Thursday, 11 December 2014





मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का सांप्रदायिकीकरण हो चुका है

मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का सांप्रदायिकीकरण हो चुका है
     भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश से आए लगभग 40 प्रतिनिधियों ने इस सत्र में भागीदारी की। सत्र की शुरूआत सभी उपस्थित प्रतिभागियों के परिचय से हुई। तत्पश्चात, सीएसएसएस के निदेशक इरफान इंजीनियर ने सत्र के आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर विमर्श की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक वर्गों में चेतना का उदय साम्राज्यवादी दौर में हुआ जब हमारे विदेशी शासकों ने बड़ी संख्या में लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने पर मजबूर किया ताकि उन्हें सस्ता श्रम उपलब्ध हो सके। आबादी के इस स्थानांतरण से देशों की सीमाएं बदलीं और नई राजनीतिक व्यवस्थाओं ने जन्म लिया। विभिन्न क्षेत्रों में नए लोगों के बसने का एक प्रभाव यह हुआ कि दक्षिण एशिया के एक देश में जो समुदाय बहुसंख्यक था वह दूसरे देश में अल्पसंख्यक बन गया। इससे परिस्थितियां जटिल होती गईं।
     अल्पसंख्यकों द्वारा उनके अधिकारों की मांग को राज्य अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानता आया है। यद्यपि अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए नेहरू-लियाकत सहित कई समझौते हुए परंतु शीतयुद्ध के काल में, दक्षिण एशिया, साम्राज्यवादी हितों के टकराव और हिंसा व षडयंत्रों का केंद्र बनकर उभरा। इससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बैरभाव तो बढ़ा ही, धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से वृद्धि हुई और क्षेत्र की सुरक्षा और शांति को खतरा पैदा हो गया। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए अल्पसंख्यक, जो दक्षिण एशिया में पहले से ही हाशिए पर थे।
     सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के हर्षमंदर ने अपने मुख्य वक्तव्य में कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों और सरकारों के आपसी रिश्ते सहज और सामान्य नहीं हैं। अल्पसंख्यकों को यह लगता है कि वे वंचना के शिकार हैं। धार्मिक पहचान, समाज को विभाजित कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व यह है कि हम विविधता का सम्मान करें और समानताएं ढूंढना बंद करें। यही दक्षिण एशिया और यूरोप में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का फर्क है। यूरोप में धर्मनिरपेक्षता, वहां के समाज में घुलमिल जाने के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसका एक उदाहरण है फ्रांस में पगड़ी व हिजाब पहनने पर प्रतिबंध। उन्होंने कहा कि राज्य के दमन और विविधता की उपेक्षा के कारण, लोग उस देश में स्वयं को सुरक्षित समझते हैं जहां उनके समुदाय का बहुमत हो। दक्षिण एशिया की विविधता ने उसकी संस्कृति को समृद्ध किया है। परंतु समृद्ध संस्कृति के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि किसी भी देश में अल्पसंख्यक स्वयं को सुरक्षित समझें और बिना आतंक या डर के अपना जीवनयापन कर सकें। हर एक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसी भी धर्म का पालन करे या कोई भी धर्म न माने या नास्तिकता में विश्वास रखे। यही सच्चा प्रजातंत्र है। दुर्भाग्यवश, दक्षिण एशिया में प्रजातंत्र की इस मूल आत्मा का हनन हो रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। बर्मा जैसे कई देशों में तो मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चर्चा करना तक प्रतिबंधित है। ऐसे मुद्दों पर चर्चा के लिए गुप्त बैठकें आयोजित करनी पड़ती हैं क्योंकि सरकार किसी भी प्रकार की मतविभिन्नता को क्रूरता से कुचल देती है।
     इसके बाद, विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवरण दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि श्री मंदर द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं एकदम सही थीं। अल्पसंख्यकों की समस्या का चरित्र मूलतः राजनैतिक है और प्रजातांत्रिक अधिकारों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को उपयुक्त व पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बढ़ने का एक कारण है आक्रामक बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था, जो कि मध्यम वर्ग की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाल रही है। श्रेष्ठी वर्ग यह चाहता है कि हाशिए पर पटक दिए गए लोगों और अल्पसंख्यकों की कीमत पर समाज में उसका वर्चस्व बना रहे। इसलिए यह आवश्यक है कि पूंजीवाद जैसी विचारधाराओं पर हल्ला बोला जाए जो कि अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को और चैड़ा कर रही हैं। बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था से असंतुलित विकास हो रहा है, जो समावेशी नहीं है।
       बांग्लादेश से आए मोइनुद्दीन ने कहा कि बांग्लादेश में कई धार्मिक, नस्लीय व सैक्स-आधारित अल्पसंख्यक समूह हैं। देश में हिजड़ा समुदाय एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय है। अल्पसंख्यकों को ढेर सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिंदू आबादी, जो कि सन् 1947 में 27 प्रतिशत थी, घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। देश में अल्पसंख्यकों को अपने रहवास के इलाकों से पलायन करने पर मजबूर किया जा रहा है।
     श्रीलंका के के.के. बालकृष्णन ने कहा कि वहां की आबादी में 72 प्रतिशत हिस्सा सिंहलियों का है जबकि 12-13 प्रतिशत तमिल, 8 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 7 प्रतिशत भारतीय तमिल हैं, जो कि मुख्यतः वहां के बागानों में काम करते हैं। श्रीलंका में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल व वर्ग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारतीय तमिलों के भी हाल बेहाल हैं।
   पाकिस्तान में स्थिति और भी खराब है। वहां अल्पसंख्यकों की अर्थव्यवस्था और विकास में तनिक भी हिस्सेदारी नहीं है। नौकरशाही में अल्पसंख्यकों की भागीदारी न के बराबर है। यद्यपि पाकिस्तान में सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत पद आरक्षित हैं तथापि उन्हें कभी जिम्मेदार व ऊँचे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता। उन्हें अक्सर महत्वहीन पद दिए जाते हैं। विभाजन के दौरान, जिस समय दोनो देशों से हिंदुओं और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा था, उस समय अल्पसंख्यकों ने पाकिस्तान में रहने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उन्हें उस धरती से प्यार था, जिसमें वे पले-बढ़े थे। केवल वे ही हिंदू पाकिस्तान छोड़कर जा सके जो धनी थे और जिनके पास एक नए स्थान पर जिंदगी शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन और योग्यता थी। दमनकारी जाति व्यवस्था और अमानवीय अछूत प्रथा के कारण भील और कोली समुदायों की बड़ी आबादी ने पाकिस्तान छोड़कर भारत न जाने का निर्णय किया। आज भी 80 लाख भील और कोली पाकिस्तान में रह रहे हैं। परंतु भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों की तरह, पाकिस्तान में भी उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा और उन्हें शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर नहीं मिले। इस भेदभाव का एक सुबूत यह है कि जहां हिंदू आबादी का 80 प्रतिशत अनुसूचित जातियां हैं, वहीं अर्थव्यवस्था, प्रशासन, संसद आदि में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 20 प्रतिशत है। स्पष्टतः, अल्पसंख्यकों की राजनीति में भागीदारी को रोकने की कोशिश की जा रही है। अगर सत्ता और राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाना है तो अल्पसंख्यक समुदायों को संसद में अधिक सीटें दी जानी चाहिए।
     परंतु जब हम अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की चर्चा करते हैं तब यह जरूरी है कि हम अल्पसंख्यक समुदायों को एकाश्म न मानें और ना ही हम उन्हें ऐसा समूह समझें, जिसकी आवश्यकताएं, महत्वाकाक्षाएं और अनुभव एक ही हैं। जाति की तरह, लिंग भी भेदभाव का आधार है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को विवाह करते समय इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया जाता है। वहां बलात्कार आम है और ये महिलाओं के लिए मानसिक और शारीरिक यंत्रणा का सबब बनते हैं। अतः अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई भी चर्चा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि उसमें लैंगिक न्याय की बात शामिल न हो। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के किसी भी घोषणापत्र को लागू करते समय यह ध्यान में रखा जाना होगा कि उसमें महिलाओं के अधिकारों के लिए उचित स्थान हो।
     पाकिस्तान की तरह, भारत में भी अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को हजार दुःख हैं। उनके साथ भी बलात्कार और शारीरिक शोषण की घटनाएं बहुत आम हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आयी। जब मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हो रही थी तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उसे रोकने के लिए पर्याप्त और उचित कदम नहीं उठाए। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के विधायक भी मूकदर्शक बने रहे।
     टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज, मुंबई के प्रोफेसर रानू जैन ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियों पर बहस होनी चाहिए क्योंकि वे काफी हद तक अस्पष्ट हैं। उदाहरणार्थ, अल्पसंख्यक समुदाय को ही परिभाषित नहीं किया गया है। नतीजे में, उच्चतम न्यायालय यह तय कर रहा है कि कौन-सा समुदाय अल्पसंख्यक है और उस समुदाय को अल्पसंख्यकों के लिए नियत सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे शक्तिशाली समुदायों को जोड़-तोड़ करने का मौका मिल रहा है। भारत में इसी अस्पष्टता का लाभ उठाकर जैनियों और पारसियों ने भी अपने-अपने समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलवा दिया है और उन्हें राज्य द्वारा हर किस्म का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यद्यपि यह सही है कि जैनियों और पारसियों की आबादी कम है परंतु यह भी सच है कि दोनों समुदाय विकसित, शिक्षित और समृद्ध हैं और उन्हें उन अल्पसंख्यक समुदायों की कीमत पर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं, जो पिछड़े, गरीब और अशिक्षित हैं। भारत में अमीरों और गरीबों के बीच भारी अंतर है। मुट्ठी भर रईस यह जानते भी नहीं कि गरीबों को किस तरह की हिंसा, भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। संपन्न वर्ग तो बस अपनी ताकत में बढ़ोत्तरी करना चाहता है। मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का इस हद तक सांप्रदायिकीकरण हो चुका है कि ये दोनों संस्थाएं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। निराशा के इस घनघोर अंधेरे में सच्चर समिति की रपट, आशा की किरण बनकर उभरी थी परंतु उसकी अधिकांश सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया गया है। ऐसे में जरूरी है कि अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर खुलकर चर्चा की जाए और ऐसे नियम-कानून बनाए जाएं जिनसे सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव रूक सके। साथ ही, सांप्रदायिक हिंसा पर नजर रखे जाने की भी जरूरत है। भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में कश्मीर से आए बशीर अहमद ने एक महत्वपूर्ण बात कही। कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस इलाके में रहते हैं, वहां पर हिंदू पंडित अल्पसंख्यक हैं।  उन्होंने कहा कि घाटी से पंडितों का पलायन दुर्भाग्यपूर्ण है। वे वहां से इसलिए चले गए क्योंकि उनके मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया था। उन्होंने कहा कि जब हम अल्पसंख्यकों के संबंध में नीतियों के निर्माण पर चर्चा करें तब हमें अल्पसंख्यकों के अंदर के अल्पसंख्यकों का भी ध्यान रखना होगा।
      सत्र के अंत में पाकिस्तान से आए करामत अली और इरफान इंजीनियर ने पूरी चर्चा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया और भविष्य की कार्यवाही की रूपरेखा बताई। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को विधानमंडलों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में तो पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए, आर्थिक नीतियों और विकास की प्रक्रिया के निर्धारण में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए। अल्पसंख्यकों को यह हक मिलना चाहिए कि वे अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें और अपनी पहचान को सुरक्षित रख सकें। सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम को रोकने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। अकेले भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक सांप्रदायिक दंगों में लगभग 40,000 लोग मारे जा चुके हैं। परंतु बहुत कम दोषियों को सजा मिल सकी है। अतः यह आवश्यक है कि पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाए। जो लोग हिंसा के कारण अपने गांव, घर छोड़ने पर मजबूर कर दिए जाते हैं वे शिक्षा और रोजगार से तो मेहरूम होते ही हैं, उनमें मजहबी कट्टरता भी बढ़ती है। अगर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी जाए और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए तो कट्टरपंथी तत्व कमजोर पड़ेंगे और धार्मिक पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण कम होगा।
     इस सत्र में हुई चर्चा के आधार पर अल्पसंख्यक अधिकारों के घोषणापत्र की अवधारणा पर विचार करने हेतु एक मसविदा समिति का गठन किया गया जिसमें इरफान इंजीनियर, रानू जैन, हर्षमंदर, करामत अली व बशीर अहमद शामिल हैं। सम्मेलन में यह मांग की गई कि सार्क देशों को दक्षिण एशिया आयोग की नियुक्ति करना चाहिए जिसमें हर सार्क देश से एक-एक पुरूष और महिला प्रतिनिधि शामिल हो और जो क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर नजर रखे। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)
O-नेहा दभाड़े
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/khabarnama/2014/12/10मीडिया-और-शिक्षा-व्यवस्थ?

Sunday, 7 December 2014

              लोकतंत्र और आंबेडकर

लोकतंत्र और आंबेडकर

बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर की पुण्यतिथि पर विशेष

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर को हमें आधुनिक मिथभंजक के रूप में देखना चाहिए। भारत और लोकतंत्र के बारे में परंपरावादियों, सनातनियों, डेमोक्रेट, ब्रिटिश बुद्धिजीवियों और शासकों आदि ने अनेक मिथों का प्रचार किया है। ये मिथ आज भी आम जनता में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। बाबासाहेब ने भारतीय समाज का अध्ययन करते हुए उसके बारे में एक नयी सोच पैदा की है। भारतीय समाज के अनेक विवादास्पद पहलुओं का आलोचनात्मक और मौलिक विवेचन किया है। भारत में भक्त होना आसान है समझदार होना मुश्किल है। बाबासाहेब ऐसे विचारक हैं जो शूद्रों के सामाजिक ताने-बाने को पूरी जटिलता के साथ उद्घाटित करते हैं। बाबासाहेब के भक्तों में एक बड़ा तबका है जो दलित चेतना और दलित विचारधारा से लैस है।         आम्बेडकर की साफ धारणा थी कि संसदीय जनतंत्र, जनता की मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। सन् 1943 में इंडियन फेडरेशन के कार्यकर्ताओं के एक शिविर में भाषण करते हुए आम्बेडकर ने कहा “हर देश में संसदीय लोकतंत्र के प्रति बहुत असंतोष है। भारत में इस प्रश्न पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भारत संसदीय लोकतंत्र प्राप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है। इस बात की बहुत जरूरत है कि कोई यथेष्ठ साहस के साथ भारतवासियों से कहे- संसदीय लोकतंत्र से सावधान। यह उतना बढ़िया उत्पाद नहीं है जितना दिखाई देता था।”
इसी भाषण में आगे कहा ‘संसदीय लोकतंत्र कभी जनता की सरकार नहीं रहा,न जनता के द्वारा चलाई जाने वाली सरकार रहा। कभी ऐसी भी सरकार नहीं रहा जो जनता के लिए हो।’
भीमराब आम्बेडकर ने 1942 के रेडियो भाषण में स्वाधीनता,समानता और भाईचारा, इन तीन सूत्रों का उद्भव फ्रांसीसी क्रांति में देखा। उन्होंने कहा “मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन । संसदीय लोकतंत्र का अर्थ जनता के द्वारा शासन नहीं है।”
आम्बेडकर ने संसदीय लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए लिखा “संसदीय लोकतंत्र शासन का ऐसा रूप है जिसमें जनता का काम अपने मालिकों के लिए वोट देना और उन्हें हुकूमत करने के लिए छोड़ देना होता है।” आम्बेडकर ने लोकतंत्र को मजदूरवर्ग के नजरिए से देखा और उस पर अमल करने पर भी जोर दिया।
     नेतागण जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं वो मालिकों का जनतंत्र है। वे जिस तथाकथित लोकशाही की बार बार दुहाई दे रहे हैं वो मालिकों की लोकशाही है। इसके विपरीत भीमराव आम्बेडकर का मानना था जब तक पूँजीवाद कायम है तब तक सही मायनों में न स्वतंत्रता संभव है और न समानता। वास्तव अर्थ में समानता हासिल करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को बदलना होगा उसके बाद ही वास्तविक अर्थ में समानता प्राप्त की जा सकती है।
     इसके विपरीत नेतागण पूंजीवाद को बनाए रखकर ही नियमों में सुधार की बात कर रहे हैं। आम्बेडकर की नजर में वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है सभी किस्म के विशेषाधिकारों का खात्मा। नागरिक सेवाओं से लेकर फौज तक,व्यापार से लेकर उद्योग धंधों तक सभी किस्म के विशेषाधिकारों को खत्म किया जाए। वे सारी चीजें खत्म की जाएं जिनसे असमानता पैदा होती है।
    आम्बेडकर की धारणा थी कि ‘लोकप्रिय हुकूमत के तामझाम के बावजूद संसदीय लोकतंत्र वास्तव में आनुवंशिक शासकवर्ग द्वारा आनुवंशिक प्रजा वर्ग पर हुकूमत है। यह स्थिति वर्णव्यवस्था से बहुत कुछ मिलती जुलती है। ऊपर से लगता है कोई भी आदमी चुना जा सकता है, मंत्री हो सकता है, शासन कर सकता है। वास्तव में शासक वर्ग एक तरह वर्ण बन जाता है। उसी में से,थोड़े से उलटफेर के साथ,शासक चुने जाते हैं। जो प्रजा वर्ग है, वह सदा शासित बना रहता है।’
O- जगदीश्वर चतुर्वेदी
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2014/12/06/%29

डालर छापने की मशीन लगा रहे हैं मोदी। इस देश का सब          कुछ छपे कागज के बदले बेच देंगे ?

डालर छापने की मशीन लगा रहे हैं मोदी। इस देश का सब कुछ छपे कागज के बदले बेच देंगे?


                    इस देश को बचाना है तो मोदी का इ्स्तीफा                          चाहिए, जितनी देर होगी, उतना ही सत्यानाश…

ठगों की सरकार है यह और आधार योजना अमेरिकी खुफिया निगरानी के लिए है…

इस देश को बचाना है तो मोदी का इ्स्तीफा चाहिए, जितनी देर होगी, उतना ही सत्यानाश।  
डालर छापने की मशीन लगा रहे हैं मोदी और इस देश का सबकुछ छपे कागज के बदले बेच देंगे।
ठगों की सरकार है यह और आधार योजना अमेरिकी खुफिया निगरानी के लिए है।
ऐसा कहना है वयोवृद्ध अशोक टी जयसिंघानी का और हम उनका समर्थन करते हैं।  आप तय करें कि आपको क्या करना है।
अब पुणे में रह रहे अशोक टी जयसिंघानी वयोवृद्ध हैं और सहज भाव से लिख नहीं रहे हैं, जैसे वे जाने जाते हैं।
मेरे ब्लॉगों पर उनके आलेख पहले खूब लगते रहे हैं और इस बार भी मैंने निवेदन किया कि वे खुद लिखकर दें तो उन्होंने कहा कि मुझे लिखना है। जो शुरु से मेरे ब्लाग पढ़ते रहे हैं, उन्हें उनका लिखा याद आना चाहिए।
 उनके मुताबिक भारत पाखंडियों का देश है और विशुद्धता के नाम पर धर्म-कर्म वाले देश में गो मूत्र और गोबर के अलावा कुछ भी पवित्र नहीं हैं। उनके मुताबिकः
India: Land of Hypocrisy,  Deceit,  Poison,  Disease & Death! Only Cow’s Urine & Dung are Pure in India!! By Ashok T. Jaisinghani …
उनके कहे का संदर्भ समझने के लिए उनका यह आलेख गूगल कर लें।
जयसिंघानी जी से हमारी पहले नियमित बातचीत होती रही है। लेकिन अरसे से उनसे संवाद नहीं रहा।
हाल में जब पुणे से उनका फोन आया तो उन्हें पहचानने में मुझे देरी भी हो गयी। तब उनने छूटते ही कहा कि लैंड लाइन टेली फोन में अब किराया 399 है और बिल जो आया, उसमें फ्री कॉल पर सिर्फ दस रुपये की छूट उन्हें मिली है। मुझसे कहा कि अपना बिल चेक कर लूँ। मेरा बिल तब तक नहीं आया था लेकिन आने पर मैंने पाया कि मुफ्त कॉल की छूट लगभग खत्म कर दी गयी है।
मुझसे उन्होंने कहा कि मैं इस विषय पर जरूर लिखूँ।
मैंने कहा कि मेरे हाथ कुछ लगे तो जरूर लिखूँगा।
तब उन्होंने कहा कि कारपोरेट हितों की गुलाम है यह सरकार और जनता को ठग रही है। जो कहती है, उसका उलट सब कुछ कर रही है।
आज सुबह फिर उनका फोन आया और उन्होंने अबकी दफा कहा कि इस देश को बचाना है तो मोदी का इ्स्तीफा चाहिएजितनी देर होगीउतना ही सत्यानाश।
हम कुछ कहते , इससे पहले उनने कहा कि डॉलर छापने की मशीन लगा रहे हैं मोदी और इस देश का सब कुछ छपे कागज के बदले बेच देंगे।
उनने कहा कि दुनिया भर के संसाधन और बाजारों को अमेरिकी बिना अपना संसाधन खर्च किये बिना कुछ निवेश किये सिर्फ डालकर छापकर हड़प रहा है और मोदी अमेरिकी हरकारा हैभारत का प्रधानमंत्री नहीं।
उनने कहा कि दुनिया भर के तेल पर अमेरिकी कब्जा है जबकि वह तेल उत्पादन नहीं करता बल्कि तेल के कारोबार पर उसका वर्चस्व है।
दरअसल जयसिंघानी जी सच कह रहे हैं। अभी अमेरिका ने तेल उत्पादक देशों को फतवा जारी कर रखा है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतें घट रही है, सो वे तुरंत तेल के उत्पादन में कटौती करें ताकि तेल की कीमतें नहीं घटें।
ओपेक देशों ने ऐसा करने से मन कर दिया तो तेल और गैस सब्सिडी काटकर कोई भारतीय व्यवस्था का कल्याण नहीं कर रहे हैं मोदी। लगातार घट रही तेल कीमत परिदृश्य में बल्कि वे अमेरिकी तेल वर्चस्व और अमेरिकी डालर वर्चस्व के कारिंदे बतौर काम कर रहे हैं।
अंबेडकर के गोल्ड स्टैंडर्ड के मुताबिक रुपी प्राब्लम सुलाझाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय रिजर्व बैंक आफ इंडिया की स्थापना की, जो अब कारपोरेट कंपनियों की पालतू बिल्ली है।
सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता डा. अमर्त्य सेन ने एक व्याख्यान में कहा कि डॉ. बी आर अंबेडकर, अर्थशास्त्र में मेरे पिता हैं।  अर्थशास्त्र के क्षेत्र में देश को दी गई उनकी सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
डा. अमर्त्य सेन के मुताबिक डॉ. अंबेडकर की वर्ष 1923 में प्रकाशित थीसिस ‘द प्राब्लम ऑफ रुपी’ और ‘भारतीय मुद्रा और बैंकिंग’ का रिजर्व बैंक की स्थापना से गहरा संबंध है।
उसी  थीसिस के आधार पर डॉ. अंबेडकर ने रिजर्व बैंक की कार्य प्रणाली का खाका ‘यंग हिल्टन कमीशन’,  जिसे रॉयल कमीशन के नाम से भी जाना गया,  के सामने रखा था।
रॉयल कमीशन के अधिकांश सदस्य रिजर्व बैंक की स्थापना पर विचार करने के लिए रॉयल कमीशन की बैठक में डॉ. अंबेडकर की उक्त थीसिस को साथ में ले गए थे।
बैठक में उक्त थीसिस पर भी चर्चा हुई और परिणामस्वरूप रॉयल कमीशन की अनुशंसा पर एक अप्रैल,  1935 को रिजर्व बैंक अस्तित्व में आया।
मोदी की सरकार अब उसी रिजर्व बैंक के सभी सत्ताइस विभागों का प्रबंधन देशी विदेशी कारपोरेट घरानों का सौंप रहे हैं तो समझ जाइये कि डालर छापने की मशीनें लग चुकी हैं और कागज पर छपे डालर के चित्र के बदले हम क्या क्या खोने जा रहे हैं। जल जंगल जमीन, नागरिकता, मानवाधिकर, नागरिक अधिकार, पर्यावरण, मौसम, जीवन चक्र, जलवायु समेत सब कुछ।
शिक्षा के अधिकार से वंचित हम लोगों को संपत्ति के अधिकार से भी वंचित करके संघ परिवार खुल्लम खुल्ला डालर मनुस्मृति राज बहाल कर रहे हैं, बाबसाहेब डा.अंबेडकर को विष्णु भगवान का अवतार और हमारे तमाम रामों का हनुमान कायाकल्प करके।
बाबासाहेब का प्राब्लम आफ रुपी में औपनिवेशिक शोषण का जो नेटवर्क  है, मोदी उसी पोंजी स्कीम को लागू कर रहे हैं, अंग्रेजों से भी ज्यादा बेरहमी के साथ।
भारतीय अर्थ व्यवस्था पर तेल का सबसे ज्यादा बोझ है और राजस्व के सबसे बड़े हिस्से तेल और हथियारों पर खर्च हो जाते हैं। लेकिन विकास दर के लिए राजस्व घाटा और वित्तीय घाटा टालने के गणित में तेल और हथियारों की चर्चा कतई नहीं होती।
अमेरिकी रेटिंग एजंसियां और अमेरिका केंद्रित वैश्विक निंयत्रक अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन के इशारों से जो वित्तीय और मौद्रिक नीतियां तय होती हैं, जो निजीकरण और विनिवेध, अबाध विदेशी पूंजी और उदारवादी सुधारों का सत्यानाशी विमर्श है, उसमें तेल और प्रतिरक्षा व्यय का जिक्र ही नहीं होता।
कालाधन का गोमुख भी वही है। राजनीतिक सत्ता का हिमप्रवाह भी वही।
सबूत बतौर विनिवेश आयोग और विनिवेश परिषद की रपटें देख सकते हैं।
खास बाततो यही है कि तेल और हथियार कारोबार ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था का मूलाधार है और इसीलिए एक तरफ तो अमेरिका युद्ध-गृहयुद्ध का निर्यात करता है तो दूसरी तरफ तेल के कारोबार पर नियंत्रण के लिए इजराइल के साथ मिलकर भारतीय नस्ली रंगभेदी सत्ता समूहों को साथ लेकर मनुष्यता और प्रकृति के खिलाफ आतंकविरोधी युद्ध छेड़ा हुआ है, जो दरअसल बेदखली अभियान है।
इसी के साथ अमेरिकी हितों के खिलाफ कहीं कोई हलचल भी न हो, इस खातिर बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता के जरिये दुनिया भर के तमाम देशों की नागरिकों की खुफिया निगरानी भी करता है अमेरिका।
आधार योजना इसीलिए राष्ट्रद्रोह का ही एजेंडा है, असंवैधनिक और गैर कानूनी तो वह है ही। कैश सब्सिडी गाजर के अलावा कुछ भी नहीं है।
धुरंधर कारपोरेट वकील और वित्तमंत्री अरुण जेटली के ताजा बयानों पर गौर करें।  
उन्होंने कहा कि किसी को कोयला ब्लॉक पर फैसला करने या फिर स्पेक्ट्रम अथवा प्राकृतिक संसाधनों या डीजल और गैस मूल्य पर फैसला करने के लिए सालों का इंतजार नहीं करना होता। वित्तमंत्री ने कहा कि इन फैसलों को पिछले कुछ सालों के दौरान जटिल किया गया,  लेकिन नई सरकार ने समय खराब न करते हुए उन पर निर्णय किया। जेटली ने कहा कि भारत एक महत्वपूर्ण चरण में हैं। जहां हमें अपने धैर्य को नहीं खोना चाहिए। वैश्विक निवेशक भारत की ओर नई रुचि के साथ देख रहे हैं। सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने डीजल कीमतों को नियंत्रणमुक्त किया है।
धनी लोगों को मिल रहे सब्सिडी के लाभ में कटौती का समय अब नजदीक आता दिख रहा है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने समाज में ऐसे वर्ग के लोगों को बिना मात्रा निर्धारित किए ही सब्सिडी का लाभ देने पर सवाल उठाया है जिनकी पहचान नहीं हो सकती है। हालांकि इसके साथ ही उनका मानना है कि एक बड़े तबके के लिए कुछ न कुछ सब्सिडी जारी रखा जाना जरूरी है,  क्योंकि देश में अब भी बड़ी संख्या में लोग गरीब हैं और उन्हें सरकार की मदद की जरूरत है।
जेटली ने कहा था,  भारत को अगला महत्वपूर्ण निर्णय करना है कि क्या मेरी तरह के लोग एलपीजी सब्सिडी लेने के हकदार हैं। एलपीजी उपभोक्ताओं को वर्तमान में 12 सिलेंडर सब्सिडी दर पर मिलते हैं और इसके बाद जरूरत पड़ने पर उन्हें बाजार दर पर सिलेंडर खरीदना होता है।
वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सरकारी बैंकों को रुकी हुई परियोजनाओं को कर्ज मुहैया कराने के लिए कहा है। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ेगी बैंकों के बुरे ऋण में कमी आती जाएगी।
त्रैमासिक समीक्षा बैठक के बाद जेटली ने पत्रकारों को बताया,  ”हमने बैंकों को विभिन्न परियोजनाओं के लिए आर्थिक मदद देने के लिए कहा है ताकि बंद पड़ी ये परियोजनाएं ऋण लेकर बड़े पैमाने पर काम शुरू कर सकें। जाहिर है,  बैंक अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक हैं।”
उन्होंने उम्मीद जताई कि बुरे ऋण या गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के अनुपात में अर्थव्यवस्था के बढ़ने के साथ कमी आएगी।
उन्होंने कहा,  ”साथ ही इस बात पर भी चर्चा की गई है कि एनपीए कम करने के लिए क्या सक्रिय कदम उठाए जाने की जरूरत है।”
उन्होंने सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के प्रमुखों को साथ ही कहा कि ऋण देने के प्रस्तावों का मूल्यांकन बिना किसी भय अथवा पक्षपात के होना चाहिए।
सकल अग्रिम कर और सकल एनपीए का अनुपात इस साल की सितंबर तिमाही में 5.31 फीसदी तक चला गया है जबकि बीते वित्त वर्ष की इसी तिमाही में यह 4.82 फीसदी था।
इसीसिलिसिले में बाबासाहेब डा.अंबेडकर के शोध प्राब्लम आफ रुपी की प्रासंगिकता पर भी गौर करें कि बाबा साहेब ने औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजों की ओर से सिर्फ रुपये के नोट छापकर उसके एवज में भारत की संपत्तियां समुद्र पार लंदन भेजने की हरकतों पर रोक लगाने के लिए कहा था कि जितना चाहे नोट छापें, लेकिन उस नोट की कीमत के हिसाब से बराबर सोना बाजू में रखना होगा।
इसी शोध के आधार पर न केवल स्वर्ण मानक अपनाया गया बल्कि बाबासाहेब की सिफारिशें लागू करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की नींव भी डाली गयीं।
आजाद भारत के भारतीय गोरे शासकों ने अश्वेत अस्पृश्य बहुसंख्य जनगण की संपत्तियां लूटने के लिहाज से डालर मानक अपनाकर फिर वही नोट छापने की परंपरा डाली गयी है और जो अबाध विदेशी पूंजी है, वह कागज के टुकड़ों के अलावा कुछ भी नहीं है और न उसकी कोई जमानत है। डालर गयो तो उसके बदले में कुछ नहीं मिलने वाला।
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का मतलब है कि डालर छापने की हजारों लाखों मशीनें एटीएम की तरह जहां-तहां हर क्षेत्र में लग जायेंगी, जैसे अंबानी समूह डालर के भव भारत का सारा तेल संसाधन कब्जाये बैठा है और तेल गैस कीमतों पर अंबानी समूह के मार्फत दरअसल डालर का वर्चस्व ही है, जो डालर कागज के नोट के अलावा कुछ भी नहीं है।
दूसरेविश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद मार्कमानक देशों का क्या हश्र हुआ तो याद करें तो समझेंगे कि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और विदेशी पूंजी के बहाने मुफ्त में देश बेचने का कार्यक्रम है नवउदारवाद।
इराक के सद्दाम हुसैन ने तेल कागज के इन टुकडों के एवज में देने से इंकार कर दिया और डालर के बदले यूरो में तेल के भुगतान की पेशकश की तो उसे रावण बनाकर अमेरिकी राम ने मार डाला जो अब भारत के भी राम हैं और यही अमेरिकापरस्ती ग्लोबल हिंदुत्व है, ग्लोबल हिंदू साम्राज्यवाद भी है और रामराज्य भी है। इसे जितनी जल्दी समझें, उतना ही बेहतर। इसी रामायण के लिए भारत देश ही नहीं, सारा एशिया अब महाभारत है।
डालर वर्चस्व का महाभारत और उसके कन्हा रंगरसिया कौन है, बूझै सिर्फ सुजान।
पहले जर्मनी के पतन बजरिये मार्क और फिर सोवियत संघ के पतन बजरिये रूबल के अवमूल्यन से ही मुक्त बाजार की यह व्यवस्था बनी है और फिर नये सिरे से रुपये की समस्या पर सोचने की जरूरत है वरना यह डालर पोटेशियम सायनाइड के संक्रमण से हवाओं और पानियों, जमीन और आसमान के जहरीला बन जाने के आसार हैं।
O- पलाश विश्वास
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/issue/2014/12/07 डालर-छापने-की-मशीन-लगा-रहे
इस व्यवस्था मे दलित उत्पीड़न बढ़ा है और अल्पसंख्यकों                        काइस व्यवस्था मे दलित उत्पीड़न बढ़ा है और अल्पसंख्यकों का जीना हराम हो गया है- प्रो. आनंद तेलतुमड़े

इस देश के शासवर्ग का चरित्र जनता के साथ धोखाधड़ी का है- प्रो. आनंद तेलतुमड़े

छठे पटना फिल्मोत्सव प्रतिरोध का सिनेमा की शुरुआत

पटना। ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे’ इस आह्वान के साथ कालीदास रंगालय में छठे पटना फिल्मोत्सव प्रतिरोध का सिनेमा उद्घाटन हुआ। यह त्रिदिवसीय फिल्मोत्सव प्रसिद्ध चित्रकार जैनुल आबेदीन, कवि नवारुण भट्टाचार्य, गायिका बेगम अख्तर, अदाकारा जोहरा सहगल और कथाकार मधुकर सिंह की स्मृति को समर्पित है।
फिल्मोत्सव का उद्घाटन महाराष्ट्र से पटना आए चर्चित राजनीतिक विश्लेषक, लेखक और सोशल एक्टिविस्ट प्रो. आनंद तेलतुमड़े ने किया।
आनंद तेलतुमड़े ने कहा कि आज विकास का मतलब आदिवासियों, दलितों को उनकी जमीन से उखाड़ देना और कामगारों के अधिकारों को खत्म करना हो गया है। जो भी शासकवर्ग के इस विकास मॉडल का विरोध करता है या जो उत्पीड़ित जनता की बात करता है, उसे नक्सलवादी घोषित कर दिया जाता है। आज दलित महिलाओ पर बलात्कार की संख्या दुगुनी हो गई है। साल भर मे करीब चालीस हजार दलित उत्पीड़न की घटनाएं इस देश में होती हैं। महाराष्ट्र में एक दलित परिवार को टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया, बिहार में दलितों की हत्या करने वालों की हाईकोर्ट से रिहाई हो गई। और जो अल्पसंख्यक हैं, उनका तो इस देश में जीना हराम हो गया है। दिल्ली में चर्च जला दिया गया। इशरत जहां और उनके साथियों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या हो या मालेगांव में हिंदूत्ववादियों द्वारा मुसलमानों का वेष धारण करके की गई कार्रवाई, ये मुसलमानों को आतंकवादी बताने की साजिश का नमूना है। उन्होंने कहा कि इसमें आरएसएस-बीजेपी की तो भूमिका है ही, कांग्रेस भी कम दोषी नहीं है, बल्कि भाजपा के उत्थान के लिए कांग्रेस ही जिम्मेवार है।
प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि शुरू से ही इस देश के शासकवर्ग का चरित्र बेहद खतरनाक था। औपनिवेशिक शासकों ने जिनको सत्ता सौंपी, उनका इतिहास जनता के साथ धोखाधड़ी का इतिहास है। उभरते हुए पूँजीपति वर्ग न केवल संविधान निर्माण के दौरान धोखाधड़ी की, बल्कि नेहरू ने पंचवर्षीय योजना और समाजवाद का नाम लेकर पूँजीपतियों के हित में ही काम किया। सन् 1944 में देश के आठ पूंजीपतियों ने निवेश के लिए जो एक पंद्रह वर्षीय योजना बनाई थी, पंचवर्षीय योजना का प्रारूप वहीं से लिया गया था, वह सोवियत रूस की नकल नहीं था। देश में जो भूमि सुधार हुए, उसका मकसद भी भूमिहीन मेहनतकश किसानों के बीच जमीन को वितरित करना नहीं था, बल्कि उसका मकसद अमीर किसानों को पैदा करना था।
अस्सी और नब्बे के दशक में नवउदारवादी भूमंडलीकरण की नीतियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसने समाज से व्यक्ति को अलहदा करके छोड़ दिया है। इसने खुद का स्वार्थ देखने और बाकी सबकुछ को बेमानी समझने के फलसफे को बढ़ावा दिया है। इसने जनता के प्रतिरोधी ताकत के प्रति आस्था को कमजोर किया है। हालांकि आज भी जनता में प्रतिरोध की भावनाएं जिंदा हैं। बेशक शासकवर्ग के प्रोपगैंडा को काउंटर करने लायक संसाधन प्रतिरोधी संस्कृतिकर्म में लगे लोगों के पास नहीं है, पर भी बहुत सारे लोग हैं, जिनकी इकट्ठी संख्या बहुत हो सकती है। ये अगर और रचनात्मक तरीके से जनता तक पहुंचे तो आज के माहौल को बदला जा सकता है।
दिन-रात टीवी और मुख्यधारा के सिनेमा के जरिए जनता के बीच प्रचारित आत्मकेंद्रित और सांप्रदायिक जीवन मूल्यों की चर्चा करते हुए प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि जो ऑडियो-विजुअल माध्यम है, वह काफी पावरफुल माध्यम है, उसके जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक जाना होगा। रामायण और महाभारत सीरियल का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इनसे भी हिंदुत्व का असर बढ़ा। प्रतिरोध का सिनेमा साल में एक ही दिन नहीं, बल्कि प्रतिदिन लोगों को दिखाना होगा।
माइकल मूर की फिल्म ‘फॉरेनहाईट 9/11′ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उसे देखने के लिए उन्हें लाइन में लगकर टिकट लेना पड़ा। पूरी फिल्म में दर्शकों का जबरदस्त रिस्पॉन्स देखने को मिला। उन्होंने बताया कि माइकल मूर का कहना है कि इस तरह की फिल्म को डाक्यूमेंट्री फिल्म कहना बंद होना चाहिए। वे चाहते हैं कि फिल्म से दर्शक अवसाद लेकर जाने के बजाए आक्रोश लेकर जाए। प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि हमें सामान्य दस्तावेजीकरण से आगे बढ़ना होगा। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए रचनात्मक बातें इन फिल्मों में डालनी होंगी। उन्होंने महान फ़िल्मकार गोदार के हवाले से कहा- don’t make political film, make film politically.
प्रो. तेलतुमड़े ने क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय को लाल सलाम करते हुए उनके और जन संस्कृति मंच के साथ अपने पुराने जुड़ाव को याद किया। उन्होंने कहा कि पिछले चालीस वर्षों से उनका प्रतिरोधी जनांदोलनों से गहरा संबंध रहा है।
डॉ. सत्यजीत ने आयोजन समिति की ओर से उद्घाटन सत्र में स्वागत वक्तव्य दिया। मंच पर कवि आलोक धन्वा, डा. मीरा मिश्रा, प्रीति सिन्हा, कवयित्री प्रतिभा, रंग निर्देशक कुणाल, पत्रकार मणिकांत ठाकुर, कथाकार अशोक, प्रो. भारती एस कुमार, पत्रकार अग्निपुष्प, निवेदिता झा, दयाशंकर राय, अवधेश प्रीत, कवि अरुण शाद्वल, कथाकार अशोक, प्रतिरोध के सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी आदि मौजूद थे। संचालन संतोष झा ने किया।
इस सत्र में डा. मीरा मिश्रा ने फिल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण किया. स्मारिका में बेगम अख्तर, जोहरा सहगल, जैनुल आबेदीन, नबारुण भट्टाचार्य और मधुकर सिंह पर स्मृति लेख हैं। ‘तकनालाजी के नए दौर में सिनेमा देखने-दिखाने के नए तरीके और उनके मायने’ नामक संजय जोशी का एक महत्वपूर्ण लेख भी इसमें है। ‘फंड्री’ और ‘आँखों देखी’ फिल्मों पर अतुल और मिहिर पंड्या को दो लेख भी इसको संग्रहणीय बनाते हैं।

साभार : http://www.hastakshep.com/hindi-news/film-tv/2014/12/07 पटना-फिल्मोत्सव-प्रतिरोध

अकाल की कला और भूख की राजनीतिअकाल की कला और भूख की राजनीति

किसी ने आबेदीन से पूछा कि उन्होंने अकाल को ही क्यों चित्रित किया, बाढ़ को क्यों नहीं? तो उनका जवाब था कि बाढ़ एक प्राकृतिक विपत्ति है, जबकि अकाल मानवनिर्मित है।

कलाकार का असली काम मनुष्य के द्वारा मनुष्य के खिलाफ रचे जा रहे षड्यंत्र को उजागर करना है

पटना। यहां आयोजित छठे पटना फिल्मोत्सव प्रतिरोध का सिनेमा में जैनुल आबेदीन की जन्म शताब्दी पर ‘अकाल की कला और भूख की राजनीति’ शीर्षक चित्र-प्रदर्शनी लगाई गई। कविता पोस्टर और किताबों और सीडी का स्टॉल भी परिसर में मौजूद है।
फिल्मोत्सव के मुख्य अतिथि आनंद तेलतुमड़े (आनंद तेलतुंबड़े) ने चित्रकार जैनुल आबेदीन की जन्म शताब्दी के अवसर पर आयोजित ‘अकाल की कला और भूख की राजनीति’ शीर्षक से उनके चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। जैनुल आबेदीन का जन्म 9 दिसंबर 1914 को मैमन सिंह, जो अब बांग्ला देश में है, के किशोरगंज गांव में हुआ था। शासकवर्गीय कला आम लोगों की जिंदगी के जिस यथार्थ से मुंह फेर लेती है, उस यथार्थ को दर्शाने वाले चित्रकारों में चित्तो प्रसाद, कमरुल हसन, सोमनाथ होड़, रामकिंकर बैज, सादेकैन जैसे चित्रकारों की कतार में जैनुल आबेदीन भी शामिल थे। जैनुल आबेदीन ने बंगाल के अकाल पर चित्र बनाए थे। उनके ये चित्र अकाल की अमानवीय हकीकत से हमारा सामना कराते हैं, और यह भी दिखाते हैं कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित ‘राजनीतिक’ अकाल है। उनके इन चित्रों में ड्राइंगरूम में लटकाने वाली सुदंरता नहीं मिलती, बल्कि सहस्राब्दियों में जो सभ्यता मनुष्यों ने बनाई है, उसकी सारी कुरूपताएं इनमें से झांकती हैं। किसी ने आबेदीन से पूछा कि उन्होंने अकाल को ही क्यों चित्रित कियाबाढ़ को क्यों नहीं? तो उनका जवाब था कि बाढ़ एक प्राकृतिक विपत्ति है, जबकि अकाल मानवनिर्मित है। उनका स्पष्ट तौर पर कहना था कि ‘कलाकार का असली काम मनुष्य के द्वारा मनुष्य के खिलाफ रचे जा रहे षड्यंत्र को उजागर करना है ।’ यह और बात है कि हाल के वर्षों में हम मनुष्य द्वारा निर्मित बाढ़ से भी परिचित हो चुके हैं।
जैनुल आबेदीन की चित्र प्रदर्शनी के अलावा फिल्मोत्सव के हॉल के बाहर कविता पोस्टर भी प्रदर्शित किए गए हैं। कालीदास रंगालय का परिसर भी कलात्मक तौर पर सजाया गया है। परिसर में किताबों और सीडी का स्टॉल भी लगाया गया है।
साभार : http://www.hastakshep.com/hindi-news/film-tv/2014/12/07 जैनुल-आबेदीन-प्रतिरोध-का



देश में निवेश करने जो आएगा वह मुनाफे के लिए आएगा- प्रो. आनंद तेलतुंबड़े

देश में निवेश करने जो आएगा वह मुनाफे के लिए आएगा- प्रो. आनंद तेलतुंबड़े

आज वामपंथ भले कमजोर लग रहा होलेकिन यह इतिहास का अंत नहीं है। क्योंकि नवउदारवाद का जो यह दौर हैवह मुट्ठी भर लोगों के लिए ही है। 

पटना। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आनंद तेलतुंबड़े कहा कि इस देश में कोई निवेश करने आएगा तो अपने मुनाफे के लिए आएगा, वह हमें दान देने नहीं आएगा। एफडीआई और निवेश के नाम पर लोगों को सिर्फ बुद्धू बनाया जा रहा है। आजकल सड़कों पर तो फुटपाथ भी नहीं बनते, फ्लाईओवर बनते हैं और उसी को विकास बताया जा रहा है।
एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए मोदी के विकास और अच्छे दिन के दावों पर बोलते हुए प्रो. तेलतुंबड़े ने कहा कि ये आने वाली पीढ़ियों पर बोझ लाद रहे हैं। हमें तो इस तरह का विकास चाहिए कि जनता में ताकत आए। उन्होंने सवाल किया कि शिक्षा और चिकित्सा दो बुनियादी मुद्दे हैं, इनके लिए सरकारों ने क्या किया है? चिकित्सा सेवा का सबसे ज्यादा निजीकरण हुआ है। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक का बाजारीकरण हो गया। बंबई के सारे म्युनिसिपल स्कूल एनजीओ के हवाले किए जा रहे हैं। देश के देहाती इलाके गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से पूरी तरह कट चुके हैं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि चीन ने जैसा विकास किया है, क्या इंडिया वैसा कर पाएगा? वहां के शासकवर्ग और यहां के हरामखोरों में बहुत फर्क है।
दलित आंदोलन पर बोलते हुए प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि दलितों में भी जातियां हैं। जो बड़ी आबादी वाली जातियां हैं, दलित आंदोलन का उन्हें ही ज्यादा फायदा हुआ है। दलित नेताओं के भीतर भी सत्ता की प्रतिस्पर्धा बड़ी है, जिसके कारण वे कभी कांग्रेस और भाजपा में जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा-आरएसएस की ओर से दलितों को एडॉप्ट करने की लगातार कोशिश की जा रही है। अंबेडकरवादी सिद्धांतों की बात करने वाले जो नेता कांग्रेस या भाजपा में गए हैं, दलाली के सिवा उनकी कोई दूसरी राजनीति नहीं है।
उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति के बारे में बोलते हुए तेलतुंबड़े ने कहा कि यहां जो 18-19 प्रतिशत दलितों का वोट है, उसे ही ध्यान में रखकर कांशीराम ने अपनी राजनीति की थी। लेकिन बहुजन से सर्वजन करने पर दलितों में संदेह बढ़ा। उन्होंने कहा कि 1997 के बाद से आरक्षण की स्थिति बदली है, अब नौकरियां सात प्रतिशत घट गई हैं। शिक्षा के बाजारीकरण और निजीकरण ने जो सत्यानाश किया है, उसका नुकसान भी दलितों को हुआ है। आईआईटी के रिजर्वेशन की सीटें भर ही नहीं रही है। मुट्ठी भर दलित भले उपर पहुंच चुके हों। बड़ी आबादी को रिजर्वेशन से फायदा हो ही नहीं रहा है। इसके जरिए शासकवर्ग ने दलितों का अराजनीतिकरण किया है।
बिहार के राजनीतिक महागठबंधन पर बोलते हुए कहा कि ये सभी जेपी के आंदोलन से निकले हुए हैं, ये कोई सही विकल्प नहीं हो सकते। इसके जरिए व्यवस्था भावी परिवर्तन को थोड़ा लंबा खींच सकती है।आज वामपंथ भले कमजोर लग रहा होलेकिन यह इतिहास का अंत नहीं है। क्योंकि नवउदारवाद का जो यह दौर हैवह मुट्ठी भर लोगों के लिए ही है। दुनिया में सात अरब लोग हैं। बहुसंख्यक आबादी की जरूरतें पूरी नहीं होगी, तो संघर्ष जरूर तेज होगा।
साभार : http://www.hastakshep.com/hindi-news/nation/2014/12/07निवेश-मुनाफे-आनंद-तेलतुं

  भोपाल-एक त्रासदी का खबरनामा


भोपाल-एक त्रासदी का खबरनामा
Survivors of the 1984 Bhopal gas leak protest outside the Madhya Pradesh Chief Minister’s residence, September 2014.© Image courtesy Amnesty International © Raghu Rai / Magnum Photos


  तीस बरस का समय कम नहीं होता है। भोपाल के बरक्स देखें तो यह कल की ही बात लगती है। 2-3 दिसम्बर की वह रात और रात की तरह गुजर जाती किन्तु ऐसा हो न सका। यह तारीख न केवल भोपाल के इतिहास में बल्कि दुनिया की भीषणतम त्रासदियों में शुमार हो गया है। यह कोई मामूली दुर्घटना नहीं थी बल्कि यह त्रासदी थी। एक ऐसी त्रासदी जिसका दुख, जिसकी पीड़ा और इससे उपजी अगिनत तकलीफें हर पल इस बात का स्मरण कराती रहेंगी कि साल 1984 की वह 2-3 दिसम्बर की आधी रात कितनी भयावह थी।
            1984 से लेकर साल दर साल गुजरते गये। 1984 से 2014 तक की गिनती करें तो पूरे तीस बरस इस त्रासदी के पूरे हो चुके हैं। समय गुजर जाने के बाद पीड़ा और बढ़ती गयी। इसे एक किस्म का नासूर भी कह सकते हैं। नासूर इस मायने में कि इसका कोई मुकम्मल इलाज नहीं हो पाया या इस दिशा में कोई मुकम्मल कोशिशें नहीं हुई। इस पूरे तीस बरस में इस बात पर जोर दिया गया कि त्रासदी के लिये हमसे से कौन कसूरवार था? किसने यूनियन कार्बाइड के कर्ताधर्ता वारेन एंडरसन को भोपाल से दिल्ली और दिल्ली से उन्हें अपने देश भागने में मदद की? हम इस बात में उलझे रहे कि कसूरवार किसे ठहराया जाये लेकिन इस बात की हमने परवाह नहीं की जो लोग बेगुनाह थे, जिनकी जिंदगी में जहर घुली हवा ने तबाही मचा दी थी, जिनके सपने तो दूर, जिंदगी नरक बन गयी थी।
            भोपाल गैस त्रासदी के नाम से कुख्यात हो चुके दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के इन तीस सालों को देखें और समझने का यत्न करें तो सरकारों और राजनीतिक दलों के लिये 2-3 दिसम्बर की तारीख रस्मी रह गयी है और मीडिया के लिये यह त्रासदी  महज एक खबरनामा बन कर रह गयी है।  2-3 दिसम्बर की आधी रात का सच यह है कि अनगिनत बेगुनाहों को अकाल मौत के मुंह में समा जाना है तो 30 बरस का सच भी यही है। यह वही त्रासदी है जो राजनीतिक दलों के लिये खासा मायने रखती थी। हर बरस 3 दिसम्बर को सर्वधर्म सभा का आयोजन हुआ करता था। संवेदनाओं की गंगा बह निकलती थी। न्याय और हक दिलाने की बातें होती थी। इन तीस बरसों के हर चुनाव में गैस पीड़ित एक मुद्दा हुआ करते थे। जैसे जैसे साल गुजरता गया, गैस पीड़ित हाशिये पर जाते गये। चुनावी एजेंडे में अब गैस पीड़ित और गैस त्रासदी, त्रासदी न होकर महज एक दुर्घटना जैसी रह गयी थी।
            अब रस्मी संवेदनायें होती हैं और अगले ही दिन जिंदगी पटरी पर आ जाती है। तीन दिसम्बर को जिस त्रासदी के दुख में भोपाली अवकाश मनाते हैं, उस दिन बाजार में रौनक कम नहीं होती है। सिनेमा घरों में न तो कोई शो बंद होता है और ना ही कोई आयोजन। दुख और पीड़ा उस परिवार की न तो पहले कम थी और न शायद जिंदगी के आखिरी सांस तक कम होगी क्योंकि जिन्होंने अपनों को खोया है, वे ही अपनों की दर्द समझ सकते हैं। ऐसे लोगों की तादात आज भी कम नहीं है जो जिंदा लाश बनकर अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं। यह मंजर बेहद डरावना और भयावह है। यह एक ऐसा सच है जो उस तारीख की आधी रात का था तो आज सुबह के उजाले में अपने सवालों के जवाब पाने के लिये खड़ा है।
            कहने वाले तो कह सकते हैं कि आखिरी कब तक इस त्रासदी पर आंसू बहायेंगे? यह कड़ुवी बयानबाजी से परहेज करने वाले कल भी थे और आज भी रहेंगे। याद करना होगा उस समय के हमारे संस्कृति सचिव महोदय आइएएस अधिकारी अशोक वाजपेयी को। वाजपेयी को याद करना इसलिये भी जरूरी है कि जिस तरह त्रासदी का यह दर्द जीवन में कभी नहीं भूलेगाउसी तरह नश्तर की तरह चुभते उनके वह शब्द भी हवा में कभी विस्मृत नहीं हो पायेंगे जब उन्होंने कहा था कि-मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है वाजपेयी एक संवेदनशील संस्कृति के संवाहक के रूप में हमारे साथ हैं लेकिन तब एक निष्ठुर प्रशासक के रूप में उन्होंने यह बयान देकर कराहते भोपाल में विश्व कविता समारोह का आयोजन सम्पन्न करा लिया था।
            वाजपेयी जब यह बात कह रहे थे, तब इस बात का अंदाज समाज को नहीं रहा होगा कि आने वाले समय में विश्व की यह भीषणतम त्रासदी महज एक खबरनामा बन कर रह जायेगी। इस खबरनामा की शुरूआत अशोक वाजेपयी ने की थी और आज हम इस खबरनामा को महसूस कर रहे हैं।
            इन तीस सालों में अनेक किताबें बाजार में आ गयीं। लेखकों, रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचना-धर्मिता का धर्म पूरा किया। अपने अपने स्तर पर त्रासदी को जांचने का प्रयास किया। किसी लेखक के केन्द्र में संवेदना थी तो कोई इसके दुष्परिणामों को जांच रहा था। कोई लेखक, लेखकीय सीमा से परे जाकर एक जासूस की तरह त्रासदी के लिये दोषियों को तलाश कर रहा था। गैस त्रासदी पर कुछेक छोटी प्रभावी फिल्में भी बनी और एक फीचर फिल्म भी परदे पर आ गयी। रचनाधर्मिता का यह पक्ष उजला-उजला सा है लेकिन सवाल  है कि इस रचनाकर्म से किसकी नींद खुली और कौन पीडि़तों के पक्ष में खड़ा हुआ? यह सवाल भी जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा ही रह जायेगा।
            एक त्रासदी का खबरनामा से ज्यादा कुछ दिखायी नहीं देता और न ही महसूस किया जा सकता है। इस बात को और भी संजीदा ढंग से जांचना है तो यूनियन कार्बाइड के मुखिया वॉरेन एंडरसन की मौत की खबर एक सूचना की तरह प्रस्तुत की गयी। क्या एंडरसन की मौत से इस पूरे प्रकरण पर कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या इस बात पर मीडिया के मंच पर विमर्श नहीं होना चाहिये था? क्या एंडरसन की मौत एक आम आदमी की मौत थी? ऐसे अनेक सवाल हैं जो इस बात को स्थापित करते हैं कि विश्व की भीषणतम त्रासदी महज एक खबरनामा ही बन कर रह गयी है और यही सच है।
            भोपाल गैस त्रासदी के कई पहलु हैं जो समाज को आज भी झकझोर रहे हैं। इससे जुड़ा आर्थिक पक्ष तो है ही, सामाजिक जिम्मेदारी का पक्ष भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इस सिलसिले में अपना निजी अनुभव शेयर करना सामयिक लगता है।
            इस त्रासदी की तीसरी बरसी थी। एक अखबारनवीस होने के नाते ह्यूमन स्टोरी की तलाश में जेपी नगर गया था। यहां मुलाकात होती है लगभग 11-12 वर्ष की उम्र के सुनील राजपूत से। सुनील की एक छोटी बहन और एक छोटे भाई को छोड़क़र पूरा परिवार इस त्रासदी में अकाल मारा गया था। राहत के नाम पर मिले अकूत पैसों ने सुनील को बेपरवाह बना दिया था। हालांकि बाद के सालों में उसमें सुधार दिखा और इन पैसों से अपने  छोटे भाई और बहन की जिम्मेदारी पूरी की किन्तु स्वयं मानसिक रूप से बीमार हो चुका था। सुनील की मृत्यु के कुछ समय पहले मेरी मुलाकात संभावना ट्रस्ट में हुयी थी जहां सुनील रहता था और उसका इलाज चल रहा था। सुनील एक उदाहरण मात्र है। ऐसे अनेक परिवार होंगे जो खबरों से दूर अपना दर्द अपने साथ समेटे जी रहे हैं।
            त्रासदी के आरंभिक कुछ वर्ष छोड़ दिये जायें तो आमतौर पर 30 नवम्बर से 4 दिसम्बर तक अखबारों के पन्नों और टेलीविजन के परदे पर गैस त्रासदी से जुड़े मुद्दे पर विमर्श होता है।
            सवाल यह है कि जिस त्रासदी को हम विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी मान चुके हैं, जिस त्रासदी के शिकार लोगों को 30 बरस गुजर जाने के बाद भी न्याय और हक नहीं मिला है, जिस भोपाल की खुशियों को इस त्रासदी ने निगल लिया है, क्या इसे महज चंद दिनों के लिये हम खबरनामा बनने दें? शायद यह बात किसी को गंवारा नहीं होगी और न ही कोई इस तरह की पैरोकारी करेगा। यह त्रासदी महज एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं बल्कि विकासशील समाज के समक्ष एक चुनौती है जिसे सामाजिक जवाबदारी के साथ ही पूरा किया जा सकेगा।
            यह सवाल भी मौजूं है कि एक तरफ तो हम अभी भी भोपाल गैस त्रासदी से उबर नहीं पाये हैं और दूसरी तरफ उद्योगों का अम्बार लगाने के लिये बेताब हैं। औद्योगिकीकरण के लिये पूरा देश बेताब है और हर राज्य इन उद्योगों के लिये रेडकॉर्पेट बिछा रहा है। क्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कुछ सीखा है या इसे यूं ही हम भुला दे रहे हैं।
            इन तीस साला सफर में एक बात का और अनुभव हुआ है। जिस वेदना के साथ हम इस त्रासदी का उल्लेख करते हैं, वह वेदना आज भी आम आदमी के भीतर है। वह उस त्रासदी की याद कर सिहर उठता है लेकिन वह लोग संवेदनहीन हो चुके हैं जो इस कालखंड में कमान सम्हाले हुये थे। फौरीतौर पर बयान देने के लिये अशोक वाजपेयी को इतिहास नहीं भुला पायेगा तो तत्कालीन भोपाल कलेक्टर मोतीसिंह की बातों को भुला पाना मुश्किल होगा जब गैस त्रासदी से जुड़े सवालों के जवाब में वे कहते हैं-छोड़ो इन बातों कोआओबनारस की बातें करें।
            एक कहता है कि मरने वालों के साथ मरा नहीं जाता है, दूसरे को बनारस की याद आती है। सोच की यह दृष्टि हो तो गैस त्रासदी एक खबरनामा से अधिक रह भी नहीं जाती है। यह हमारे लिये दुर्भाग्य की बात है कि हम एक ऐसे समय में, एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां परपीड़ा हमें सालती नहीं है। हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं। अखबारों में छपने वाली खबरें हमें झकझोरती नहीं हैं और ऐसे में भोपाल त्रासदी, खबरनामा ही बन कर रह जाये तो शिकायत किससे और कैसी?
O- मनोज कुमार

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मनोज कुमार, लेखक भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के संपादक हैं।
साभार : http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2014/12/08