां जटिल होती गईं।
     अल्पसंख्यकों द्वारा उनके अधिकारों की मांग को राज्य अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानता आया है। यद्यपि अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए नेहरू-लियाकत सहित कई समझौते हुए परंतु शीतयुद्ध के काल में, दक्षिण एशिया, साम्राज्यवादी हितों के टकराव और हिंसा व षडयंत्रों का केंद्र बनकर उभरा। इससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बैरभाव तो बढ़ा ही, धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से वृद्धि हुई और क्षेत्र की सुरक्षा और शांति को खतरा पैदा हो गया। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए अल्पसंख्यक, जो दक्षिण एशिया में पहले से ही हाशिए पर थे।
     सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के हर्षमंदर ने अपने मुख्य वक्तव्य में कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों और सरकारों के आपसी रिश्ते सहज और सामान्य नहीं हैं। अल्पसंख्यकों को यह लगता है कि वे वंचना के शिकार हैं। धार्मिक पहचान, समाज को विभाजित कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व यह है कि हम विविधता का सम्मान करें और समानताएं ढूंढना बंद करें। यही दक्षिण एशिया और यूरोप में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का फर्क है। यूरोप में धर्मनिरपेक्षता, वहां के समाज में घुलमिल जाने के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसका एक उदाहरण है फ्रांस में पगड़ी व हिजाब पहनने पर प्रतिबंध। उन्होंने कहा कि राज्य के दमन और विविधता की उपेक्षा के कारण, लोग उस देश में स्वयं को सुरक्षित समझते हैं जहां उनके समुदाय का बहुमत हो। दक्षिण एशिया की विविधता ने उसकी संस्कृति को समृद्ध किया है। परंतु समृद्ध संस्कृति के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि किसी भी देश में अल्पसंख्यक स्वयं को सुरक्षित समझें और बिना आतंक या डर के अपना जीवनयापन कर सकें। हर एक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसी भी धर्म का पालन करे या कोई भी धर्म न माने या नास्तिकता में विश्वास रखे। यही सच्चा प्रजातंत्र है। दुर्भाग्यवश, दक्षिण एशिया में प्रजातंत्र की इस मूल आत्मा का हनन हो रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। बर्मा जैसे कई देशों में तो मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चर्चा करना तक प्रतिबंधित है। ऐसे मुद्दों पर चर्चा के लिए गुप्त बैठकें आयोजित करनी पड़ती हैं क्योंकि सरकार किसी भी प्रकार की मतविभिन्नता को क्रूरता से कुचल देती है।
     इसके बाद, विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवरण दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि श्री मंदर द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं एकदम सही थीं। अल्पसंख्यकों की समस्या का चरित्र मूलतः राजनैतिक है और प्रजातांत्रिक अधिकारों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को उपयुक्त व पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बढ़ने का एक कारण है आक्रामक बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था, जो कि मध्यम वर्ग की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाल रही है। श्रेष्ठी वर्ग यह चाहता है कि हाशिए पर पटक दिए गए लोगों और अल्पसंख्यकों की कीमत पर समाज में उसका वर्चस्व बना रहे। इसलिए यह आवश्यक है कि पूंजीवाद जैसी विचारधाराओं पर हल्ला बोला जाए जो कि अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को और चैड़ा कर रही हैं। बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था से असंतुलित विकास हो रहा है, जो समावेशी नहीं है।
       बांग्लादेश से आए मोइनुद्दीन ने कहा कि बांग्लादेश में कई धार्मिक, नस्लीय व सैक्स-आधारित अल्पसंख्यक समूह हैं। देश में हिजड़ा समुदाय एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय है। अल्पसंख्यकों को ढेर सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिंदू आबादी, जो कि सन् 1947 में 27 प्रतिशत थी, घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। देश में अल्पसंख्यकों को अपने रहवास के इलाकों से पलायन करने पर मजबूर किया जा रहा है।
     श्रीलंका के के.के. बालकृष्णन ने कहा कि वहां की आबादी में 72 प्रतिशत हिस्सा सिंहलियों का है जबकि 12-13 प्रतिशत तमिल, 8 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 7 प्रतिशत भारतीय तमिल हैं, जो कि मुख्यतः वहां के बागानों में काम करते हैं। श्रीलंका में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल व वर्ग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारतीय तमिलों के भी हाल बेहाल हैं।
   पाकिस्तान में स्थिति और भी खराब है। वहां अल्पसंख्यकों की अर्थव्यवस्था और विकास में तनिक भी हिस्सेदारी नहीं है। नौकरशाही में अल्पसंख्यकों की भागीदारी न के बराबर है। यद्यपि पाकिस्तान में सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत पद आरक्षित हैं तथापि उन्हें कभी जिम्मेदार व ऊँचे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता। उन्हें अक्सर महत्वहीन पद दिए जाते हैं। विभाजन के दौरान, जिस समय दोनो देशों से हिंदुओं और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा था, उस समय अल्पसंख्यकों ने पाकिस्तान में रहने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उन्हें उस धरती से प्यार था, जिसमें वे पले-बढ़े थे। केवल वे ही हिंदू पाकिस्तान छोड़कर जा सके जो धनी थे और जिनके पास एक नए स्थान पर जिंदगी शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन और योग्यता थी। दमनकारी जाति व्यवस्था और अमानवीय अछूत प्रथा के कारण भील और कोली समुदायों की बड़ी आबादी ने पाकिस्तान छोड़कर भारत न जाने का निर्णय किया। आज भी 80 लाख भील और कोली पाकिस्तान में रह रहे हैं। परंतु भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों की तरह, पाकिस्तान में भी उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा और उन्हें शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर नहीं मिले। इस भेदभाव का एक सुबूत यह है कि जहां हिंदू आबादी का 80 प्रतिशत अनुसूचित जातियां हैं, वहीं अर्थव्यवस्था, प्रशासन, संसद आदि में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 20 प्रतिशत है। स्पष्टतः, अल्पसंख्यकों की राजनीति में भागीदारी को रोकने की कोशिश की जा रही है। अगर सत्ता और राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाना है तो अल्पसंख्यक समुदायों को संसद में अधिक सीटें दी जानी चाहिए।
     परंतु जब हम अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की चर्चा करते हैं तब यह जरूरी है कि हम अल्पसंख्यक समुदायों को एकाश्म न मानें और ना ही हम उन्हें ऐसा समूह समझें, जिसकी आवश्यकताएं, महत्वाकाक्षाएं और अनुभव एक ही हैं। जाति की तरह, लिंग भी भेदभाव का आधार है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को विवाह करते समय इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया जाता है। वहां बलात्कार आम है और ये महिलाओं के लिए मानसिक और शारीरिक यंत्रणा का सबब बनते हैं। अतः अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई भी चर्चा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि उसमें लैंगिक न्याय की बात शामिल न हो। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के किसी भी घोषणापत्र को लागू करते समय यह ध्यान में रखा जाना होगा कि उसमें महिलाओं के अधिकारों के लिए उचित स्थान हो।
     पाकिस्तान की तरह, भारत में भी अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को हजार दुःख हैं। उनके साथ भी बलात्कार और शारीरिक शोषण की घटनाएं बहुत आम हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आयी। जब मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हो रही थी तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उसे रोकने के लिए पर्याप्त और उचित कदम नहीं उठाए। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के विधायक भी मूकदर्शक बने रहे।
     टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज, मुंबई के प्रोफेसर रानू जैन ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियों पर बहस होनी चाहिए क्योंकि वे काफी हद तक अस्पष्ट हैं। उदाहरणार्थ, अल्पसंख्यक समुदाय को ही परिभाषित नहीं किया गया है। नतीजे में, उच्चतम न्यायालय यह तय कर रहा है कि कौन-सा समुदाय अल्पसंख्यक है और उस समुदाय को अल्पसंख्यकों के लिए नियत सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे शक्तिशाली समुदायों को जोड़-तोड़ करने का मौका मिल रहा है। भारत में इसी अस्पष्टता का लाभ उठाकर जैनियों और पारसियों ने भी अपने-अपने समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलवा दिया है और उन्हें राज्य द्वारा हर किस्म का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यद्यपि यह सही है कि जैनियों और पारसियों की आबादी कम है परंतु यह भी सच है कि दोनों समुदाय विकसित, शिक्षित और समृद्ध हैं और उन्हें उन अल्पसंख्यक समुदायों की कीमत पर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं, जो पिछड़े, गरीब और अशिक्षित हैं। भारत में अमीरों और गरीबों के बीच भारी अंतर है। मुट्ठी भर रईस यह जानते भी नहीं कि गरीबों को किस तरह की हिंसा, भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। संपन्न वर्ग तो बस अपनी ताकत में बढ़ोत्तरी करना चाहता है। मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का इस हद तक सांप्रदायिकीकरण हो चुका है कि ये दोनों संस्थाएं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। निराशा के इस घनघोर अंधेरे में सच्चर समिति की रपट, आशा की किरण बनकर उभरी थी परंतु उसकी अधिकांश सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया गया है। ऐसे में जरूरी है कि अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर खुलकर चर्चा की जाए और ऐसे नियम-कानून बनाए जाएं जिनसे सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव रूक सके। साथ ही, सांप्रदायिक हिंसा पर नजर रखे जाने की भी जरूरत है। भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में कश्मीर से आए बशीर अहमद ने एक महत्वपूर्ण बात कही। कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस इलाके में रहते हैं, वहां पर हिंदू पंडित अल्पसंख्यक हैं।  उन्होंने कहा कि घाटी से पंडितों का पलायन दुर्भाग्यपूर्ण है। वे वहां से इसलिए चले गए क्योंकि उनके मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया था। उन्होंने कहा कि जब हम अल्पसंख्यकों के संबंध में नीतियों के निर्माण पर चर्चा करें तब हमें अल्पसंख्यकों के अंदर के अल्पसंख्यकों का भी ध्यान रखना होगा।
      सत्र के अंत में पाकिस्तान से आए करामत अली और इरफान इंजीनियर ने पूरी चर्चा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया और भविष्य की कार्यवाही की रूपरेखा बताई। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को विधानमंडलों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में तो पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए, आर्थिक नीतियों और विकास की प्रक्रिया के निर्धारण में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए। अल्पसंख्यकों को यह हक मिलना चाहिए कि वे अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें और अपनी पहचान को सुरक्षित रख सकें। सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम को रोकने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। अकेले भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक सांप्रदायिक दंगों में लगभग 40,000 लोग मारे जा चुके हैं। परंतु बहुत कम दोषियों को सजा मिल सकी है। अतः यह आवश्यक है कि पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाए। जो लोग हिंसा के कारण अपने गांव, घर छोड़ने पर मजबूर कर दिए जाते हैं वे शिक्षा और रोजगार से तो मेहरूम होते ही हैं, उनमें मजहबी कट्टरता भी बढ़ती है। अगर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी जाए और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए तो कट्टरपंथी तत्व कमजोर पड़ेंगे और धार्मिक पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण कम होगा।
     इस सत्र में हुई चर्चा के आधार पर अल्पसंख्यक अधिकारों के घोषणापत्र की अवधारणा पर विचार करने हेतु एक मसविदा समिति का गठन किया गया जिसमें इरफान इंजीनियर, रानू जैन, हर्षमंदर, करामत अली व बशीर अहमद शामिल हैं। सम्मेलन में यह मांग की गई कि सार्क देशों को दक्षिण एशिया आयोग की नियुक्ति करना चाहिए जिसमें हर सार्क देश से एक-एक पुरूष और महिला प्रतिनिधि शामिल हो और जो क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर नजर रखे। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)
O-नेहा दभाड़े
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/khabarnama/2014/12/10मीडिया-और-शिक्षा-व्यवस्थ?

Sunday, 7 December 2014

              लोकतंत्र और आंबेडकर

लोकतंत्र और आंबेडकर

बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर की पुण्यतिथि पर विशेष

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर को हमें आधुनिक मिथभंजक के रूप में देखना चाहिए। भारत और लोकतंत्र के बारे में परंपरावादियों, सनातनियों, डेमोक्रेट, ब्रिटिश बुद्धिजीवियों और शासकों आदि ने अनेक मिथों का प्रचार किया है। ये मिथ आज भी आम जनता में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। बाबासाहेब ने भारतीय समाज का अध्ययन करते हुए उसके बारे में एक नयी सोच पैदा की है। भारतीय समाज के अनेक विवादास्पद पहलुओं का आलोचनात्मक और मौलिक विवेचन किया है। भारत में भक्त होना आसान है समझदार होना मुश्किल है। बाबासाहेब ऐसे विचारक हैं जो शूद्रों के सामाजिक ताने-बाने को पूरी जटिलता के साथ उद्घाटित करते हैं। बाबासाहेब के भक्तों में एक बड़ा तबका है जो दलित चेतना और दलित विचारधारा से लैस है।         आम्बेडकर की साफ धारणा थी कि संसदीय जनतंत्र, जनता की मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। सन् 1943 में इंडियन फेडरेशन के कार्यकर्ताओं के एक शिविर में भाषण करते हुए आम्बेडकर ने कहा “हर देश में संसदीय लोकतंत्र के प्रति बहुत असंतोष है। भारत में इस प्रश्न पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भारत संसदीय लोकतंत्र प्राप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है। इस बात की बहुत जरूरत है कि कोई यथेष्ठ साहस के साथ भारतवासियों से कहे- संसदीय लोकतंत्र से सावधान। यह उतना बढ़िया उत्पाद नहीं है जितना दिखाई देता था।”
इसी भाषण में आगे कहा ‘संसदीय लोकतंत्र कभी जनता की सरकार नहीं रहा,न जनता के द्वारा चलाई जाने वाली सरकार रहा। कभी ऐसी भी सरकार नहीं रहा जो जनता के लिए हो।’
भीमराब आम्बेडकर ने 1942 के रेडियो भाषण में स्वाधीनता,समानता और भाईचारा, इन तीन सूत्रों का उद्भव फ्रांसीसी क्रांति में देखा। उन्होंने कहा “मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन । संसदीय लोकतंत्र का अर्थ जनता के द्वारा शासन नहीं है।”
आम्बेडकर ने संसदीय लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए लिखा “संसदीय लोकतंत्र शासन का ऐसा रूप है जिसमें जनता का काम अपने मालिकों के लिए वोट देना और उन्हें हुकूमत करने के लिए छोड़ देना होता है।” आम्बेडकर ने लोकतंत्र को मजदूरवर्ग के नजरिए से देखा और उस पर अमल करने पर भी जोर दिया।
     नेतागण जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं वो मालिकों का जनतंत्र है। वे जिस तथाकथित लोकशाही की बार बार दुहाई दे रहे हैं वो मालिकों की लोकशाही है। इसके विपरीत भीमराव आम्बेडकर का मानना था जब तक पूँजीवाद कायम है तब तक सही मायनों में न स्वतंत्रता संभव है और न समानता। वास्तव अर्थ में समानता हासिल करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को बदलना होगा उसके बाद ही वास्तविक अर्थ में समानता प्राप्त की जा सकती है।
     इसके विपरीत नेतागण पूंजीवाद को बनाए रखकर ही नियमों में सुधार की बात कर रहे हैं। आम्बेडकर की नजर में वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है सभी किस्म के विशेषाधिकारों का खात्मा। नागरिक सेवाओं से लेकर फौज तक,व्यापार से लेकर उद्योग धंधों तक सभी किस्म के विशेषाधिकारों को खत्म किया जाए। वे सारी चीजें खत्म की जाएं जिनसे असमानता पैदा होती है।
    आम्बेडकर की धारणा थी कि ‘लोकप्रिय हुकूमत के तामझाम के बावजूद संसदीय लोकतंत्र वास्तव में आनुवंशिक शासकवर्ग द्वारा आनुवंशिक प्रजा वर्ग पर हुकूमत है। यह स्थिति वर्णव्यवस्था से बहुत कुछ मिलती जुलती है। ऊपर से लगता है कोई भी आदमी चुना जा सकता है, मंत्री हो सकता है, शासन कर सकता है। वास्तव में शासक वर्ग एक तरह वर्ण बन जाता है। उसी में से,थोड़े से उलटफेर के साथ,शासक चुने जाते हैं। जो प्रजा वर्ग है, वह सदा शासित बना रहता है।’
O- जगदीश्वर चतुर्वेदी
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2014/12/06/%29